कोरोना काल में हम एक ब्लैकहोल में घुसने जा रहे हैं, जहां से निकलने का रास्ता पता नहीं

Nadim S. Akhter 21 March 2020


नोटबन्दी का असल टेस्ट कोरोना कर रहा है। सेहतमंद अर्थव्यवस्थाएं इससे निपटने को पैसा निकाल रही हैं/निकाल चुकी हैं, फिर भी वे हलकान हैं। मार्किट क्रैश कर रहे हैं, लोगों की नौकरीं जा रही है पर पूंजीवादी देश भी लोककल्याणकारी राज्य की तरह जनता को खाना और दवा देने की गारन्टी दे रहे हैं।


इधर भारत में तस्वीर एकदम उलट है। नोटबन्दी के बाद लहूलुहान अर्थव्यवस्था का हार्ट फेल करने को कोरोना की आहट ही काफी साबित हो रही है। सरकार के पास पैसे नहीं हैं। शेयर बाजार टूटकर बिखर चुका है। उद्योगपति सदमे में हैं। इतने कि वे अपनी Corporate Social Responsibility #CSR भी भूल चुके हैं। जनता के पास ना बचत है और ना काम-धंधा। बिजनेस ठप्प हैं, बाजार में cash flow ना के बराबर है और consumer का buying power नेगेटिव में चला गया है। नौकरियां यहां भी जा रही हैं, अभी और जाएंगी। मतलब टोटल #collapse की स्थिति है। 

और सरकार की चिर निद्रा व आत्ममुग्धता ये कि वह हर चीज़ में अब भी #event तलाश रही है। वही भावनात्मक अपीलें और ताली-थाली का शोर। देश एक असाधारण #crisis में है। कोरोना से निपटने के मामले में जनता को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। पूरा #Policy #Paralysis है। आज सत्ता के झंडाबरदार इस टर्म का प्रयोग #UPA2 के लिए करते थे। आज के हालात में #यूपीए2 का राज #golden #era प्रतीत होता है।


अब तो बस भोले #शंकर का सहारा है। #जीसस और #वाहेगुरु दी मेहर का आसरा है। #खुदा खैर करे। हम एक #ब्लैकहोल में घुसने जा रहे हैं, जहां से निकलने का रास्ता किसी को नहीं मालूम।

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