इतनी जल्दी हार नहीं मानना चाहता था अपना 'पान सिंह तोमर '

ऐसा नहीं है कि राजकपूरअमिताभ बच्चन से लेकर राजेश खन्ना और अभी आमिर खान की अदाकारी में दम नहीं है पर मामला क्लास वाला है। वो सबमें नहीं होता और मेरी जितनी समझ हैउसके मुताबिक़ दिलीप साब के बाद इरफ़ान ही इस ‘क्लास’ वाले कप को थामे दिखते हैं "

Nadim S. Akhter 29 April 2020


मुझे आज दोपहर में ये ख़बर पता चली कि संजीदा #एक्टर #इरफ़ान #खान का इंतकाल हो गया। जानकर झटका सा लगा और दिमाग़ में ये बात कौंध गई कि अरे ! अभी कल ही तो ख़बर आई थी कि उन्हें मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में एडमिट कराया गया है। विदेश से इलाज कराके ठीक होकर लौटे थे। फिर अचानक ! क्या हुआ ? और फिर एकसाथ इरफ़ान की कई फ़िल्मों के किरदार मेरी आँखों के सामने घूम गए। बॉलिवुड का वो गाना याद गया कि रोते हुए आते हैं सब, हंसता हुआ जो जाएगा, वो मुक़द्दर का सिकंदर जानेमन कहलाएगा। इरफ़ान मुक़द्दर का सिकंदर तो बने पर शायद हंसते हुए इस दुनिया से विदा नहीं हुए। वह अभी और जीना चाहते थे। ऐसा पिछले दिनों उन्होंने कहा था। वह उन अपनों के लिए ज़िंदगी को गले लगाना चाहते थे, जो बीमारी में दिन-रात खड़े होकर उनकी तीमारदारी कर रहे थे। पर अफ़सोस ! ऐसा हो ना सका। #बॉलिवुड का एक जगमगाता #सितारा, जो अभी जवान हो ही रहा था, वह असमय काल के गाल में समाकर बुझ गया। भारतीय और विश्व सिनेमा को एक बहुत बड़ा नुक़सान हो गया।


आज शाम जब सोशल मीडिया पर तैरकर दिनभर की बड़ी ख़बरों की टोह ले रहा था, तो हर जगह मुझे इरफ़ान खान से संबंधित पोस्ट्स दिखीं। क्या फ़ेसबुक और क्या ट्विटर, हर ख़ास और आम इरफ़ान को श्रद्धांजलि देता दिखा। अलग-अलग विचारधाराओं वाले भी और जुदा-जुदा खोमचे वाले भी। ऐसा लगा कि इरफ़ान के जाने के ग़म में पूरा देश एक हो गया। हिंदू-मुसलमान के बीच नफ़रत बोने के इस दौर में एकमुसलमान अभिनेताके जाने पर देश में शोक की ऐसी लहर देखकर आज एक बार फिर लगा कि अभी हमारे समाज का बेसिक धागा टूटा नहीं है। अभी भी लोग कम से कम पर्दे की दुनिया में धर्म और सम्प्रदाय का भेद नहीं करते। ऐसी ख़बरें भी आईं थीं कि इरफ़ान खान ने अपने नाम के आगे सेखानशब्द हटा लिया है क्योंकि वह अपनी पहचान अपने काम से करना चाहते थे, अपने धर्म से नहीं। वैसे देश में शोक की ऐसी लहर एक और मुसलमान के जाने पर दिखी थी-मरहूम डॉ. एपीजे अब्दुल #कलाम साब। तब कुछ लोगों ने कहा था कि देश के हर मुसलमान को डॉ. कलाम जैसा बनना चाहिए। उस वक़्त हमने पूछा था कि क्यों ? तब इस देश के हर हिंदू को महात्मा #गांधी सरीखा और रवींद्रनाथ #टैगौर जैसा क्यों नहीं बनना चाहिए? ये क्या अजीब तुलना और तर्क है। हर इंसान की अलग अपनी शख़्सियत होती है। मरहूम इरफ़ान ना तो कलाम बन सकते थे और ना मरहूम कलाम साब, इरफ़ान। खैर! इस मुद्दे पर फिर कभी लिखूँगा वरना विषय से भटक जाऊंगा।


तो मैं बता रहा था कि जब इरफ़ान खान की मौत की ख़बर मिली तो उनकी फ़िल्में फ्लैशबैक की तरह मेरे दिमाग़ में कौंध गईं। सबसे पहले मुझे उनकी वो फ़िल्म याद आई, जो मेरे दिल के बहुत क़रीब है- पान सिंह तोमर। उस फ़िल्म को देखते वक़्त मुझे ऐसा लगा मानो मैं टाइम ट्रावेल करके इतिहास को अपने सामने घटित होता देख रहा हूं। इतना जीवंत अभिनय ! शानदार। इस फ़िल्म को देखने के बाद ही मैं इरफ़ान का मुरीद बना। हालाँकि इससे पहले भी उन्होंने कई जानदार एक्टिंग वाली फ़िल्में करके अपना लोहा मनवा लिया था पर अपन सख़्त जान हैं। कोई चीज दिल को जल्दी लुभाती नहीं। पर उस दिन पान सिंह तोमर वाले इरफ़ान पर अपना दिल गया। उसके बाद जब भी कभी मैं टीवी या अख़बार में इरफ़ान खान को देखता तो रुक जाता। फिर एक दिन ख़बर आई कि इरफ़ान ने ख़ुद ट्वीट करके दुनिया के सामने ये खुलासा किया है कि उन्हें एक गंभीर बीमारी है पर वह इससे लड़ेंगे। उन्हें दुआओं की दरकार है। हमने भी उनके लिए दुआ की। वो ठीक होकर लौट आए। उनके प्रशंसक और मुझ जैसा कद्रदान खुश था। पर वो कहते हैं ना कि मौत तो बहाना ढूँढती है। इरफ़ान खान की मौत का भी बहाना हो गया। ठीक वैसे ही, जैसे मशहूर और दिग्गज फ़िल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा का हुआ था। वह तो मच्छर के काटने से होनी वाली बीमारी से असमय चले गए। डेंगू से। इलाज की सारी सुविधाओं के बाद भी नहीं बचे। उनका जाना भी मुझे ऐसे ही खला था। तब मैंने लिखा था कि आज बॉलिवुड का रोमांस चला गया। अब भारत की फ़िल्मों में ना वैसी चाँदनी दिखेगी और ना वो सिलसिला। डेंगू बीमारी उनकी मौत का बहाना बन गई। और अब इरफ़ान। पर इरफ़ान तो अभी उभर रहे थे। उनका बेस्ट आना अभी बाक़ी था। लेकिन अब ये कभी नहीं हो पाएगा। अफ़सोस !!

इरफ़ान की एक्टिंग का जब मैं मुरीद बना तो टीवी पर एक बल्ब के विज्ञापन को मैं चाव से देखता था। उस बल्ब का नाम है- सिसका एलईडी। उस विज्ञापन का मैंने साइकोलॉजिकल आब्जर्वेशन भी किया। कि इरफ़ान कैसे उस बल्ब को बेच रहे हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज क्या है? वो बोल क्या रहे हैं? तब मैंने पाया कि विज्ञापन बनाने वाली कंपनी की कॉपीराइटिंग टीम ने इरफ़ान के खिलंदड़ व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर ही पूरे ऐड का कॉनसेप्ट और डायलॉग लिखे होंगे। ये कमाल की बात थी। ऐसा अमिताभ बच्चन जैसे एक्टर्स के लिए किया जाता रहा है पर इतनी कम उम्र में इरफ़ान के लिए अगर ये सब हुआ होगा, तो इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनके व्यक्तित्व की छाप एक विज्ञापन पर भी दिखती थी। 


इरफ़ान खान की एक्टिंग और काम का लोहा दुनिया ने माना। वह हॉलिवुड तक गए। पर असल बात ये नहीं है। भारत जैसे देश में जहां 'फ़िल्मों में जाना मतलब अच्छी शक्ल-सूरत वाला होनाजैसी मान्यताएँ प्रचलित हैं, वहाँ बेहद मामूली नैन-नक़्श वाले इरफ़ान खान ने नसीरुद्दीन शाह और ओमपुरी जैसे अभिनेताओं की परंपरा को आगे बढ़ाया। अपनी एक्टिंग के दम पे अपनी पहचान बनाई। नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी जैसे कलाकार भी इसी लीग को आगे बढ़ा रहे हैं। और भी कई नाम हैं पर इरफ़ान सबसे जुदा थे। एक्टिंग की दुनिया के जानकार कहते हैं कि वह नैचुरल एक्टर थे। उन्हें अभिनय करना नहीं पड़ता था। यह उनके अंदर से निकलता था। यही बात एक एक्टर और एक लीजेंड का फ़र्क़ बताता है। मेरी बात करूँ तो मुझे दिलीप कुमार के बाद इरफ़ान खान की एक्टिंग ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया। ऐसा नहीं है कि राजकपूर-अमिताभ बच्चन से लेकर राजेश खन्ना और अभी आमिर खान की एक्टिंग में दम नहीं है पर मामला क्लास वाला है। वो सबमें नहीं होता और मेरी जितनी समझ है, उसके मुताबिक़ दिलीप साब के बाद इरफ़ान ही इसक्लासवाले कप को थामे दिखते हैं।

इरफ़ान खान के जीवन और एक्टिंग में उनके संघर्ष पर ज़्यादा बात नहीं करुंगा क्योंकि अमूमन हर ज़मीन से उठे माटी के लाल को इसका सामना करना ही करना होता है। इरफ़ान भी अपवाद नहीं थे। राजस्थान के एक छोटे से शहर से निकलकर उन्होंने एक्टिंग की ट्रेनिंग ली, टीवी सीरियल्स में काम किया, संघर्ष किया, फिर फ़िल्में मिलीं, शुरु में पहचान नहीं मिली, वे लगे रहे और एक दिन अपनी अदाकारी से सबको मुतास्सिर कर दिया। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हाँ, चूँकि वह संजीदा कलाकार थे, सो फ़िल्में उन्होंने बहुत चुनिंदा कीं। और जो किया, चाहे वह कितना ही छोटा रोल क्यों ना हो, उसे दिल से किया। उस किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया। 


ये जानकर निजी तौर पर मुझे और अफ़सोस हुआ कि चंद रोज़ पहले इरफ़ान की अम्मी का राजस्थान में निधन हो गया पर बेटा, माँ के जनाज़े में शामिल नहीं पाया। लॉकडाउन के चलते वीडियो कॉल के मार्फ़त ही इरफ़ान ने बेटा होने का फर्ज निभाया। यह  उनके जैसे संवेदनशील इंसान के लिए बहुत बड़ा सदमा रहा होगा, जो उन्हें अंदर से और तोड़ गया होगा। और कुछ ही दिन बीते, आज ये ख़बर गई कि बेटा भी अपनी अम्मी के पास चला गया। इस फानी दुनिया को छोड़कर, दूसरी दुनिया में। पर एक बात है, जो बार-बार मुझे कचोटती है। इरफ़ान अभी और जीना चाहते थे। अपनों के लिए। ऐसी ख्वाहिश थी उनकी। फिर भी उन्हें जाना पड़ा। वो हंसते हुए तो नहीं ही गए होंगे। दिल पर एक बोझ लेकर गए होंगे। मजूबरी रही होगी क्योंकि खुदा के हुक्म के आगे इंसान बेबस है। बस, हम जैसे लोगों को ये लगा था कि इरफ़ान भाई अब एकदम ठीक हैं। तंदुरुस्त होकर विदेश से लौट आ, क्रिकेटर युवराज सिंह की तरह, मनीषा कोइराला की तरह। एक अच्छे फाइटर की तरह मौत को उन्होंने भी मात दे दी। पर नियति के अपने फ़ैसले होते हैं। वह निष्ठुर है। इस दफ़ा पर्दे का चमकता सितारा इंटरवेल में ही बुझ गया। 

अल्लाह इरफ़ान भाई की रूह को सुकून दे और उन्हें जन्नत नसीब करे, हम क़द्रदानों की तो उनके लिए यही दुआ है। 

आमीन !!

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