हमारा दौर कुछ और रहा, आज का दौर कुछ और है

Nadim S. Akhter 20 March 2020




ये सत्तू के पराठे, सेम की सब्ज़ी और चाय मैंने बनाई। A to Z. पाक कला ठीक-ठाक सीख गया हूँ। बिरयानी से लेकर चिकन-मटन पुलाव और हर तरह की सब्ज़ी बना लेता हूँ। #Youtube की भी मदद लेता हूँ। बर्तन भी धोता हूँ। पूरे मन से। ये बेसिक काम हैं, जो सबको आने चाहिए। जब स्कूल में था तो वहां 100 नम्बर का एक विषय था-कार्यानुभव। उसमें हम रूमाल में हेम करने से लेकर धागे से फूल-पत्ती बनाने और बटन लगाने से लेकर काज बनाने तक का काम सीखे। उसी में रस्सी से डोर मैट बुनना और तरह-तरह की कलाकारी से घर सजाने के समान बनाना भी सीख गया। तब अम्मी से स्वेटर बुनने की भी ट्रेनिंग ली थी। चूंकि हम मिशनरी स्कूल में पढ़े, सो क्लास के बाद कक्षा में झाड़ू लगाकर उसकी सफाई भी खुद करनी पड़ती थी। चार दल थे-सत्य, सेवा, प्रेम, प्रगति। बारी-बारी से सब काम करते थे। बहुत दिनों तक स्कूल के टॉयलेट की सफाई की भी ड्यूटी लगी, जो हम सब बच्चे शनिचर के दिन मिलकर करते थे। बाद में अभिभावकों के विरोध के चलते टॉयलेट की सफाई तो बंद कर दी गयी पर बाकी काम चालू रहे। हमें स्कूल के रास्ते की सफाई भी करनी पड़ती थी। खर-पतवार साफ करने से लेकर कागज़ और प्लास्टिक हटाने तक। पूरी टीम जुटती थी। ये ट्रेनिंग मुझे बचपन से ही मिली। मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान तो अभी शुरू हुआ, मेरे स्कूल, St Anthony School ने ये ट्रेनिंग मुझे बचपन में ही दे दी थी। यही कारण है कि घर-बाहर का हर काम मुझे आता है। सिलाई मशीन चलाना भी सीखा। घर में। पहले हाथ वाली मशीन थी, फिर अब्बू ने उसमें पावदान लगवा दिया। कपड़े भी खूब सिले मैंने। एक बार तो मुहल्ले के दर्ज़ी मास्टर से एक छोटा शर्ट कटवाकर लाया और घर पर सिला। बहुत मज़ा आया। सबको दिखाया कि ये शर्ट मैंने सिली है। 


लेकिन आजकल की जनरेशन एकदम अलग है। वे स्कूल में अपनी क्लास में कभी झाड़ू लगाएंगे, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। टॉयलेट की सफाई तो बहुत दूर की बात है। ज़माना बहुत बदल गया है। पर मुझे अपना वाला वक़्त ही ठीक लगता है। आज मैं जो कुछ भी हूँ, किसी काम और इंसान को छोटा-बड़ा नहीं समझता, उसमें मेरे स्कूल की सीख का भी बहुत बड़ा योगदान है। अब ना वैसे टीचर रहे, ना स्कूल और ना माहौल। घर का माहौल भी बहुत बदल गया है। बच्चे कंप्यूटर, टीवी और मोबाइल फोन से चिपके रहते हैं। बच्चों की परवरिश एक बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। पहले शुरुआत घर से होती है, फिर स्कूल का रोल आता है। अपने बच्चों को दुनिया की समझ दीजिए, उनको रोबॉट मत बनाइए।

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