सिर्फ़ क़ुरआन पढ़ने से काम नहीं चलेगा, उसे समझना भी होगा

" इस्लाम में क़ुरआन को पढ़कर उसके मायने समझने की सख्त हिदायत है। अल्लाह की नज़र में जब तक क़ुरआन पढ़कर आपने समझा नहीं, आपकी क़ुरआन की तिलावत मिट्टी है "


नदीम एस. अख़्तर


भारत के ज्यादातर मुसलमान अरबी में लिखी क़ुरआन झूमकर पढ़ते हैं पर ज्यादातर उसका मतलब नहीं समझते। सिर्फ पढ़कर सवाब यानी पुण्य कमा लेते हैं। मौलाना क़ुरआन पढ़ना सिखाने में हिज्जे और तलफ़्फ़ुज़ पे छड़ी चलाता रहता है। क़ुरआन पढ़ना आ जाए, बस!! मतलब किसको पता है? 
जबकि क़ुरआन को पढ़कर उसके माने समझने की सख्त हिदायत है यानी अल्लाह की नज़र में जब तक क़ुरआन पढ़कर आपने समझा नहीं, आपकी क़ुरआन की तिलावत मिट्टी है। कुछ लोग हिंदी, उर्दू या अंग्रेज़ी में क़ुरआन का अनुवाद पढ़ लेते हैं। उनमें से जो थोड़े से हिकमत वाले हैं, वे उसका भाव समझ पाते हैं। 



इस्लाम में नीयत का ही खेल है। अगर आपने नीयत कर ली, तभी नमाज़ होगी, वरना नहीं होगी। इसी तरह अगर आपने हज पर जाने की नीयत कर ली और फिर आर्थिक कारणों से नहीं जा पाए या फिर आपकी मौत हो गयी तो आपका हज मुकम्मिल है क्योंकि आपने नीयत कर ली थी। अल्लाह के दरबार में वह क़ुबूल है। तभी कहा गया है कि जैसी नीयत, वैसी बरकत।
भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम झूमकर क़ुरआन पढ़ने तक महदूद रह गया। ज्यादातर मुसलमान अरबी में क़ुरआन पढ़ना तक नहीं जानते, उसका तर्जुमा और मतलब पढ़ने व समझने की बात तो दूर की कौड़ी है। तभी ये लोग मौलाना और ठगों के चक्कर में फंसते हैं। अलग-अलग इदारे बना लिए हैं। 
इस्लाम में इल्म हासिल करने पे सबसे ज्यादा जोर है और भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान इल्म की रोशनी से ही सबसे ज्यादा दूर हैं। क़ुरआन पढ़ने की नहीं, जीवन में अमल में लाने की चीज़ है। बाकी गैर-मुस्लिमों में क़ुरआन को लेकर इतनी भ्रांतियां हैं कि कुछ कहना ही नहीं। वे खुद तो पढ़ते नहीं, बाकी फेक न्यूज़ और प्रोपोगंडा के चक्कर में आकर अपनी मति खुद मार लेते हैं। गलत राय बना लेते हैं। भारत का मुसलमान जितना दूसरे मज़हब के बारे में जानता है, दूसरे मज़हब वाले इस्लाम के बारे में उसका 10 फीसद भी नहीं जानते। ये तो हाल है।



फिर भी ज़माना देखिये। सब यहां ज्ञानी हैं। ध्यानी हैं। अपनी-अपनी राय बनाए हुए है। धर्म के नाम पे धंधा है। हिंदुओं में भी संस्कृत गिने-चुने लोग ही पढ़ पाते हैं। बाकी की व्याख्या के लिए पंडिज्जी पर निर्भर हैं। बाकी नास्तिकों की भी यहां भरमार है। वे भगवान को कपोल कल्पना मानते हैं। खुद को इतिफाक से अलग-अलग रसायनों के सम्मिश्रण से बना हुआ मानते हैं। जिनका ये भी दृढ़ विश्वास होता है कि इनके शरीर में कोई आत्मा या रूह नहीं। बस दिल धड़क रहा है और ये जी रहे हैं। रोबॉट की तरह। 
मैं तो ईश्वर/अल्लाह की सत्ता स्वीकारता हूँ। विज्ञान और धर्म ग्रन्थों के माध्यम से उसे समझने की कोशिश करता हूँ। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं कि अपने सौरमण्डल में नीला गोला है और ये भी इत्तेफ़ाक़ नहीं कि वैज्ञानिक हैरान रहते हैं कि पृथ्वी की दूरी सूर्य से, इसकी अपनी धुरी पे गति, इसकी सूरज के चारों ओर घूमने की कक्षा, सबसे बड़े ग्रह वृहस्पति से इसकी दूरी, हमारे सौरमण्डल के निकट सूरज जैसे किसी और तारे का ना होना या फिर सूरज से बड़ा कोई ब्लैकहोल ना होना, हमारी आकाश गंगा की उम्र अभी बची होना ताकि जीवन पृथ्वी पे फलता-फूलता रहे, पृथ्वी के अपने मैग्नेटिक घेरे की वजह से सूरज की खतरनाक किरणों और सौर तूफानों से इसका और इसके वातावरण का बचे रहना आदि-आदि ऐसे अनेकानेक कारण हैं, जो सोच में डाल देते हैं। क्या इतने सारे इत्तेफ़ाक़ हो सकते हैं जो पृथ्वी पे जीवन को संभव बनाते हैं! अगर आप अंतरिक्ष विज्ञान की थोड़ी बहुत जानकारी भी रखते हैं तो जानते होंगे कि ये करिश्मा ही है, जो पृथ्वी पे जीवन है वरना अरबों ग्रह हमारी निगाह से गुजरे, सब जगह वीराना है। जीवन का नामोनिशान तक नहीं। 
इसलिए धर्म के नाम पर लड़िए मत और खुद के ज्ञानी होने का दम्भ भी मत पलिये। इंसान की औकात एक चिरकुट से भी बदतर है, जो नहीं जानता कि वह इस पृथ्वी पे क्यों है? भगवान को जानना-समझना तो दूर की बात है।

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