ये पैदल गरीब मज़दूर नहीं थे, ये माटी के लाल थे जो रातोंरात अनाथ हो गए

उनमें से किसी को पता नहीं कि वे अपने गाँव सकुशल पहुंच पाएंगे भी या नहीं। और उनमें से कितनों को तो पता ही नहीं कि उनका अपना गाँव भी अब पराया हो चुका है। गाँव के बाहर No Entry का बोर्ड लगा दिया गया है "

Nadim S. Akhter


दिल्ली से कुढ़कर अपने घर-जबार पैदल जाते लोग आज़ाद भारत के इतिहास में एक और मानवीय त्रासदी के रूप में दर्ज हो रही है। छोटे-छोटे बच्चे, माएँ, औरतें, बूढ़े बाप और जवान हांफते मर्द, सिर पे सामानों की गठरी रखकर सब भागते चले जा रहे हैं। उनमें से किसी को पता नहीं कि वे अपने गाँव सकुशल पहुंच पाएंगे भी या नहीं। और उनमें से कितनों को तो पता ही नहीं कि उनका अपना गाँव भी अब पराया हो चुका है। गाँव के बाहर No Entry का बोर्ड लगा दिया गया है। 


कोरोना वायरस का खौफ है। ये मौत का डर भी अजीब चीज़ है। अपनों को कलेजे से दूर कर देता है। सिर्फ मां-बाप ही होते हैं दुनिया में जो औलाद के हिस्से की मौत अपने सीने से लगाने को बेताब रहते हैं। उनके अलावा इस दुनिया के सारे रिश्ते बेमानी मालूम होते हैं। कोरोना भगाने के नाम पे देश की राजधानी से ये गरीब-गुरबे भगाए जा रहे हैं। इनमें से कितनों के हाथों ने ना जाने इस शहर की कितनी इमारतों और सड़कों को चार चांद लगाया होगा पर आज ये उसी सड़क पर अनाथ हैं। बस चले जा रहे हैं, इस उम्मीद पे कि कहीं कोई बस खड़ी होगी, उनके इंतज़ार में। शायद योगी जी ने, या फिर मोदी जी ने या नीतीश जी ने उनके लिए किया होगा किसी ट्रक का इंतज़ाम, जिनमें ठूंसकर भेड़-बकरी की तरह इनको भी अपने गाँव-घर उतार दिया जाएगा। पर ये उम्मीद पूरी होती दिखती नहीं। दो जून की रोटी के जुगाड़ में दिल्ली आए इन लोगों को ये शहर छोड़कर क्यों जाना पड़ रहा है, इन्हें मालूम नहीं। कह रहे हैं, सरकार ने बोला है। यहां रहेंगे तो मर जाएंगे। कोरोना से तो नहीं मालूम पर भूख से ज़रूर मर जाएंगे। सो गर मरना ही है तो अपने गाँव जाकर क्यों ना मरें! कम से अंतिम संस्कार तो हो जाएगा। एके कहता है कि हम गरीब तो मरने के लिए ही पैदा हुए हैं बाबूजी! दो वक्त की रोटी का आसरा था, वो भी छिन गया। ये कहते हुए उनके चेहरे पे पानी के निशान बन जाते हैं। समझ नहीं आता कि वो निशान इस मेहनतकश का आंसू है या फिर पसीना! एक भीड़ है जो लगातार दिल्ली से दूर भागी चली जा रही है। कोई अनमना सा रुकता भी है तो पीछे वाले ठेल के आगे बढ़ा देते हैं और आगे वाले ललकार लेते हैं। जैमी नहीं मर्दे तो मरमी की। हल्ला होता है कि जो नहीं जाएगा, वो मर जायेगा। उनको देखकर ऐसा लगता है कि दिल्ली शहर मौत के सौदागरों का शहर रहा होगा जहां ज़िन्दगी का सौदा होता होगा। आंखें सड़क किनारे खड़ी बहुमंजिली इमारतों पे टिक जाती हैं कि क्या इनकी दीवारों के पीछे मौत का सौदा होता होगा? यहां तो बड़े सभ्य लोग रहते हैं जो कूड़ा भी डस्टबीन में ही जाकर डालते हैं। फिर इन गरीब इंसानों की ज़िंदगी का सौदा कौन लोग करते हैं? तभी भीड़ से एक आवाज़ आती है कि ये घर देख रहे हो ना बाबूजी! ये हमने ही बनाए थे कभी। आज एक वायरस के चलते हमको शहर से बेदखल कर दिया। हम तो जा रहे हैं पर रोवाँ-रोवाँ रो रहा है। ज़िंदा रहेंगे तो शायद इस शहर को कभी लौट के ना आवें। बहुत ज़िल्लत और तकलीफ सह रहे हैं। हमारी कोई नहीं सुनता। ना सरकार, ना पुलिस और ना जनता। कुछ भले लोग मिल जाते हैं, दाना-पानी दे देते हैं पर उससे क्या होगा? हमें मदद और सहानुभूति नहीं चाहिए बाबूजी! हम मेहनत करने वाले लोग हैं। अपने हाथ से खटकर खाते हैं। हमारे स्वाभिमान भी आप ही जैसा होना चाहिए ना बाबूजी! फिर हंस देते हैं। इस घोर आपदा और तकलीफ में उसकी हंसी मेरी आँखों में कहीं गहरे धंस जाती है। जैसे कोई उल्का पिंड गिरा हो और पूरी ज़मीन को बंजर करके एक विशाल बियावान का गड्ढा बना दिया हो। वे जा रहे हैं। ये सोचकर कि फिर कभी इस निर्लज्ज शहर को ना आना पड़े। उन्हें नहीं मालूम कि देश, संविधान और सरकार क्या चीज़ होती है। वे सिर्फ नेता को जानते हैं। वही जो आकर टीभी पे भाषण देता है। 15 अगस्त को। पगड़ी बांधकर। वही ना नोटबन्दी करीस रहा। अब शहर छोड़ने को बोला है। टीभी पर। तो हम जा रहे हैं। मजबूरी है। गरीब का मजबूरी कौन समझता है बाबू? हम तो पैदा ही मरने के लिए होते हैं। गरीब हैं ना.....!!!!!!
नींद हमें भी तो नहीं आ रही.....

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