ये देश करामात से चल रहा है, भगवान भरोसे नहीं

"#UPA के दौर में जब प्याज़, पेट्रोल और भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष यानी बीजेपी सड़को पे होती थी, तो यही जनता विपक्ष को पप्पू नहीं बोलती थी। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत ज़मीन पर है पर पेट्रोल के दाम नहीं घटे। प्याज़ 20 रुपये से 100 रुपये किलो और फिर 40-50 रुपये किलो पर आकर महीनों से ठहरा हुआ है पर पब्लिक को कोई ग़म नहीं "


Nadim S. Akhter, 24th March 2020


वैसे राहुल गांधी की छवि पप्पू की बना दी गयी है। व्हाट्सएप्प पर और टीभी के #SoSorry पे उनको लेकर इतने लतीफे सुनियोजित तरीके से बनाए गए कि इस देश ने अपना विपक्ष ही खो दिया। राहुल बोलते हैं तो भाई लोगों को लगता है कि हल्की बात कर रहे हैं। #UPA के दौर में जब प्याज़, पेट्रोल और भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष यानी बीजेपी सड़को पे होती थी, तो यही जनता विपक्ष को पप्पू नहीं बोलती थी। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत ज़मीन पर है पर पेट्रोल के दाम नहीं घटे। प्याज़ 20 रुपये से 100 रुपये किलो और फिर 40-50 रुपये किलो पर आकर महीनों से ठहरा हुआ है पर पब्लिक को कोई ग़म नहीं। 



अब कोरोना और कंगाली के हालात हैं। देश की लुटिया डूब रही है पर पार्टी भक्ति और व्यक्ति पूजा में लोग मगन हैं । हैरत मत करिएगा जब यही लोग कल किसी और पार्टी की भक्ति और किसी अन्य दल के नेता की पूजा में बिजी रहेंगे। मामला अब India is Indira से बहुत आगे बढ़ चुका है। देश में जो राजनैतिक संस्कृति पनपी है और जनता में जिस कदर लोकतंत्र के भाव का पतन हुआ है, उसका नतीजा देश आगे भुगतेगा। आगे से जो भी पार्टी केंद्र की सत्ता में आएगी, वह मीडिया को कुत्ता बनाकर रखेगी, पब्लिक को व्हाट्सअप की अफीम चटाती रहेगी और उद्योगपतियों को लोन देकर उसे NPA बनाकर देश के पैसों की लूट करेगी। जो आज हो रहा है, वह कल भी होगा। नेताओं ने नाप लिया है कि ये देश अब कितना मूर्ख बन चुका है। सो रोटी सभी सकेंगे। बारी-बारी। 

और हां! कोर्ट भी अब से दरबारी ही होगा। जो विधायिका और कार्यपालिका कहेगी, न्यायपालिका आंख मूंदकर उस पे मुहर लगाएगी। ये निजाम भी बन गया है। इस देश की जनता अपने हालात के लिए खुद ज़िम्मेदार है। बाकी हिन्दू-मुस्लिम डिबेट चलता रहेगा। मुसलमान वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होते रहेंगे और नेता वोट लेकर उन्हें लात मारते रहेंगे। और कुछ नहीं तो arvind kejriwaal से पूछ लीजिए! ताज़ा लात इन्होंने भी मारी है दिल्ली में। एक चक्र पूरा किया है। बेचारे मियां! ना पाकिस्तान जा पाए, ना हिंदुस्तान ने अपनाया। 





बाकी हिंदुओं में जातियों की अपनी लड़ाई तो है ही। फिर नार्थ इंडिया और दक्षिण भारत की एक अलग लड़ाई है। उसके बाद नार्थ ईस्ट से लेकर कश्मीर एक अलग झमेला है। पंजाब भी लुढ़कता रहता है। इसके बाद आर्य और नॉन आर्य का बंटवारा है। बीच में कहीं साम्यवाद और किसी कोने में समाजवाद से लड़ाई है। सेना की अपनी मुसीबतें हैं और पुलिस यहां बेलगाम है। ब्यूरोक्रेट्स अंग्रेज़ी राज़ के अफसर बने बैठे हैं और कोर्ट में लॉबीइंग चल रही है। अभी रंजन गोगोई ने भी इस बारे में बोला है। उन्होंने तो सुप्रीम कोर्ट को बेचने की बात पे मुहर लगा दी है। चीफ जस्टिस रिटायर होते ही किसी पार्टी का प्रसाद पाएगा, कोई हर्ज नहीं। मतलब देश इतने झंझावातों में फंसा है कि बस कोई भी हाथ जोड़ ले कि यार गज़ब देश है। चल कैसे रहा है। तो फिर वही पुराना जवाब-भगवान भरोसे। और कोरोना का क्या? तो जवाब होगा वायरस के भरोसे। उसे रहम आ जाए तो छोड़ देगा वरना जनता का क्या है? ज़िंदा रहेगी तो अगली दफा फिर वोट डाल आएगी। ये देश करामात से चल रहा है। भगवान का तो बहाना है।

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