मदर्स डे मनाया तो उनको क्यों ग़ुस्सा आया ?

मदर्स डे पर विशेष


Nadim S. Akhter 10 May 2020


अब हर चीज़ में बाजार मत घुसेड़िये। #MothersDay आखिर है तो माँ का ही दिन ना! क्या बुरा है गर इसी बहाने कोई अपनी अम्मी को याद कर लेता है, अपनी डीपी में मां की फोटुक लगा लेता है या फिर एक फोन करके दूर बैठी बूढ़ी मां का हाल पूछ लेता है ! क्यों? क्योंकि वह अपने आसपास देखता है कि हर कोई अपनी मां को याद कर रहा है, तो वो भी अपनी mom की खैर-खबर ले लेता है।



वरना औलाद अगर नालायक ना होती तो आज दुनिया में Old Age homes ना होते। अपने माँ-बाप को दुत्कारने वाले ये मूर्ख भूल जाते हैं कि सीढ़ी के ऊपर सीढ़ी है। आज बीवी के बहकावे में आकर अपनी मां के साथ वो जो सुलूक कर रहा है, उसका बेटा भी वो देख रहा है। कल जब उसकी मां इस दुनिया में नहीं होगी और वो खुद बूढ़ा हो जाएगा, तब उसकी औलाद भी उसके साथ वही सुलूक करेगी जो उसने दादा-दादी के साथ होते देखा था। ये तो क़ुदरत का न्याय है। खैर!



बात हो रही थी #मदर्सडे पर। तो इसमें पूरब-पश्चिम क्या करना? और बाजार क्या कर देगा? रोज़ तो लाखों-करोड़ों रुपए की शराब और सिगरेट पी जाती है ये दुनिया। दारू पे के उल्टी कर देती है और सिगरेट पीकर धुआं उड़ा देती है। सो अगर साल में एक दिन मदर्स डे के बहाने मां पे ही 50-100 रुपये खर्च कर देगी और थोड़ा कैश का लेनदेन हो जाएगा तो कौन सी आफत टूट पड़ेगी? मतलब हर चीज़ को आप बाजार के ही एंगल से देखेंगे? फिर ईद, दिवाली और होली भी सेलिब्रेट मत कीजिए। रुपये बैंक में रखिये, ऊपर अपने साथ लेकर जाइएगा।

ऐसा है कि सबसे बड़ी चीज है खुशी। उसे दुनिया का कोई धन खरीद नहीं सकता। सो अगर मदर्स डे के बहाने ही आपकी मां को थोड़ा प्यार-दुलार परिवार में मिल जाता है और वो खुश हो जाती हैं, तो ये अनमोल है। पैसा उसके आगे क्या चीज़ है? दुनिया की सारी धन-दौलत मां के कदमों में। 


दूसरी बात। आपके पास बहुत फालतू टाइम है तो आप हिसाब लगाते रहिए कि इस दिन का बाजार क्या फायदा उठा रहा है? कितने कार्ड बिक गए, कितने केक और कितने चॉकलेट! क्या फर्क पड़ता है? खान-पान से लेकर पैंट-कमीज़ तक सब बाहर से ही आई चीज़ें यहां रच-बस गईं। जो चीज़ इंसानी भावना को छूती है, वह हर जगह अपना ली जाती है। बाजार, भावनाओं को नहीं चलाता। ये इंसान के अंदर से निकलता है। यहां पूंजीवाद-साम्यवाद-बाज़ारवाद और समाजवाद मत कीजिए। आप रोज मदर्स डे मनाइए ना! कौन मना कर रहा है? पर जिन नालायकों को साल में एक बार मां की याद आ रही होती है, कम से कम उनको तो मत रोकिए!!



और अगर आपके पास मां है तो उसकी कद्र कीजिए। इस्लाम में कहा गया है कि माँ के कदमों में जन्नत है। ये ऐसे ही हवा में नहीं बोला गया है। हजरत मूसा (यहूदियों के Moses) एक पहाड़ पे चढ़ के अल्लाह से बात किया करते थे। सिर्फ आवाज आती थी, जिसे सुनकर वह जवाब देते थे। एक दफा वह अल्लाह से कुछ पूछने उसी पहाड़ पर चढ़ रहे थे तो अचानक उनका पैर फिसला और वह गिरते-गिरते बचे। तभी अल्लाह की आवाज आई कि ऐ मूसा ! जरा संभल कर चल। अब तेरी हिफाजत की दुआ करने वाले दो हाथ इस दुनिया में नहीं है यानी तुम्हारी मां नहीं है, जिसकी दुआ से मै तुम पर आई बला टाल देता था। इस्लाम के पैगम्बरो में से एक हजरत मूसा की ये कहानी बताती है कि अल्लाह अपने पैगम्बर को भी ये बता रहे हैं कि मां की वजह से तुम पे आई आफत मैं हटा देता था। मां का दर्जा कितना बड़ा है, इसे समझ लो।

सो अगर आपके पास इस दुनिया में माँ है तो उनकी कद्र और इज़्ज़त करना सीखिए। उनकी दुआ लीजिए। मुश्किलें आसान हो जाएगी। माँ की दुआ के बग़ैर आप दुनिया फ़तह कर भी नहीं सकते। चाहे लाख नाक रगड़ लें। जो ये समझ गया, वो कामयाब है। जो नहीं समझ पाया, उससे बड़ा बदनसीब इस जहां में कोई और नहीं।

#Happy_Mothers_Day 

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