सनातन धर्म और इस्लाम एक ही बात कहता है- पापियों का अंत होगा

चक्रव्यूह



‘ हिन्दू धर्म असत्य और पाप के बढ़ जाने पे अवतार के उतरने की घोषणा करता है और इस्लाम धर्म पैगम्बर के आने की पुष्टि करता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार अभी कलियुग चल रहा है और जब पाप का घड़ा भर जाएगा तब इंसानों को उससे मुक्त कराने के लिए विष्णु के कल्कि-अवतार ज़मीन पे उतरेंगे। इस्लाम कहता है कि क़यामत से ठीक पहले धर्म यानी सत्य की स्थापना के लिए अल्लाह हज़रत मेहदी को भेजेंगे, जो दज्जाल नामक उस शख्स का वध करेंगे जो पूरी दुनिया पर राज कर रहा होगा और खुद को खुदा घोषित कर चुका होगा।’


Nadim S. Akhter 18 April 2020


साल 2020 बहुत कठिन है। भारत में एक तरफ कोरोना है, दूसरी तरफ साम्प्रदायिकता और तीसरी तरफ फेक न्यूज। कभी मन करता है कि लिखना-विखना छोड़ दूं। कौन सुनता है, जब आप सच बोलते हैं।  इतिहास और धर्मशास्त्र उठाकर देख लीजिए। एक ऐसा समय आता है जब सत्य और असत्य के बीच स्पष्ट विभाजन दिखता है। वर्तमान समय वही है। इसी के लिए गीता में कहा गया है कि यदा यदा हि धर्मस्य... तब कोई अवतार आता है और धर्म की स्थापना करता है। इस्लाम में इसके लिए पैगम्बर हज़रत मुहम्मद से पहले पैगम्बर हज़रत नूह (Noah) का ज़िक्र क़ुरआन में मिलता है। इनका वही ज़िक्र ईसाइयों के धार्मिक ग्रन्थ बाइबिल में भी है। दोनों जगह कहानी एक ही है। जब पैगम्बर नूह की बात से सारे लोग बिफरने लगे और सैकड़ों वर्षों तक पैगम्बर नूह के समझाने के बाद भी वह नहीं माने तो एक दिन सर्वशक्तिमान अल्लाह का हुक्म हुआ कि नूह! अब आप एक बड़ी सी नाव बनाओ, जिसमें मैं धरती के सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और परिंदों को जोड़े में भेज दूंगा। तुम भी उन लोगों के साथ इस कश्ती में सवार जो जाना, जो मेरे बारे में तुम्हारी कही गई बात पर यकीन रखते हैं। फिर मैं बारिश लाऊंगा और पूरी धरती उसमें डूब जाएगी। सारे इंसान और मेरे बनाए मखलूक उस विशाल बाढ़ में डूब जाएंगे। बचेंगे सिर्फ वही, जो तुम्हारी कश्ती पे सवार होंगे यानी हक यानी सत्य के रास्ते पे होंगे।


कहानी यहीं खत्म नहीं होती। आप देखेंगे कि किस प्रकार सनातन धर्म और इस्लाम में सिर्फ एक ईश्वर ( परम् ब्रह्म) की उपासना और स्वर्ग-नरक के कॉन्सेप्ट के अलावा एक और समानता है। हिन्दू धर्म असत्य और पाप के बढ़ जाने पे अवतार के उतरने की घोषणा करता है और इस्लाम धर्म पैगम्बर के आने की पुष्टि करता है। तो हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार अभी कलियुग चल रहा है और जब पाप का घड़ा भर जाएगा तब इंसानों को उससे मुक्त कराने के लिए विष्णु के कल्कि अवतार ज़मीन पे उतरेंगे। वह सफेद घोड़े पर बैठकर आएंगे और उनके हाथ में तलवार होगी।


अब देखिए इस्लाम इस बारे में क्या कहता है? इस्लाम में क़यामत की भविष्यवाणी है, जब इस धरती पे पापियों और पाप का बोलबाला हद दर्जे तक ऊपर पहुंच जाएगा। तब क़यामत से ठीक पहले धर्म यानी सत्य की स्थापना के लिए अल्लाह हज़रत मेहदी को भेजेंगे, जो दज्जाल नामक उस शख्स का वध करेगा जो पूरी दुनिया पर राज कर रहा होगा और खुद को खुदा घोषित कर चुका होगा। ये हज़रत मेहदी भी अन्य पैगम्बरों की तरह आम इंसान की तरह ही धरती पे जन्म लेंगे और सही वक्त आने पर अल्लाह उनको ये बताएंगे कि आपके पास ये ताक़त है और आप दज्जाल का मुकाबला करोगे। चूंकि इस्लाम ये नहीं मानता कि हज़रत ईसा (ईसाइयों के ईसा मसीह) को सलीब पर टांग दिया गया था और उनकी मौत हो गयी थी। इस्लाम ये कहता है कि हज़रत ईसा को ज़िंदा सशरीर अल्लाह ने ऊपर उठा लिया और उनकी जगह एक हमशक्ल को उतार दिया, जिनको सलीब पे लटकाया गया। सो हज़रत मेहदी के दौर में पैगम्बर हज़रत ईसा एक बार फिर इस धरती पे आएंगे और हज़रत मेहदी के साथ मिलकर दज्जाल का मुकाबला करेंगे और उसका वध करेंगे।


यानी इस्लाम दो बातें पक्के तौर पे कहता है। एक-क़यामत यानी day of judgement तो आना ही आना है और दूसरा-हज़रत ईसा एक बार फिर इस दुनिया में आएंगे लेकिन अबकी बार वे करुणा की मूर्ति नहीं होंगे। इस दफा हज़रत मेहदी के साथ मिलकर वे दज्जाल से जंग करेंगे।

उधर हिन्दू धर्म कल्कि अवतार के आने की बात कह रहा है और विज्ञान के इस युग में भी वह घोड़े और तलवार से लड़ेंगे। हज़रत मेहदी भी तलवार से लड़ेंगे। तो क्या तब तक दुनिया में विज्ञान की प्रगति और एटम बम सब खत्म हो चुके होंगे?? ये सोचने वाली बात है।

अब आते हैं मौजूदा दौर में। आप देख रहे होंगे कि चारों तरफ असत्य और fake news का बोलबाला है। कोई किसी की तार्किक बात और सच बयानी को सुनना नहीं चाहता। हर कोई मदहोश है। दुनिया भेड़ों के एक झुंड में तब्दील हो चुकी है। नफरत और हिंसा का बोलबाला है। ऐसे में मुझे हज़रत नूह याद आते हैं। वो क्या कारण रहा होगा कि भगवान को भी थककर ये कहना पड़ा होगा कि अब ये नहीं मानेंगे। इनको समझाना बेकार है। अब तो सैलाब (The Great Flood) लाकर सबको खत्म करना ही होगा। जो सच के साथ होंगे, सिर्फ वही बचेंगे। गीता भी यही कहती है कि जो धर्म के साथ यानी सच के साथ होगा, सिर्फ वही बचेगा। अवतार उतरेंगे। पैगम्बर आएंगे। आखिरी बार। सच को स्थापित करने।



सो आप भी अंतर्ध्यान हो जाएं। नाहक किसी को सच बताने और झूठ का पर्दाफाश करने की कोशिश ना करें। भेड़ों का झुंड कभी आपकी बात नहीं मानेगा। उनकी आंखों पे असत्य और नफरत का पर्दा जम चुका है। अभी बहुत कुछ होगा। वो सब कुछ बुरा, जो-जो बुरा एक इंसानी सभ्यता सोच सकती है। अपनी इज़्ज़त बचा लीजिए और जान भी। आप असत्य के साथ मत खड़े हों पर लोगों पे ये जबर मत करिए कि उनको सच बताइए। वे आपके दुश्मन बन जाएंगे। ये इतिहास और धर्म ग्रन्थों से साबित है। जब पढ़े-लिखे डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वकील, जज और पत्रकार अज्ञान की बातें करने लगें, तर्क से नाता तोड़ असत्य के आलिंगन को अपनी शान समझने लगें, इंसानियत के ऊपर राजनीति, विचारधारा और अपनी मूढ़बुद्धि के समझ वाले धर्म को रखने लगें,

तो समझ लीजिए कि ये हज़रत नूह का काल रिपीट हो रहा है। क़यामत आने वाली है। एक बड़ी तबाही का मंजर सामने है। क़ुदरत के एक अति सूक्ष्म वायरस के सामने पूरी दुनिया का ज्ञान-विज्ञान घुटनों पर है। इंसान अपनी औकात में चुका है पर समझने को तैयार नहीं। ये निशानियां हैं। किसी कोने में छुपकर रह रहे पीर-फकीर-साधु से पूछिए। वह बताएंगे कि क्या हो रहा है! दुनिया के हर काल में ऐसे ज्ञानी-विज्ञानी हुए हैं, जो खुद को प्रकांड विद्वान और बुद्धिजीवी समझते थे। पर फना हो गए। किसी को पता भी नहीं चला। आज आपको मालूम ही नहीं कि हड़प्पा काल में कितने विद्वान थे, जो खुद को मानव सभ्यता की पराकाष्ठा से भी ऊपर समझते थे। हज़रत नूह के वक़्त भी बुद्धिजीवी रहे होंगे, जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते होंगे। सब डूब गए। ये आपको काल्पनिक कहानियां लग सकती है। आस्तिक हैं तो आप इनपे यकीन करेंगे। पर एक बात तय है। क़ुदरत यूँ ही नहीं बनी। ये महज़ एक बिग बैंग नहीं था। उसके पहले भी कुछ था और विज्ञान के अनुसार जब सारा यूनिवर्स (The great attraction) सिकुड़कर फिर एक बिंदु में समाहित हो जाएगा यानी बिग बैंग की शुरुआत वाले stage में पहुंच जाएगा, तो उसके बाद भी कुछ होगा। तभी तो महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि God doesnt play dice यानी भगवान जुआ नहीं खेलता। हर चीज़ इस क़ुदरत में परफेक्शन से बनाई गई है। पृथ्वी के घूमने की स्पीड ही अगर हल्की सी बदल जाए तो इस धरा पे उसी क्षण क़यामत जाए। पर हज़ारों वर्षों बाद भी ऐसा नहीं हो रहा।


मेरी इस पोस्ट का मकसद आपको धार्मिक बनाना या विज्ञान से विमुख करना नहीं है। बस ये याद दिलाना है कि जब आपका कोई अपना गम्भीर रूप से बीमार होता है तो डॉक्टर कहते हैं कि दुआ कीजिए। दवा तो हम दे ही रहे हैं। सो दुआ कीजिए। वक़्त विकट है, कोरोना भी कुछ जानें लेकर खत्म हो जाएगा पर नफरत और झूठ का जो समाज हमने बना लिया है, वह अब जाने वाला नहीं। उस पे मंथन कीजिये और इतिहास धार्मिक किताबों से निशानियां ढूंढिए। किसी को सही रास्ते पर लाने की जिद या कोशिश बिल्कुल भी ना करें और ना ही उसे सच को दिखाने का यत्न करें। हज़रत ईसा के हमशक्ल की तरह सलीब पे टांग दिए जाएंगे। या फिर सुकरात की तरह ज़हर का प्याला पीना पड़ेगा। हज़रत नूह की तरह बाढ़ का इंतज़ार करिए और सबकुछ क़ुदरत पे छोड़ दीजिए। अपनी जान और इज़्ज़त बचा लीजिए। ज़िंदा रहेंगे और इज़्ज़त रहेगी यानी धर्म के रास्ते पे होंगे तभी कश्ती पे सवार हो सकेंगे।

एक बहुत ही संक्षिप्त काल के लिए जब मैंने भारतीय नौ सेना जॉइन की थी तो मेरे कमांडिंग अफसर ने कहा था कि युद्ध में दुश्मन को मारने की बजाय पहले खुदको बचाओ। ज़िंदा रहोगे तो हज़ार दुश्मन मार गिराओगे और अतिउत्साह में अगर मारे गए तो तुम्हारी सारी ट्रेनिंग और उस पर खर्च किया भारत सरकार का पैसा मट्टी हो गया समझो।


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  1. बेहद खोजपरक और समन्वयवादी विचार।

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