ये लॉकडाउन तो आगे बढ़ना ही था

"थाली पीटो और दीया जलाओ इवेंट ज़रूरी नहीं हैं, ये बन्दर रूपी जनता के मुंह में लेमनचूस देने की तरह है कि वह देशभक्ति की #feeling में मस्त रहे और उसे लगे कि वह भी घर बैठे देश के लिए कुछ कर रही है"

Nadim S. Akhter


मुझे लगता है कि थाली पीटने और अब दीया जलाने के #event के बाद जल्द ही या 14 अप्रैल आने तक #Lockdown को #extend करने या बढ़ाने की घोषणा हो सकती है। बस एक अंदाज़ लगा रहा हूँ। कन्फर्म कुछ नहीं है। सरकार जनता का मूड देखकर ये तय कर सकती है कि इसकी घोषणा कब करनी है और #लॉकडाउन कितने दिनों तक बढ़ाया जाए। अब ये होगा या नहीं, ये भविष्य के गर्भ में है।


थाली पीटो और दीया जलाओ इवेंट ज़रूरी नहीं हैं, ये बन्दर रूपी जनता के मुंह में लेमनचूस देने की तरह है कि वह देशभक्ति की #feeling में मस्त रहे और उसे लगे कि वह भी घर बैठे देश के लिए कुछ कर रही है, भले ही वह घर के बगल से गुजरती भूखी गाय को आधी रोटी भी ना देती हो। 

पर lockdown का बढ़ना ज़रूरी है वरना अभी चल रही घरबन्दी का मकसद फेल हो जाएगा। चूंकि भारत भेड़ों के झुंड वाली जनता का देश है तो लॉकडाउन के बाद भी यहां हालात सुधरे नहीं हैं। सरकार माने या ना माने पर विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत में कोरोना का स्टेज-3 यानी #community #transfer शुरू हो चुका है। यानी यह समाज में तेजी से फैल रहा है पर सरकारी आंकड़ों में नहीं दिख रहा। इसका कारण ये है कि सरकार (जानबूझकर?) कोरोना के टेस्ट ही कम करवा रही है। चीन, अमरीका और कोरिया की आबादी के हिसाब से वहां जितने टेस्ट हो रहे हैं और नए मामले रोज़ सामने आ रहे हैं, हमारे यहां सब #controlled है। ना टेस्ट करो, ना नम्बर्स आएंगे। सीधा फंडा है पर यही फंडा आगे चलकर सरकार और देश के लिए फंदा बन सकता है। 



ये नोटबन्दी नहीं कि दो साल तक देश को ये बताया ही नहीं कि बाजार से कितने पुराने नोट वापिस आ गए। #RBI भी चुप्पी मारकर कुंडली आसन में बैठा रहा। उसके गवर्नर बदलते रहे। ये कोरोना है, वायरस। सीधे इंसान की जान लेता है। इसलिए अगर देश में इस वायरस का समाज में निर्बाध फैलाव यानी ट्रांसमिशन हो रहा है तो लोग मरने शुरू होंगे। हर जगह से। आप टेस्ट मत कीजिये पर जब ये महामारी एकदम से फैल जाएगी तो कितनी मौतों को छुपाएंगे आप? बालू में मुंडी गाड़कर और घर की बत्ती गुल करके मोबाइल टॉर्च की रोशनी तो जला लेंगे पर लाशों को कहां छुपाएंगे? बोलिए? हालात खतरनाक हैं और सरकार अब भी लफ्फाजी और धप्पा-धप्पी का खेल खेलने में लगी है।


सो बिना कुछ effort किए (जो ज़िम्मेदार मंत्रीगण करना नहीं चाह रहे, वो दिख रहा है) अगर corona के कम्युनिटी ट्रांसफर की गति धीमी करनी है तो lockdown को बढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं। मुझे लगता है कि सरकार के सुलझे हुए सलाहकार भी उन्हें यही सुझाव देंगे। पर एक बात याद रखिएगा। lockdown बढ़ाने से कोरोना के समाज में फैलने की स्पीड कम हो जाएगी पर ये बीमारी जिनके घरों में घुस चुकी है, वहां अपना प्रसाद बांटती रहेगी। घर के दूसरे सदस्य बीमार पड़ते रहेंगे और इसी गुमान में रहेंगे कि उन्हें मामूली सर्दी जुकाम और खांसी हुई है। फ्री सरकारी टेस्ट तो हो नहीं रहे, तो फिर जिनके पास पैसा है, वही प्राइवेट क्लीनिक में जाकर टेस्ट करवा पाएगा। गरीब आदमी जो तेजी से समाज में कोरोना फैला रहा है, वो बिना टेस्ट के इसका प्रसाद बांटता रहेगा।

मुझे लगता है कि अभी तक सरकार ये समझ ही नहीं पाई है कि 130 करोड़ की आबादी में कोरोना का संक्रमण कैसे रोका जाए! बस वह lockdown का सहारा ले रही है, जो सिर्फ आपको टाइम दे देता है तैयारी करने का, बीमारी खत्म नहीं करता। सरकार के पास गाँव-गाँव तक ना मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर है और ना डॉक्टर-नर्सें। सो कोरोना के अखिल भारतीय रूप से वह कैसे निपटेगी, नीति-नियंताओं के लिए ये अभी भी एक पहेली बना हुआ है। 


मुझे लगता है कि आने वाला वक़्त संकट भरा है। अगर ये वायरस खुद ब खुद कुदरती रूप से खत्म नहीं हुआ तो हमारी सरकार के कम से कम ये बूते का नहीं कि इससे पार पा जाए। अमरीका जैसा देश और वहां न्यूयॉर्क का गवर्नर रो रहा है। मदद की गुहार लगा रहा है। रिटायर्ड मेडिकल स्टाफ को बुला रहा है पर हालात काबू में नहीं हो रहे जबकि उनका disaster management हमसे मीलों आगे है। किस गुमाँ में हैं आप? थाली पीटने और टॉर्च-मोमबत्ती जलाने से कोरोना खत्म कर देंगे? नहीं। इसलिए ये याद रखिएगा कि जब जनता भीड़ का भेड़ बन जाती है तो लापरवाह चरवाहा उसे हरी घास खिलाने को जंगल की तरफ हांक देता है। ये जानते हुए कि जंगल में शेर हैं और उसकी भेड़ें बेमौत मरेंगी पर वह ऐसा करता है क्योंकि उसे दो पल की नींद चाहिए। भाँड़ में गईं भेड़ें! मालिक समझे, अपने को क्या? कौन सा मैं मर रहा हूं!!

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