स्कॉलर की क़लम की स्याही शहीद के खून से भी ज्यादा पवित्र है : पैग़म्बर मुहम्मद

Nadim S. Akhter


इस्लाम के आखिरी पैगम्बर हज़रत मुहम्मद साहब ने कहा था कि ज्ञानी/विद्वान/स्कॉलर की क़लम की स्याही, एक शहीद के खून से भी ज्यादा पवित्र होती है।



कहने का आशय ये है कि तालीम वाले और समझ वाले लोगों की पूछ अल्लाह के दरबार में सबसे ज्यादा होगी क्योंकि क़ुरआन में अल्लाह भी कहते हैं कि 

" He grants Hikmah to whom He pleases, and he, to whom Hikmah is granted, is indeed granted abundant good. But none remember (will receive admonition) except men of understanding."
Quran (Surah Al-Baqara, Verse 269)

अर्थात अल्लाह जिसे चाहता है, उसे हिकमा यानी ज्ञान/समझ और बुद्धिमत्ता से नवाजता है। और जिसे ये बुद्धिमत्ता मिलती है, उसे तोहफे में बहुत सारी अच्छाइयां भी मिलती हैं। लेकिन जो समझ वाले हैं, केवल वही इसे याद रखते हैं यानी इसकी कद्र करना जानते हैं।

ऊपर मैंने एक पैगम्बर हज़रत मुहम्मद साहब की कही बात बताई है और दूसरी खुद अल्लाह की जुबानी वो बात, जो क़ुरआन में आयत के रूप में दर्ज हुई। दोनों ही जगह विद्या, ज्ञान, समझ, बुद्धिमत्ता और सोचने-समझने की तासीर को अव्वल बताया गया है। मुहमद साहब ने तो यहां तक कहा था कि अगर इल्म हासिल करने के लिए चीन भी जाना पड़े, तो उतनी दूर जाओ। मगर इल्म हासिल करो क्योंकि ये इस दुनिया और इसके बाद की दुनिया में तुम्हारे बहुत काम आएगी। 


यहां इल्म से मतलब तोता रटंत ज्ञान से नहीं है। इल्म मतलब ज्ञान-विज्ञान, खोज, अविष्कार और दुनियादारी की समझ। जिसने ये हासिल कर लिया, दुनिया को समझ गया, अपने अधिकार जान गया, मां-बाप, रिश्तेदार, समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को पहचान गया, दुनिया को कुछ नया देना सीख गया, वही बुद्धिमान है। वही पंडित है। वही ज्ञानी है और वही इल्म का हाकिम है। उसके कलम की स्याही का मर्तबा, एक शहीद के खून से भी बुलन्द है। आला है। पवित्र है। चूंकि इस्लाम में शहादत ( इंसानियत के लिए और अल्लाह के लिए) का बहुत मर्तबा है, जिसे ultimate sacrifice कहते हैं, जो कुर्बानी के त्योहार में दिखता है, ऐसे में आलिम की कलम की स्याही का मर्तबा शहीदों के खून से भी बड़ा रखना ज्ञान के प्रति इस्लाम का नज़रिया बताता है। 

यानी अगर आपके पास इल्म है, ज्ञान की समझ है तो आप अल्लाह की नज़र में सबसे आगे हैं। आपकी कलम में वो ताक़त है, जो पूरी मानवता को सही रास्ता दिखा सकती है और भटके हुए लोगों को ज्ञान की असल रोशनी तक ला सकती है। कल रात मुझे एक सपना आया और सुबह उठा तो खंगालने लगा कि उसका मतलब क्या है। बहुत कुछ पढ़ डाला। समझ ये आया कि पैगम्बर हज़रत नूह अ. स. ने बाढ़ का इंतज़ार ज़रूर किया, पर इससे पहले वह लोगों को सच्चाई से अवगत कराते रहे। जब अल्लाह का हुक्म हुआ, तभी उन्होंने नाव बनाई (हज़रत नूह और बाढ़ की बातें मैंने अपनी पिछली पोस्ट में लिखी हैं) । सो लब्बोलुबाब ये है कि दुनिया के हर मनुष्य को निरन्तर कुछ नया सीखने और दुनिया को देने का यत्न करते रहना चाहिए। आंख-कान बंद करके कुएं का मेंढक नहीं बनना चाहिए। दुनिया का सबसे बड़ा हुनर है-लिखना। क्योंकि लिखकर आप अपने ज्ञान, अपने दर्शन और अपनी समझ को बहुत सारे लोगों तक पहुंचा देते हैं, जो उनके काम आता है। फिर वो अपनी तरफ से उस ज्ञान में और इजाफा करते हैं और ये सिलसिला चलता रहता है। दुनिया के तमाम रिसर्च और जनसंचार के लेखन इसी से समृद्ध होते रहे हैं। 



अपना सपना तो पूरी तरह समझ नहीं पाया पर उसे हल करने के चक्कर में आज एक नई अनुभूति हुई। मेरे विचार बदले और ये समझा कि सच बोलने से ना पैगम्बर ईसा डरे और ना पैगम्बर मुहम्मद। ना राम और ना कृष्ण। अगर अल्लाह/ सर्वशक्तिमान को आपकी सेवा लेनी होगी तो पैगम्बर हज़रत यूसुफ अ. स. की तरह वो आपको मछली के पेट से सुरक्षित बाहर निकाल लेगा। पैगम्बर मुहम्मद की तरह आपको मकड़े के एक मामूली जाले से ठीक उस वक़्त दुश्मनों की नज़र से दूर कर देगा, जब वह मक्का वालों की ज्यादतियों से तंग आकर उसे छोड़ मदीना जा रहे थे और रास्ते में उनके हाथ आते-आते बचे। 

और अगर इस संसार में आपका कर्तव्य काल समाप्त हो जाए तो सुदर्शन चक्र वाले भगवान कृष्ण की तरह एक मामूली तीर लगने से आपके प्राण जा सकते हैं। भगवान राम को ही देख लीजिए। समझ ये कि पिता का वचन पूरा करने के लिए अपना पूरा जीवन कष्ट में बिताया। यही ज्ञान है। यही समझ है और यही नीति-शास्त्र है। तप का फल सबको मिलता है पर अगर स्वार्थ में उसका उपयोग करेंगे तो गांधारी की तरह उसे दुनिया के हित में इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। जीवनभर आंख पे पट्टी बांधकर जो तपबल आपने अर्जित किया, वह बेटे दुर्योधन के मोह में गवां देंगे।



तात्पर्य ये है कि जीवन में कभी स्थिर ना हों। विचार भी बदलते रहने चाहिए। नजीरें भी और इरादे भी। आज जब सोशल मीडिया पे नफरत और fake news का इतना बोलबाला हो गया है, तो चुप रहना अर्जुन की तरह धनुष उठाने से मना करना है। कई मित्रों के फोन आए, मेसेज आये, सबने यही कहा कि एक लाइन ही लिखिए, पर बोलिए। तभी सपने का अर्थ मैं दिनभर ढूंढता रहा। क़ुरआन की पहली आयात लेकर जब फरिश्ते जिब्रील पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के पास आए तो उन्होंने कहा-एकरा, यानी पढ़िए। पैगम्बर मुहम्मद ने कहा कि लेकिन मुझे तो पढ़ना-लिखना आता ही नहीं! फिर फरिश्ते जिब्रील ने कहा कि पढ़िए, उस अल्लाह के नाम से, जिसने इंसानों को पैदा किया, जिसने इंसानों को जमे हुए खून से पैदा किया, जिसने इंसानों को क़लम के ज़रिए तालीम दी और उसे वह सब कुछ बताया, जो वह पहले नहीं जानता था। 

यानी अल्लाह ने फरिश्ते जिब्रील के माध्यम से पैगम्बर मुहम्मद को जो पहला संदेश भेजा, वह इल्म की ताकत और पढ़ने को लेकर ही है। अल्लाह बता रहा है कि कलम के ज़रिए हम बंदों को वो सब बताते है, जो पहले वह नहीं जानता था। यानी नई खोज करने की अक्ल भी हम ही देते हैं। सो हज़रत नूह, हज़रत मुहम्मद, हज़रत यूसुफ, भगवान राम, भगवान कृष्ण इन सबसे आप क्या सीखते हैं? यही ना कि न्याय के साथ खड़े रहो। और चुप मत रहो। बोलो। होगा वही जो रब ने रच रखा है। इंसान तो निमित्त मात्र है। पर जब तक जिंदा रहो, अपने होने का एहसास और वजूद कायम रखो। फिरौन से लेकर कंस तक और यज़ीद से लेकर रावण तक, बहुत हुए यहां सत्ता और बाहुबल में चूर होकर अट्टाहास करने वाले, लेकिन आखिर में जीत धर्म की हुई, सत्य की हुई और इतिहास में याद उसी को रखा गया, जो सत्य के साथ था, मानवता के साथ था। 


सो यलगार हो! आज हम पैग़म्बर हज़रत यूसुफ को याद करते हैं जो मछली के पेट से सुरक्षित बाहर निकल आए और जालिम उनका बाल भी बांका नहीं कर पाए। हम भगवान कृष्ण को भी याद करते हैं, जिन्होंने कालिया सर्प के विष से ज़हरीले हो चुके सरोवर का जल उसे मारकर पुनः शुद्ध किया। समुद्र मंथन होगा तो विष तो निकलेगा ही, अमृत भी बाहर आएगा पर आज कोई नीलकंठ इस देश में नहीं जो इस विष को पीकर मानवता को बचाने का साहस दिखा सके। हम सबको नीलकंठ बनना पड़ेगा। पूरे समाज को आगे आना पड़ेगा। जिसके पास जो भी सिफत है, जो गुण है, उसका उपयोग करके समाज के पतन को रोकना होगा। हम नहीं माने तो अंत में बाढ़ तो आनी ही है, तांडव नृत्य तो होना है पर तब तक हम चुप नहीं बैठ सकते। सो पुण्यात्माओं! उठ जाओ। यलगार हो!! मेरे गुरु ने कहा कि सच बोलना-लिखना भी इबादत है, सो ये इबादत ना रुके। कर्म कीजिए, फल की चिंता मत कीजिए। 


तो हम लिखने-लिखाने पर वापिस आते हैं। गुरु की वाणी और स्वप्न की व्याख्या यही संकेत देती है। क़ुदरत में कुछ भी अचानक और अकारण नहीं होता। सबका एक प्रयोजन है, उद्देश्य है। एक चींटी से लेकर मक्खी तक को अपने कर्म और कर्तव्यों का ऋण चुकाना होता है। मनुष्य तो सबसे ऊपरी पायदान पे है।हमारी जिम्मेदारी सबसे ज्यादा है। जो ये समझ गया, समझो उसे जन्नत मिल गयी और वह मोक्ष को प्राप्त हुआ।

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