जियो क्रिकेट, गॉड ब्लेस डिप्लोमेसी!

"क्या सचमुच में पाक दरियादिल हो जाएगा और क्रिकेट का दीवानापन जख्मों पर मरहम लगा देगा। जरा सोचिए !! खबर आई कि पाक के प्रधानमंत्री ने आधी रात को जाकर पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के साथ मीटिंग की और दो घंटे तक दोनों के बीच गुटरगूं होती रही"



नदीम एस. अख्तर 29 March, 2011



आखिर वही हुआ, जिसका डर था! क्रिकेट वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में दो चिर प्रतिद्वंद्वी, दो सहोदर भाई यानी दो पुराने घायल शेर मोहाली के मैदान में भिड़ने जा रहे हैं। पारा चढ़ रहा है, लोहा गर्म है और एक-दूसरे को औकात दिखाने की भावना को दोनों ही देश का मीडिया खूब भुना रहा है, हवा दे रहा है। जाहिर है, जिन दो देशों में क्रिकेट जुनून की हद को पार कर जाता हो, वहां इस मैच को लोग सिर्फ खेल भावना से कैसे ले और देख सकते हैं ? दोनों देशों का अतीत तो साझा रहा है लेकिन 1947 के विभाजन के जख्म अभी भी नहीं भरे हैं... और जब-जब इस पर मरहम लगाने की कोशिश हुई है, इसने कुछ-कुछ कोढ़ में खाज का ही काम किया है।




क्रिकेट फीवर के इस महाप्रेशर को तो जनता फिर भी झेल जाती, लेकिन क्रिकेट डिप्लोमेसी को लेकर वह हैरान-परेशान है। समझ नहीं पा रही है कि हमारे राजनेता, क्रिकेट की पिच पर राजनीति की गेंद डालने से बाज क्यों नहीं आते !! आजकल संसद में शेर पढ़कर विपक्ष को लाजवाब करने वाले या यूं कहें कि भीगी बिल्ली बनाने की कोशिश करने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ ज्यादा ही उत्साह में हैं। क्रिकेट का सीजन है, इसका बुखार लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है, लोहा गर्म है, तो हमारी सरकारें, हमारे राजनेता इस मौके को भला हाथ से कैसे जाने देंगे ! गर्म लोहे पे हथौड़ा चल गया और भारत सरकार ने आनन-फानन में पाकिस्तान के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को मोहाली में भारत-पाक क्रिकेट मैच देखने का न्योता भेज दिया। क्रिकेट डिप्लोमेसी की दुहाई दी जाने लगी। देश के टीवी चैनलों पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रकट होने लगे। यह तर्क दिया जाने लगा कि क्रिकेट डिप्लोमेसी भारत-पाक रिश्तों में जमी बर्फ पिघला देगा। कुछ क्रांति टाइप की चीज होने वाली है शायद!!




लेकिन क्या वाकई यह क्रिकेट डिप्लोमेसी कारगर हो पाएगी, इस कवायद से रिश्ते सामान्य हो जाएंगे, या रिश्ते सामान्य होने की कोई राह निकलेगी ? क्या सचमुच में पाक दरियादिल हो जाएगा और क्रिकेट का दीवानापन जख्मों पर मरहम लगा देगा। जरा सोचिए!! दुनियादारी की थोड़ी बहुत समझ रखने वाला आदमी भी आपको यह बता देगा कि नहीं, ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। खेल अलग चीज है और विदेश नीति-राजनयिक रिश्ते एकदम अलहदा चैप्टर। हां, भारत का न्योता कबूल करने में पाक के हुक्मरानों ने जरूर दरियादिली दिखाने की कोशिश की। खबर आई कि पाक के प्रधानमंत्री ने आधी रात को जाकर पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के साथ मीटिंग की और दो घंटे तक दोनों के बीच गुटरगूं होती रही। फिर जाके यह फैसला हुआ कि यूसुफ रजा गिलानी मैच देखने भारत रहे हैं। यह बात अलग है कि पहले भारत की तरफ से न्योता भेजने और फिर उसे कुबूल करने-करवाने के लिए दोनों देशों की ब्यूरोक्रेसी ने काफी माथापच्ची की!!





यह मनमोहन का मैजिक है, या क्रिकेट की जयकार, कह नहीं सकते लेकिन जितनी जल्दी भारत आने का न्योता पाक हुक्मरानों ने कबूला, वह हैरत में डालता है। सोचिए अगर 26-11 के आतंकवादी हमलों की जांच में सहयोग के लिए भी पाक इतनी ही दरियादिली और तेजी दिखाता, तो क्या होता। आज क्रिकेट डिप्लोमेसी की जरुरत ही नहीं पड़ती। सोमवार को खबर आई कि दिल्ली में दोनों देशों के गृह सचिवों की बैठक में भारत ने फिर 26-11 के आरोपियों की लिस्ट पाकिस्तान को सौंप दी है। सभी जानते हैं कि इतने बरसों से अलग-अलग चैनलों द्वारा, अलग-अलग स्तर पर भारत, पाकिस्तान से सहयोग की मांग करता रहा है, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है। तो फिर आज की कवायद और मोहाली के मैच तक चलने वाली क्रिकेट डिप्लोमेसी से कितनी और क्या उम्मीद लगाई जानी चाहिए....???

मैं पाकिस्तान की "नेकनीयत" पर शक नहीं कर रहा हूं लेकिन पाक के गृह सचिव जिस रास्ते से और जिस अंदाज में भारत आए, वह भी किसी प्रतीक से कम नहीं है। पाक गृह सचिव चौधरी जमान साब एयर रूट से नहीं, बल्कि जमीन के रास्ते वाघा बार्डर होते हुए भारत आए। अगर आप भूले हों तो ये याद दिला दूं कि एनडीए शासनकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी रिश्ते सुधारने का चस्का लगा था। वो भी लंबा-चौड़ा डेलिगेशन लेकर वाघा बार्डर तक गए थे और तत्कालीन पाक पीएम नवाज शरीफ से गलबहियां की थी। रिश्ते सुधारने की दिशा में वह भी एक प्रतीक था लेकिन इस भरत मिलाप का अंजाम क्या हुआ...ये बताने की जरूरत नहीं है। इसके तुरंत बाद कारगिल ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।





दिलचस्प यह भी है कि क्रिकेट डिप्लोमेसी के नाम पर जो कुछ हो रहा है और होगा, वह सब पर्दे के भीतर होगा। क्रिकेट का एक्शन तो हम ग्राउंड पर और टीवी पर लाइव देख सकेंगे, समझ सकेंगे, उसका विश्लेषण कर सकेंगे, लेकिन "ड्रेसिंग रूम" में होने वाली क्रिकेट डिप्लोमेसी के बारे में सिर्फ अंदाजा ही लगा सकेंगे कि क्या हुआ होगा अंदर...??? हां, बातचीत करके दोनों देश के हुक्मरान और अफसरान जब बाहर निकल के जब मीडिया से मुखातिब होंगे तब वही रटा-रटाया तकिया कलाम पढ़ेंगे—“बातचीत बहुत ही सौहार्दपूर्ण और दोस्ताना माहौल में हुई अरे भई, मुस्कराना तो दोनों की मजबूरी होगी..एक मेहमान है और दूसरा मेजबान। वैसे भी अपने देश में रवायत है कि अतिथि देवो भव। फिर अतिथि की कनपटी पर बंदूक रखकर यह थोड़ी कहेंगे कि हमारी बात मान लो...


इधर हैप्पी-हैप्पी माहौल बनाने की तैयारी है, उधर लंदन में बैठे पाक के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ आग उगल रहे हैं। कह रहे हैं कि भारत का अस्तित्व ही पाकिस्तान के लिए खतरा है। इस बात पर भी जोर दे रहे हैं कि पाक सरकार कमजोर है...अतिवादियों और कट्टरपंथियों को पनाह देती है, उनकी बात मानती है...मैं तो कड़क था.. शायद मुशर्रफ साहब यह इशारा करना चाह रहे हैं कि पाक के मौजूदा हुक्मरानों से बात करना नाहक समय नष्ट करना है। सत्ता का एक और केंद्र है और पाक के संदर्भ में यह केंद्र क्या है.. किसी से छिपा नहीं है...मुशर्रफ साहब खुद उसी जमात से आते हैं।




खैर..बात हो रही थी क्रिकेट और डिप्लोमेसी की। अब इस क्रिकेट डिप्लोमेसी में कितना दम-खम है, इससे क्या हासिल होने वाला है, जरा इसका अंदाजा भी लगा लीजिए। पाक के प्रधानमंत्री भारत तो रहे हैं, लेकिन सिर्फ मैच देखने। भारत को बता दिया गया है कि पाक पीएम मोहाली में मैच देखकर वहीं से खिसक लेंगे। वो दिल्ली नहीं आएंगे। हां, पाकिस्तान ने अपने गृह सचिव को पहले जरूर भारत भेज दिया है, माहौल-शाहौल बनाने के लिए!! सो दोस्तों, मोहाली के मैदान में जब तक क्रिकेट चलेगा, सबका ध्यान इसी पर रहेगा और डिप्लोमेसी एक कोने में पड़ी रहेगी। उस समय दोनों देश के हुक्मरान-अफसरान अपनी-अपनी टीमों को चीयर कर रहे होंगे। मैच के बाद दोनों देशों के पीएम मिलेंगे, हाथ मिलाएंगे और गुडी-गुडी बातें कहकर इस क्रिकेट डिप्लोमेसी का वहीं "दि एंड" कर देंगे। दोनों नेता दिल्ली-इस्लामाबाद लौट आएंगे और रिश्ते नार्मल करने की कवायद फिर पहले की तरह घिसटने लगेगी, यानी नतीजा वही ढाक के तीन पात। इसे कहते हैं- खाया-पिया कुछ नहीं और गिलास फोड़ा बारह आने के। एक और चीज है जो दिल में खटक रही है। जिस तरह से इस क्रिकेट मैच पर भावनाएं हावी हैं, जिस प्रकार इसे युद्ध और महायुद्ध की संज्ञा दी जा रही है, दोनों देश के सेलिब्रिटीज, उद्योगपति और राजनेता इस मैच को लेकर जितना उत्साहित हैं, बयान दे रहे हैं, ट्विटर पर लिख रहे हैं, विधानसभाओं में आधे दिन की छुट्टी की मांग कर रहे हैं, उसे देखकर क्या आपको लगता है कि मैच के बाद जब दोनों पीएम और अफसरान मिलेंगे, तो बातचीत सौहार्दपूर्ण वातावरण में होगी??? मैच कोई एक जीतेगा और कोई एक हारेगा...तो क्या हारने वाला पक्ष इतनी जल्दी हार के उस सिंड्रोम से बाहर निकल पाएगा कि वह सकारात्मक बातचीत के लिए मानसिक रूप से तैयार हो??? मुझे लगता है कि हारने वाले के मन में खीझ और अपमान का भाव जरूर होगा, क्योंकि इस मैच से भावनाएं जुड़ी हुई हैं। कड़वी यादों को मन में समेटे दोनों देश सहअस्तित्व के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं और इमानदारी से कहें तो क्रिकेट में जीत का मतलब है, दूसरे को नीचा दिखा दिया, उसे सबक सिखा दिया, उसको बता दिया कि बेटा, हमसे टकराओगे, तो चूर-चूर हो जाओगे। यानी कि यह जीत एक प्रतीकात्मक जीत होती है, यह बताने के लिए कि क्रिकेट के मैदान में जैसे धोबी पछाड़ मारा है, अगर जंग के मैदान में आओगे, तो यही हाल करेंगे-इससे भी बुरा हाल करेंगे। अब आप ही बताइए कि जब क्रिकेट पर इतिहास और भावनाओं का इतना ज्यादा बोझ लदा हो, तो फिर कहां रह जाती है संबंध सुधारने की कवायद और तथाकथित क्रिकेट डिप्लोमेसी!!





वैसे क्रिकेट का दीवाना यह भारतीय उपमहाद्वीप अनोखा है। यहां राजनीति और क्रिकेट एक-दूसरे पर अपना जबरदस्त असर डालते रहे हैं। मसलन यह यूं ही नहीं है कि पाकिस्तान को वर्ल्ड कप जिताने वाले इमरान खान पाकिस्तान में अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी बना लेते हैं और महाराष्ट्र में शिवसेना कहती है कि वह वानखेड़े स्टेडियम में पाकिस्तान को फाइनल नहीं खेलने देगी, यदि वह फाइनल तक पहुंचा तो। हालांकि अब शिवसेना ने अपना यह स्टैंड बदल दिया है और उसे पाक के मुंबई में खेलने पर कोई ऐतराज नहीं है।

एक दौर हमने वो भी देखा है जब राजनीति और डिप्लोमेसी तय करती थी कि दोनों देशों के बीच क्रिकेट खेली जाएगी या नहीं। लेकिन इस बार पासा पलटा हुआ है। क्रिकेट की जय-जय है और क्रिकेट तय कर रहा है कि दोनो देशों का शीर्ष नेतृत्व फिर से बातचीत की मेज पर आए.. ऐसे में मन सारे तर्कों-कुतर्कों को परे रखके यह कह रहा है कि अगर यह डिप्लोमेसी दिखावा है, तो दिखावा सही। और अगर दोनों देश बातचीत के लिए वाकई गंभीर हैं, तो उन्हें गंभीर हो जाने दीजिए। अहम बात तो यह है कि क्रिकेट एक बार फिर अनेकता-विविधता वाले इस देश को एकसूत्र में बांध रहा है। भाषा, धर्म, जात-पात, खान-पान, बालीवुड, टालीवुड, कालीवुड, मालीवुड...सब हमें कहीं कहीं बांटने की, एक-दूसरे से दूर करने की कोशिश करते हैं..लेकिन क्रिकेट हमें फेविकोल के जोड़ से भी ज्यादा मजबूती से जोड़ रहा है। पूरे देश में टीम की जीत के लिए दुआएं हो रही हैं, हवन हो रहे हैं, नमाजें पढ़ी जा रही हैं और लोग अपने-अपने इष्टदेव से टीम इंडिया को विजयश्री का आशीर्वाद देने की याचना कर रहे हैं।..तो इंतजार किस बात का है। हो जाइए तैयार, क्रिकेट के इस महाजश्न में शामिल होने के लिए, राष्ट्र का गीत गाने के लिए और खुद को भावनाओं के समंदर में तैरने-डूबने-इतराने के लिए।...अपनी टीम को चीयर करने के लिए और अपनी दुआ को टीम पर-देश पर लुटाने के लिए। और हां, हालांकि यह मुमकिन तो नहीं है, फिर भी कहता हूं कि खेल को खेल की तरह ही देखिएगा...उसे अपनी भावनाओं से मत खेलने दीजिएगा, दिल पर मत लीजिएगा...क्योंकि इस सेमाफाइनल में कुछ भी हो सकता है! जी हां, कुछ भी !! जियो क्रिकेट!!! गाड ब्लेस डिप्लोमेसी।

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3 Comments

  1. Bahut bahut badia post nadim bhai. Lagta hai hindustan ka editorial lik dala hai jaise. Aur vistar se tippni karunga kal subah, keep writing. All da best... Jio....

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  2. नदीम मैंने तुम्हारा पूरा लेख पढ़ा। बहुत ही सटीक टिप्पणी की है तुमने। बेहद अहम सवाल भी उठाए हैं। तुम्हारा आंकलन एकदम सही है कि मैच के नतीजे बाद दोनों देशों के हुक्मरानों के लिए राजनयिक रिश्तों पर बातचीत के लए अनुकूल माहौल नहीं होगा। दरअसल दोनों देशों के बीच दोस्ताना माहौल बनानें में क्रिकेट डिप्लोमेसी की भूमिका महज़ इतनी है कि दोनों देशों के हुक्मरान एक दूसरे से मिल लें। लेकिन यहां मीडिया ने जाहौल बनाया है वो बेहद अफ़सोसनाक है। क्रिकेट के एक मैच के लिए नफ़रत फैलाई जा रही है। क्रिकेट एसोससिएशन तो पैसै कमा रही है। मीडिया भी बस टीआरपी बटोर कर ज़्यादा से ज़्यादा पैसे बटोरने में लगा है। नफ़रत का ये माहौल दोनो तरफ़ बन रहा है। दोनो तरफ़ मीडिया इतने ग़ैरज़िम्मेदार तरीके से सोचेगा और ख़बरों के नाम पर बेहद घटिया और फूहड़ कमेंट्स दिखाएगा कभी सोचा नहीं था। तुने बहुत ही अच्छा लेख लिखा है णाशाल्लाह....ऐसे ही लिखते रहो।

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  3. यूसुफ भाई, बहुत-बहुत शुक्रिया। आप बिलकुल सही कह रहे हैं...मीडिया ने तो क्रिकेट में जंग का माहौल बना दिया है..टीआरपी के लिए...महायुद्ध, पाक को मजा चखा दो...अफरीदी होगा शहीद...कप्तानखोर धोनी...जैसे जुमले इस्तेमाल किए जा रहे हैं...टीवी चैनलों ने देशभर में टीम इंडिया की जीत के लिए हवन-पूजा-नमाज पढ़ने वालों की नई जमात पैदा कर दी है..इन पूजा करने वालों को मालूम होता है कि जो वो देशप्रेम के नाम पर कर रहे हैं..वो नैशनल टीवी पर दिखेगा..और स्ट्रिंगर भी पूरे जोश के साथ असाइनमेंट को स्टोरी बता कर फटाफट एफटीपी कर देता है...अच्छा तमाशा है..भावनाओं को भुनाने का।

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