अर्नब प्रकरण तो आग़ाज़ है, भारत में राजनीतिक कटुता अब निजी दुश्मनी में बदलने के आसार

" राजनीतिक कटुता शत्रुता में बदल गयी है। कभी वक़्त था कि कांग्रेस के राज में ज़ी ग्रुप के सुभाष चंद्रा की दिल्ली पुलिस के सामने पेशी हो गयी थी। कटुता इतनी बढ़ी कि आज ज़ी ग्रुप की लाइन बहुत क्लियर है। अपमान कोई नहीं भूलता। एक चींटी भी नहीं "


Nadim S. Akhter 28 April 2020


ऐसा है, कि क्या सही है और क्या गलत, अब इसका टेम नहीं रहा। अब वो ज़माना है कि जिसको जो मिलेगा, वो उसे नोच खाएगा। ये संस्कृति बन चुकी है और हम सब इसके शिकार होंगे। 


पुलिस तो सत्ता की गुलाम होती है। सीबीआई भी। और ईडी भी। तभी मैं शुरू से कह रहा हूँ कि देश में जो नज़ीर बन रही है, वो खतरनाक है। आज जो सत्ता में हैं, कल नहीं होंगे। तब वे लोग उन पे भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़ेंगे, जो आज पनाह मांग रहे हैं। ये तो सीढ़ी पे सीढ़ी है। इस देश में राजनीतिक मिलाप बचा ही कहाँ है! अब सिर्फ कटुता है। सत्ता और विपक्ष अब एक देश की दो टहनियां नहीं, दो अलग-अलग तलवारें हैं। 

सो मुम्बई में अर्नब गोस्वामी प्रकरण से जो चिंगारी निकल रही है, वो तो अभी ट्रेलर है। किससे पंगा लिया गया? सीधे उद्धव ठाकरे से। वो ठाकरे परिवार, जो मुम्बई पर राज करता आया है। उद्धव के राज में वही होगा, जो शेर चाहेगा। कौन रोक लेगा? सोनिया गांधी तो बहाना है। अर्नब ने मुम्बई में कहा कि उन पे हमला हुआ, किया गया। ये सीधे-सीधे किसको चैलेंज था? उद्धव ठाकरे को जो जानते हैं, उनको पता है कि अपने पिता बाल ठाकरे की तरह वो बोलते कम हैं, करते ज्यादा हैं। 


इधर दिल्ली में एक तथाकथित पत्रकार की न्यूज़ चैनल से विदाई हो गयी। फिर शूडो सेना के मोहरे चैनल के मालिक और चैनल हेड को ही घेरने में लग गए। सोशल मीडिया पे। ये किसके इशारे पे हुआ, पता पत्रकार करें। जो तथाकथित पीड़ित है, वो इतना डरपोक निकला कि अपना सोशल मीडिया अकाउंट ही बंद करके भाग खड़ा हुआ। क्रांति की बात करने वाले कायर निकले। पतन देखिये और छद्म आवरण देखिए। ये शतरंज की बिसात है। यहां कोई लेफ्ट और राइट नहीं। तथाकथित लेफ्ट वाला राइट से मिला रहता है और राइट वाला भी दोस्ती निभाता है। 

अर्नब प्रकरण आगाज़ है। राजनीतिक कटुता अब शत्रुता में बदल गयी है। कभी वक़्त था कि कांग्रेस के राज में ज़ी ग्रुप के सुभाष चंद्रा की दिल्ली पुलिस के सामने पेशी हो गयी थी। कटुता इतनी बढ़ी कि आज ज़ी ग्रुप की लाइन बहुत क्लियर है। अपमान कोई नहीं भूलता। एक चींटी भी नहीं। 


सो इंतज़ार कीजिए। मुम्बई में रहना है तो शेर से बैर नहीं कर सकते। और दिल्ली आ जाओगे तो गढ़ खत्म हो जाएगा। ऊंट पहाड़ के नीचे आता है। औकात एक दिन सबको बताई जाती है। वक़्त बलवान होता है। इसीलिए कहता हूँ कि वक़्त से डरो। हमने 6-7 साल अज्ञातवास में काट दिया। राम जी की तरह। सबको देखा, परखा। ऐसा भी नहीं कि हमारे तरकश में तीर नहीं, पर चलाया नहीं कभी। मन नहीं किया। तलवार हर कोई नहीं भांज सकता। सो किसी को कभी चैलेंज मत करिए। एक ने किया था। अहंकार में। आज खुद बाहर है। खेल खत्म हो गया। आगे भी खेल होगा। जीवन है तो क्रीड़ा है।


दुनिया इतनी सिम्पल है नहीं, जितनी दिखती है। बड़े बुज़ुर्ग कह गए कि अपने ज्ञान और बल का ना कभी प्रदर्शन करो और ना अभिमान। ये खुदा को नागवार लगता है। आखिर ताक़त हम सब उसी से तो लेते हैं। सिर झुका के रहो पर अगर कोई चैलेंज करे तो गर्दन धड़ से अलग कर दो। कोई माफी नहीं। सांप को छोड़ दिया तो दुबारा फन उठाएगा। ये दुनिया की रीत है। सांप को कभी बख्शो नहीं और साधु का निरादर करो नहीं। उसकी दुआ लो। ऊपर वाले से डरो और इंसानों को उनकी औकात में रखो। 12 घण्टे की पूछताछ भारी है। जो डर गया, समझो मर गया। जब तलवार उठाने का वक़्त हो, तो कलम का आसरा मत करो। और जब कलम चलानी हो तो तलवार को म्यान में रखो। बाकी जो पसंदीदा घोड़ा है, उसे तंदुरुस्त रखो। वही समर से आपको सुरक्षित बाहर निकालेगा। ये दुनिया वीरों की रही है। शुरू से। जिसके बाजू में दम होगा, वह धरती जीत लेगा। बाकी गीत गाने और गाल बजाने वाले प्राणी होते हैं। पुष्प वर्षा का ज़िम्मा भी यही लेते हैं। लेकिन वीर की शोभा उसकी तलवार होती है। अव्वल तो वह तलवार उठाता नहीं और गर उठा लिया तो न्याय किए बिना म्यान में उसे रखता नहीं। यही धर्म है। यही स्थापना है। यही प्रकृति का न्याय है। 


जो आज सिंहासन पे हैं, कल मैदान का धूल चाट रहे होंगे। इसीलिए कहा गया है कि दोस्त बनाओ। दुश्मन से भी वीरोचित व्यवहार करो। समय का पहिया बहुत तेजी से घूमता है। आदमी पहचानो। और जब पहचान जाओ तो फिर बही-खाता रजिस्टर में दर्ज कर लो कि कौन क्या है। वक़्त आने पे सबको हिसाब देना पड़ता है, देना होगा। ये विधि का विधान है।

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