कोरोना ने ऊँट को पहाड़ के नीचे ला दिया

सम्पादकीय

Nadim S. Akhter 23 Match 2020




ऐसा लगता है कि मेरी पोस्ट के बाद मीडिया वाले जाग गए हैं। थाली और ताली को शौर्य दिवस के रूप में मनाने के बाद अब वे देश को बता रहे हैं कि अगले कुछ घण्टे देश के लिए ज़रूरी हैं, बेहद अहम हैं। ये पता चलेगा कि देश कोरोना के स्टेज-3 में पहुंचा या नहीं? बहुत देर से नींद खुली खबर के सौदागरों!! बचोगे तो आप लोग भी नहीं क्योंकि इसी समाज में रहते हो। अब तक हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर जनता को बरगलाते आए थे। नेताओं के तलुवे चाट रहे थे। पर अब पाला असल चीज़ से पड़ा है। कोरोना वायरस। अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। अब बरगलाओ जनता को। मनाओ शौर्य दिवस। जनता तो मूर्ख है ही। तुम लोग भी मिलकर मदारी का खेल, खेल रहे थे ना! समझ आएगा। जल्द। अब क्यों बता रहे हो कि देश के लिए कल तक का समय अहम है? करो पत्तलकारिता! बोलो सब गुडी गुडी है! कल तक तो टीभी पे जनता को बता रहे थे कि थाली-ताली के शोर से वायरस भाग जाएगा। नेताजी का मास्टरस्ट्रोक है। अब क्या हुआ? वायरस भागा नहीं। चिंता ना करो। लपेटे तुम लोग भी जाओगे। ये प्रकृति का न्याय है। जो जैसा करता है, इसी दुनिया में भर कर जाता है। दंगा करवाकर कितने घरों को अनाथ बनाया तुम लोगों ने। उसकी आह तो उठी होगी कहीं! वो लगेगी। क्या समझते हो कि तुम न्यूज़रूम में बैठकर दलाली कर लोगे और आराम से निकल जाओगे? नहीं। ये हो नहीं सकता। अपने घर के किसी बुजुर्ग से पूछना। बताएंगे कि अच्छे कर्म का फल ही अच्छा होता है, बुरे का नहीं। कर्म का ही तो ज्ञान कृष्ण गीता में दे गए थे। पढ़ा नहीं था? नौकरीं करो, हुकुम बजाओ पर उतना ही, जितने से किसी दूसरे इंसान का अहित ना हो। समाज और देश का नुकसान ना हो। ये दुनिया बहुत बड़ी और घनी है। सो किसी माई के लाल की ये औकात नहीं कि तुमको रिज़्क़ यानी रोज़ी-रोटी दे दे। जितना तुम्हारे नसीब में लिखा है, वो मिलेगा ही। ना एक बित्ता कम, ना एक छटाक ज्यादा। इसलिए अपना ज़मीर मत बेचो। नेता और राजनीति किसी की नहीं होती। ये सब अपना उल्लू सीधा करते हैं। एक को जानता हूँ। किसी ज़माने में अहमद पटेल से अच्छी दोस्ती थी। फिर पटेल ने सत्ता में रहते ही उनको पूछना छोड़ दिया। नेता देखते हैं कि कौन उसके काम का आदमी है, उसे यूज़ करते हैं और फिर फेंक देते हैं। जब तक न्यूज़ रूम में पद पे विराजमान हो, नेता के प्यारे रहोगे। पद जाते ही वह आपको पहचानेगा नहीं। वह स्वभाव से गिरगिट का लंगोटिया यार है। कुछ पत्रकार निकले थे नेता बनने। लौट आए। और जो हैं, वो जी हुजूरी के अलावा कुछ कर नहीं पा रहे। एक नाम बता देता हूँ। एम जे अकबर। आज कहाँ हैं? ना घर के रहे, ना घाट के। #Metoo में नप गए। आज तक उबर नहीं पाए। सो किस दुनिया में हो दोस्त! थोड़ा कहा है, ज्यादा समझना। कोरोना का नाश हो और पत्रकारों को अक्ल आए, देश यही चाहता है।

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