कोरोना के बाद फिर उठ खड़ा होगा शाहीनबाग

"मुझे लगता है कि #कोरना मामले के खात्मे के बाद शाहीनबाग फिर जुट जाएगा क्योंकि ना तो #NPR रुक रहा है और ना #NRC और ना ही #CAA. "

Nadim S. Akhter 24th March 2020

शाहीनबाग पर क्या लिखूं? #Corona के चलते सब पीछे हट गए और मौके की नज़ाकत को देखते हुए #Delhi #Police ने तम्बू-टंटा उखाड़ दिया। लोग रोकने नहीं आए क्योंकि उनके अनुसार देशहित में फिलहाल वहां से हटना सही है। पर जिस तरह पुलिस ने तम्बू हटाए, उससे लोगों में गुस्सा है।


मुझे लगता है कि #कोरना मामले के खात्मे के बाद शाहीनबाग फिर जुट जाएगा क्योंकि ना तो #NPR रुक रहा है और ना #NRC और ना ही #CAA. और पहली अप्रैल से जब #एनपीआर लागू होगा और फॉर्म भरवाए जाएंगे तब हल्ला और तेज़ होगा। सिर्फ मुसलमान नहीं, हिन्दू और सभी धर्मों के लोग। अगर उसमें मा-बाप के जन्मस्थान और तारीख का ज़िक्र करना होगा तो सब बिलबिलाएंगे। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान और क्या सिख ईसाई, सब की आफत होगी क्योंकि इसी NPR में जब सबूत यानी डॉक्यूमेंट्स मांगे जाने लगेंगे तो वह NRC का रूप धर लेगा।

तो नागरिकता जाने का डर सबको है। सिर्फ मुसलमानों को नहीं। हिन्दू से लेकर सारे मज़हब के लोग अपने माँ-बाप के जन्म का प्रमाण पत्र लेकर बैठे होंगे, सिर्फ मुसलमानों के पास ये नहीं है, ऐसा सोचना मूर्खता है। फिर जब ये छटपटाएंगे तो इनको #शाहीनबाग़ याद आएगा। कहाँ जाएंगे अपनी पीड़ा सुनाने! किस मंच पर? तो सारे धर्मों के लोग मिलकर शाहीनबाग को फिर ज़िंदा कर देंगे। मेरी बात याद रखिएगा। अबकी बार अगर रोड पे तम्बू नहीं लगा, तो कहीं और लगेगा पर लगेगा ज़रूर और उसे जनता ही लगाएगी।


कुछ बहुत ही भद्दे पोस्ट शाहीनबाग को लेकर #सोशलमीडिया पर देखे। ये वही मानसिकता है, जो थाली पीटने से कोरोना वायरस के मर जाने पर यकीन रखते हैं। पर जब प्याज़ सही जगह पर कटेगा (असली कहावत फेसबुक पर नहीं लिख सकता) तो बाप-बाप पहले यही चिल्लाएंगे क्योंकि माँ-बाप का जन्म प्रमाणपत्र इनके पास भी नहीं है। तो नागरिकता इनकी छिन जाने का खतरा है। फिर अगर हिन्दू या किसी अन्य मज़हब (मुसलमान को छोड़कर, CAA में सिर्फ उन्हीं को नहीं मिलेगी) का होने के नाते अगर वे CAA के मार्फ़त नागरिकता दोबारा पाने की कोशिश करेंगे तो पहले इनको साबित करना होगा कि ये पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश से भागकर आए हिन्दू हैं। ये फर्जी काम भी ये नहीं कर पाएंगे। फिर भारत माता की जय बोलते हुए ये खुशी-खुशी #detention #centre में चले जायेंगे कि देश के लिए इतना तो बनता ही है। भगत सिंह ने जान दी थी, हमने नागरिकता दे दी। 

और अगर ऐसा नहीं है, नागरिकता न्योछावर करने का जुनून आपमें नहीं है तो फिर क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, सब सड़क पर होंगे क्योंकि ये देश में बने रहने की उनकी आखिरी लड़ाई होगी। तब वे लोग ऐसा मंच ढूंढेंगे, जहां से अपनी बात वे देश और दुनिया तक पहुंचा सकें और फिर उन्हें शाहीनबाग की याद आएगी। और देखते ही देखते शाहीनबाग पार्ट-2 उठ खड़ा होगा। ये जनता का आंदोलन है, सभी धर्मों के लोग इसमें साथ रहे। लंगर चलाया। सिखों ने तो आंदोलन की सुरक्षा भी की। 


इसलिए आधी रात में कोरोना से उपजे हालात का फायदा उठाकर अगर पुलिस शाहीनबाग का तम्बू उखाड़ देगी तो क्या लगता है आपको? आंदोलन खत्म हो गया? बहुत भोले या फिर बहुत बड़े वाले मूर्ख हैं आप? लगता है कि अपने गांधी को पढ़ा नहीं। क्या उनका पूरा आंदोलन चंपारण से चला? नहीं ना। चंपारण तो आगाज़ था, अंजाम आज़ादी थी। उसी तरह शाहीनबाग जनता का आगाज़ है, अंजाम भविष्य के गर्भ में है। पर एक बात तय है। जनता के आंदोलन के सामने दुनिया की कोई सत्ता आज तक टिक नहीं पाई। इसलिए जनता को कभी चैलेंज मत करिए। अंग्रेज़ से लेकर इंदिरा और फिर अब तक, जनता चढ़ के ही बैठी है। और जब हवन यानी NPR, NRC की बेला आएगी तो ये आंदोलन अपने चरम पर होगा। आप भी सड़क पे होंगे क्योंकि नागरिकता आपकी भी जा रही होगी। सरकार संसद में क्या बोलती है, उस पे ना जाइए। क़ानून में क्या लिखा है, उसे देखिए। 


अभी शाहीनबाग का हाल ठीक उसी तरह है जब गांधी जी ने चौरा चौरी के कारण आंदोलन स्थगित कर दिया था। लेकिन आज़ादी की लड़ाई फिर उठ खड़ी हुई। शाहीनबाग भी वही करेगा। अब वह CAA के विरोध का दुनियाभर में symbol है, महज़ कुछ लोगों का जमावड़ा नहीं। इसने देशभर में शाहीनबाग बनाए हैं। उसको हलके में लेने की भूल मत कीजिएगा। 

बाकी कुछ बिन पेंदी के लोटों को भी सोशल मीडिया पे देखा जो शाहीनबाग पे पलट गए हैं। अबे चिरकुटों! रंगा सियार पकड़ में आ ही जाता है एक दिन। अगर स्टैंड लो तो फिर डंटे रहो। ये मौसमी कोरोना को देखकर और तथाकथित जनभावना के दबाव में progressive दिखने की कोशिश ना करो। जो अलग चलता है, वही दुनिया को राह दिखाता है, भीड़ का भेड़ नहीं। समझे!!!

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