इस देश में अब कभी मत कहिएगा कि हमें संविधान और कोर्ट पर पूरा भरोसा है

Nadim S. Akhter 17 March 2020


इस देश में अब आगे ये कभी मत कहिएगा कि हमें #संविधान और #न्यायलय पर पूरा भरोसा है। कौन #जज कहाँ, किस रूप में और किस कुर्सी पर बिका हुआ है, इसके बस कयास लगाइए। संविधान की सुरक्षा की गारंटी सिर्फ सुप्रीम कोर्ट दे सकता है और आज के काल में, जब #कोर्ट पे जनता का विश्वास पहले ही डिगा हुआ है, रंजन गोगोई का #रिटायरमेंट के सिर्फ चार महीने बाद सरकार द्वारा राज्यसभा में भेजा जाना उस विश्वास को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। ये तय है कि आज के बाद जनता #सुप्रीमकोर्ट क्या, किसी भी कोर्ट के फैसले को सिर-माथे नहीं लगाएगी। उसे शक की नज़र से देखेगी, उस पे सवाल उठाएगी और फट से कह देगी कि ये सब जज बिके हुए हैं। दलाल है, चोर हैं, भ्रष्ट हैं।


यानी आज से पहले जो बात #मीडिया वालों यानी पत्रकारों यानी #लोकतंत्र के तथाकथित चौथे खंभे के लिए बोली जाती थी कि पत्रकार बिके हुए हैं (जो अब नॉर्मल है, कोई बुरा भी नहीं मानता), वही बात अब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजेस के लिए भी बोली जाएगी। सेना तब समर्पण करती है, जब राजा हार जाता है, चाहे उसमें कितने ही वीर क्यों ना हों। सो की #न्यापालिका बिक गई है, ये सुप्रीम कोर्ट के पूर्व गोगोई कांड ने स्थापित किया है चाहे सिस्टम में  #हाईकोर्ट के पूर्व जज मुरलीधर जैसे कुछ ईमानदार जज ही क्यों ना हों। और देखिये जस्टिस मुरलीधर के साथ भी सिस्टम ने क्या सलूक किया? जैसे ही उन्होंने बीजेपी के #कपिल मिश्रा व अन्य के खिलाफ #FIR करने का आदेश दिया, रातोंरात उनका तबादला कर दिया गया। फिर सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के हाथ में आ गयी, जिन्होंने अगले दिन मामले की सुनवाई आगे खिसका दी। अब तक कपिल मिश्रा पे कोई FIR दर्ज नहीं हुई है और मामला लटका दिया गया। 


ऊपर का उदाहरण इसलिए दे रहा हूँ ताकि आप रंजन गोगोई के चीफ जस्टिस से सांसद बनने की यात्रा समझ सकें। इस आदमी ने अयोध्या मामले से लेकर राफेल और तमाम अन्य मामलों में जो पैतरा अपनाया, उससे केंद्र सरकार को राहत मिली। फिर वही #केंद्र सरकार गोगोई को सांसद बना देती है। क्यों? क्या इस देश में अच्छे जजों की कमी है? जस्टिस दीपक मिश्रा को ही बना देते, जिनके खिलाफ गोगोई ने मोर्चा खोला था और जिन पर केंद्र सरकार के करीबी होने का आरोप लगा था। नौबत #महाभियोग तक आ गयी थी। फिर जस्टिस गोगोई ही क्यों? कुछ खास किया होगा इन्होंने तब ना, जिसका प्रसाद मिला! फिर क्या किया गोगोई ने? केंद्र सरकार उनसे इतनी खुश क्यों है कि रिटायरमेंट के अभी आधे साल भी नहीं बीते कि एक नया तमगा उनको पुरस्कार में दे दिया! क्या अब भी कुछ बताने की ज़रूरत है? वैसे नादानों को बता दूं कि कोर्ट में एक term का प्रयोग होता है- Circumstantial Evidence यानी #परिस्थितिजन्य #सुबूत। तो गोगोई के मामले में ये परिस्थितिजन्य सुबूत इशारा कर रहे हैं कि उन्होंने ना सिर्फ अपना ईमान बेचा है बल्कि देश में #न्याय की सुप्रीम कुर्सी पर बैठकर देश के संविधान को भी बेचा है। अब इस सौदे में उनको क्या-क्या मिला, ये तफ्तीश खोजी पत्रकारों को करनी चाहिए। गोगोई पर चीफ जस्टिस रहते यौन शोषण का भी आरोप लगा था। क्या वे डर गए थे? बहुत आयाम हैं पर जो नतीजा सामने है वह देश के संविधान और लोकतंत्र के लिए शर्मनाक ही नहीं, खतरनाक है। गोगई बने #राज्यसभा #सांसद। खबर सुनकर ही हंसी और गुस्सा नहीं आ रहा आपको? यानी जो आदमी देश के पीएम को कोर्ट में तलब कर लेने की हैसियत रखता था, आज उसी पीएम के फेंके हुए एक अदद टुकड़े को उठाने के लिए मिट्टी में मुंह मार रहा है। राज्यसभा का सांसद बनने जा रहा है। इससे ज्यादा दुर्गति किसी चीफ जस्टिस की देखी है आपने? इतना सस्ता भी बिकता है कोई? और हैरत तो ये है कि अगर सरकार ने सद्भाव में और गोगई की प्रतिभा से प्रभावित होकर उनको राज्यसभा की सांसदी का प्रस्ताव भेजा भी होगा तो उन्होंने इस टुच्चे ऑफर को स्वीकार क्यों किया? अगर उनको देश का अगला #राष्ट्रपति बनाया जाता तब तो कोई बात भी थी। उनके पूर्व के पद की गरिमा के अनुरूप था। पर ये राज्यसभा, जहां विजय माल्ल्या जैसा धनपशु और भगोड़ा भी बैठता था, वहां जाकर उन्हीं की जमात में बैठना देश के एक पूर्व चीफ जस्टिस को शोभा नहीं देता। ये तो वही बात हुई कि देश का #पीएम रहने के बाद अब आप वार्ड के पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं। शर्मनाक। मुझे नहीं मालूम था कि हमारे देश का एक पूर्व चीफ जस्टिस इतना सस्ता होता है। 


अब बात #कांग्रेस की। कुतर्की की भी एक सीमा है। भाई लोग तुरन्त इतिहास खंगालकर कहने लगे कि कांग्रेस में इंदिरा गांधी और उसने-उसने फलां-ढिमका को भी ऐसा ही सस्ता प्रसाद दिया था। यानी एक पूर्व चीफ जस्टिस को कांग्रेस की सरकार ने भी राज्यसभा सांसद बनाया था, किसी को #गवर्नर बनाया था और पता नहीं क्या-क्या बनाया था। तो एक बात बताओ कमअक्लों! #बीजेपीके कांग्रेस के ही सारे महापाप दुहराने सत्ता में आई है? फिर ये पार्टी विद डिफरेंस कैसे है? क्या #इंदिरा गांधी और अन्य कांग्रेसी सरकारों के कुकर्मों को आगे बढ़ाना ही मौजूदा निजाम का एकमात्र लक्ष्य रह गया है? कांग्रेस के वक़्त दिल्ली में सिखों का नरसंहार हुआ, दंगा हुआ। उसकी कसर अभी दिल्ली में हुए नरसंहार, I mean, हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने तो पूरी कर दी। रह गया था सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस को राज्य सभा भेजना, वह कसर भी बीजेपी ने गोगोई को राज्यसभा भेजकर पूरी कर दी। अब कांग्रेस का कौन सा पाप बाकी रह गया है, जिसे मोदी जी पूरा करने वाले हैं? हां, इमरजेंसी! यही बाकी रह गया है। तो कांग्रेस के पापों से प्रेरणा लेकर बीजेपी की सरकार देश में घोषित आपातकाल कब लगा रही है मित्रों! 


अब आते हैं मामले की जड़ में यानी संविधान के प्रावधान में, जिसकी जड़ में मठ्ठा डालने की कोशिश कांग्रेस और बीजेपी ने किया है। मेरा एक बेसिक सा मासूम सवाल है कि हमारे संविधान में ये प्रावधान क्यों नहीं किया गया कि कम से कम हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के बाद लाभ का कोई भी पद सार्वजनिक जीवन में नहीं लेंगे यानी वह पद जो सरकार देती है या नामित करती है या चुनती है। प्रसाद के रूप में। क्या हमारे संविधान निर्माताओं को इतनी अक्ल भी नहीं थी और उनको ये ख्याल नहीं आया कि जज भी इंसान होते हैं। लालच में पड़ सकते हैं, बिक सकते हैं, भ्रष्ट हो सकते हैं, तो क्यों ना उनको एक सीमा में बांध दिया जाए? यानी एक बार आप हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए तो फिर आप सारे मोहमाया से ऊपर उठ गए। अब आप कोई भी पद धारण नहीं कर पाएंगे। ये ज़रूरी था। न्याय की रक्षा के लिए भी और न्यायधीशों की गरिमा के लिए भी। तो ऐसा क्यों नहीं हुआ? हमारे संविधान निर्माता इतने गुणी और पढ़े-लिखे थे, महीनों संविधान पे बहस हुई और इसे बनने में दो साल से ज्यादा का वक़्त लगा तो फिर इतनी महत्वपूर्ण बात उनसे छूट कैसे गई? क्या ये उनको तब भी याद नहीं आया, जब वे संविधान की रक्षा का उत्तरदायित्व सुप्रीम कोर्ट को दे रहे थे और कार्यपालिका/ विधायिका के ऊपर उसे असीम शक्तियां दे रहे थे! तब उन्होंने क्यों नहीं सोचा कि कार्यपालिका लालच देकर न्यायपालिका के जज को खरीद सकती है और अपने वश में कर सकती है! 


इसका एक जीता-जागता सुबूत मैं आपको देता हूँ। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के (हाई कोर्ट भी नहीं) के एक सिटिंग जज जस्टिस अरुण मिश्रा ने सरेआम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़े और मोदी को -Versatile Genius- का तमगा दे दिया। मतलब सुप्रीम कोर्ट का एक मौजूदा जज पीएम को भगवान का अवतार बता रहा है तब सोचिए कि उसकी अदालत में पीएम या सरकार के खिलाफ कोई मामला आएगा तो वह क्या फैसला देगा? ना खाता, ना भी, भगवान पीएम जो कहें, वही सही। भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका का ये इतना गिरा हुआ स्तर है यानी न्यूनतम बिंदु है कि इससे नीचे तो अब पाताललोक ही बचता है। फिर क्या था? डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू हुई कि खुलेआम ये क्या अंधभक्ति दिखा गए मीलॉर्ड? फिर सुप्रीम कोर्ट के ही बार एसोसिशन ने जस्टिस मिश्रा यानी पंडिज्जी के बयान की कड़ी निंदा की। मतलब ये कि न्यायपालिका को तो अब खरीदने की भी ज़रूरत नहीं। वह खुद बिछी चली आ रही है इस उम्मीद में कि कोई post retirement benifit मिल जाए! फिर सवाल घूमकर वहीं आता है। क्या हमारे संविधान निर्माताओं को ये नहीं दिखा था कि ऐसा हो सकता है! फिर उन्होंने जजों के लिए रिटायरमेंट के बाद कोई भी पद लेने की मनाही संविधान में ही क्यों नहीं की?? सवाल बड़ा है और जवाब मेरे पास नहीं है।

एक बार नवभारत टाइम्स के लिए मैंने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जयस्टिस ए एम अहमदी का इंटरव्यू किया था, जिसमें उन्होंने भी कहा था कि जजों को रिटायरमेंट के बाद कोई पद देने का लालच देकर सरकारें न्याय को प्रभावित करने की कोशिश करती हैं। और आज इतने सालों बाद फिर वही देश को दिख रहा है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि इसका उपाय क्या है, निदान क्या है? तो ईमानदारी से कहूं तो कुछ नहीं। कारण ये है कि केंद्र में कोई भी सरकार हो, वह न्यायपालिका को कसने के जुगाड़ में रहती है क्योंकि उसे मालूम होता है कि सिर्फ कोर्ट ही उनकी मनमानी को रोक सकता है। सो संसद में संविधान संशोधन करके वह कोई ऐसा प्रावधान नहीं लाएगी, जिसमें कहा जाएगा कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के बाद कोई भी ऐसा पद धारण नहीं कर पाएंगे जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकार की कृपा यानी विवेक पर आधारित हो।


कुछ समझे? ऐसे ही इस देश का बेड़ा थोड़ी गर्क हुआ है! कुछ योगदान राजनेताओं का है, कुछ जजों का, कुछ अफसरों का और कुछ संविधान के loop holes का। अब गड्ढे कौन भरे? तालाब में तो सभी नंगे हैं और कपड़े झाड़ी पर सूख रहे हैं।


Post a Comment

0 Comments