कोरोना संकट में भी अपनी निर्लज्जता नहीं छोड़ पाया इंडियन मिडिल क्लास

"आज खाए-पिए अघाए लोगों को जब दुकानों पे खरीदारी के लिए मारा-मारी करते देख रहा था तो मन में यही ख्याल आया कि #Corona से ये अघाए लोग भले बच जाएं पर बेशर्मी से सामान संग्रह करने की होड़ में हार्ट अटैक से ज़रूर मर जाएंगे"


Nadim S. Akhter 25th March, 2020


आज #पीएम के #complete #lockdown के ऐलान के बाद हमारे देश के करीब 22 फीसद यानी 30 करोड़ लोग अपने घरों में आटा-चावल नहीं ला सके। सब्ज़ी-दूध और पनीर-गोश्त तो बहुत दूर की कौड़ी है। ये भारत की वो आबादी है जो बेहद गरीब है यानी #गरीबी रेखा के भी नीचे (below poverty line) रहती है। ये वो जनता है जो गरीबों में भी गरीब है और कभी झारखंड में भात-भात पुकारकर भूख से मर जाती है। ये रोज़ भी नहीं कमा पाते। बेहद दयनीय हालात में रहते हैं।
आज खाए-पिए अघाए लोगों को जब दुकानों पे खरीदारी के लिए मारा-मारी करते देख रहा था तो मन में यही ख्याल आया कि #Corona से ये अघाए लोग भले बच जाएं पर बेशर्मी से सामान संग्रह करने की होड़ में हार्ट अटैक से ये ज़रूर मर जाएंगे। पूरा तमाशा था। मुझे चावल लेने की सूझी पर दुकान में भीड़ देखकर अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई। ये लोग #social #distancing की ऐसी तैसी किए हुए थे। इसलिए हमने सोचा कि पानी पी के रह लूंगा पर यहां जाकर कोरोना का गिफ्ट कौन ले? पता नहीं उनमें से कितने लोग देशभर में आज समान खरीदते खरीदते कोरोना का वायरस घर ले आए होंगे। उनको पता भी नहीं चला होगा। अब आने वाले दिनों में पता चलेगा कि वे बच गए या हलाल हो गए। कोरोना का #social #transmission ऐसे ही होता है। मुझे तो ये लग रहा था कि आने वाले हफ्ते ये घर में रहकर क्या करेंगे जब इस भीड़ में कोरोना का गिफ्ट लेकर जा रहे हैं? घर वालों को भी बांटेंगे। बहुत अफ़सोसनाक स्थिति है। पब्लिक एकदम जड़ #मूर्ख है। जिस #वायरस से बचने की जुगत है, उसी को धारण करने के लिए ये समान खरीदने को टूट पड़े थे।


खैर, मुझे तो ये सब देखकर उन गरीबों में गरीब की याद आ गयी, जिनका ज़िक्र ऊपर किया है। इस देश, यहां की सरकारों और पब्लिक पे तरस आया कि 70 वर्षों में कैसा #जोकरतंत्र बना लिया है हमने! चूंकि रोज़ा रखने की अपनी आदत है, सो बचते-बचाते घर लौट आए। कुछ ना मिले तो हम सूखी रोटी में भी गुज़ारा कर लेते हैं। वैसे कुछ लोग हैं मेरे दोस्त, जो बताते हैं कि वे कितना महंगा खरीदते हैं और पहनते हैं। उनसे यही कहना चाहूंगा कि दोस्त! अगर सच्चे मुसलमान हो ना तो अपने #पैगम्बर #मुहम्मद साहब से सीखो। वे पैबंद लगे कपड़े पहनते थे, भूख की शिद्दत इतनी की पेट पर पत्थर बांध लेते थे। अपने जीवन के अंतिम दिनों में जब उन्होंने अपने अनुयायियों को बताया कि अब उनके इस #दुनिया से जाने का #फरमान है, किसी का उनपर कोई कर्ज़ तो नहीं, जो खुदा के घर में उनकी पकड़ करे, तब एक सहाबा ने बताया कि हुज़ूर! आपने एक इंसान की मदद मुझसे कुछ रकम उधार लेकर की थी। ये सुनकर मुहम्मद साहब अपने दूसरे साथी का मुंह ताकने लगे। उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि दूसरे की मदद के लिए उधार ली गयी एक मामूली रकम वह चुका सकें। वहां मौजूद एक सहाबा ये बात समझ गए और मुहम्मद साहब से अर्ज़ किया कि उनकी तरफ से ये रकम वे खुद चुका देंगे और उन पे अब कोई कर्ज़ नहीं। 


ये सब बताने का सार ये है कि कोरोना ने हमें बतौर एक समाज और एक राष्ट्र, अंदर तक हिला दिया है फिर भी हम अपना स्वार्थ नहीं छोड़ रहे। सिर्फ अपनी फिक्र कर रहे हैं, दूसरों की नहीं। ये बहुत दुखद और शर्मनाक स्थिति है।

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