आज़ादी के नाम पे हमने अपना देश भ्रष्ट नेताओं के हाथ गिरवी रख दिया

त्वरित टिप्पणी

Nadim S. Akhter 20 May 2020

आपदा के वक़्त का भ्रष्टाचार देश की जड़ खोद देता है। देशभर से खबरें आ रही हैं कि मरीजों के खाने की थाली तक में पैसे कूटे जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में एक निजी अस्पताल एक थाली के 500 रुपये सरकार से ले रहा है। 



किसी कोने से खबर आ रही है कि मास्क और पीपीई किट महंगे दाम पे खरीदे गए। और जो आये, वे घटिया क्वालिटी के थे। और तो और, केंद्र सरकार को ट्रम्प ने गिफ्ट के नाम पे कुछ वेंटिलटर्स भेजे और चार्ज कर लिए मिलियन डॉलर्स में। पता चला कि अपने देश में IIT काफी कम कीमत पे वैसे ही वेंटिलटर्स बना चुका है, पर उसे इग्नोर कर दिया गया। 

कहीं मजदूरों को बस देने में सियासत है, कहीं ट्रेन चलाने में सियासत है, कहीं पैकेज के भारी आंकड़े हैं और ज़मीन पे रुपया पहुंचा ही नहीं। क्या केंद्र सरकार, क्या राज्य सरकार और क्या विपक्ष। कांग्रेस कौन सी दूध की धुली है? यही सोनिया, राहुल और प्रियंका थे ना, जब गरीबों की थाली पे राज बब्बर ने कहा था कि गरीबों के लिए एक दिन का इतना रुपया काफी है क्योंकि 5 रुपया में खाना मिलता है...इतना...!

अगर ये कांग्रेसी, ये शुतुरमुर्गी वामपंथी, ये थोथे समाजवादी, ये आम आदमी केजरीवालवादी, ये दलितवादी और तमाम वादी-फरियादी इतने ही लायक रहते, जनता की सेवा करते, अच्छी राजनीति करते तो मोदी जी को क्या ज़रूरत थी अपने गृह राज्य गुजरात को छोड़कर दिल्ली आके प्रवासी का जीवन बिताने की? बढ़िया तो चल रहा था उनका गुजरात मॉडल। ये सब किसी काम के नहीं रहे, तभी तो बीजेपी को आगे आना पड़ा! देश हित में। 



इसलिए मैं किसी भुलावे में नहीं रहता हूँ। अपना फ़ंडा क्लियर रहता है। वो तो अच्छा हुआ कि कांग्रेस शिरोमणि गांजा सम्राट मेंढकामुंह श्री नरसिंह राव के प्रधानमंत्री रहते और कांग्रेस की छत्रछाया में बाबरी मस्जिद दिन-दहाड़े तोड़ी गयी। फर्ज कीजिए कि अगर ये मस्ज़िद केंद्र के बीजेपी शासन में तोड़ी गयी होती तो आज तक बीजेपी को क्या-क्या सुनना पड़ता! ऑपरेशन ब्लू स्टार याद हैं ना पंजाब का? वो दुर्गा इंदिरा गांधी ने करवाया था। सुनते हैं, कोई रास्ता नहीं बचा था। पर क्या वाकई? तो कांग्रेस ने कब इस देश में धर्मनिरपेक्षता की इज़्ज़त की है? लोकपाल बिल पर राहुल गांधी का संसद में भाषण याद है आपको? पूरा देश उनसे उम्मीदें लगाए बैठा था तब? क्या कूड़ा उगला था राहुल ने तब, याद है ना?

फिर आप कहते हैं कि कांग्रेस को लतिया के जनता ने क्यों हटा दिया? करनी से भाई साब! सच्चर कमीशन की रिपोर्ट याद है जिस पे रोबॉट की तरह बोलने वाले मनमोहन सिंह ने क्या कहा था? इस देश के संसाधनों पे मुसलमानों का पहला हक है। पर किया क्या? बाबा जी का ठेला। ठेला धकेल कर ठेंगा दिखा दिया पपेट ने। पब्लिक को पोपट बना दिया। और बीजेपी को देशभर में ये कहकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का मौका दे दिया कि ये कांग्रेस तो मुस्लिम तुष्टिकरण करती है। 

फिर आप कहिए कि कांग्रेस को जनता क्यों नहीं लतियाए? और ये वामी! प्रकाश करात से लेकर वो क्या नाम है घुंघुर बाल वाले का, हाँ! सीताराम येचुरी। कहीं दिखे ये दोनों आपको सड़क पे? सब AC की मौज ले रहे हैं ना! और पब्लिक है कि खेमे बनाकर सोशल मीडिया पे तलवार ताने हुए हैं। क्यों भाई?


सब घाघ हैं यहां। अपनी-अपनी मार्केटिंग करते हैं खेमेबंदी करके। हर तरफ वाले। राज तो नेता करेंगे, जब सत्ता में आ जाएंगे। और जो बड़ा चमचा होगा, उसको लेमनचूस थमा देंगे। आपको क्या मिलेगा? ठेला? या ठुल्लू? बाबाजी वाला या फूफाजी वाला? 

इसलिए किसी के झांसे में ना आइए। सबकी गोटी सेट है यहां। सिर्फ देश हित में बोलिये और छोड़िए किसी को नहीं। चाहे वो बीजेपी हो, कांग्रेस हो, लेफ्ट हो, समाजवादी हो, दलितवादी हो, आपी हो या नेता की जमात का कोई भी कोरोना संक्रमित फरियादी हो। सबको रगड़े रहिए। राजनीति देशसेवा नहीं, कैरियर है। ये तो सन 1947 में ही decide हो गया था। बस लालबहादुर शास्त्री जैसे इक्के-दुक्के ही बचे थे, जो देश के लिए जी रहे थे। वो जमात तो तभी मरखप गयी। आज वाले नेता तो 5 रुपया में झाड़फूंक करने वाले तांत्रिकों से भी बदतर हैं। सबको पता है पर कोई कहता नहीं क्योंकि उनको अपने नेताजी से उल्लू सीधा करना है अपना।


आम जनता इनसे दूर रहे। अमन-चैन मुल्क का बनाए रखे। आखिर में आपके काम आम आदमी ही आएगा, जिसे नेता की बात पर आपने धर्म के चश्मे से देखना शुरू कर दिया था। आदमी बने रहिए और नेताओं को धोते रहिए, बिना सर्फ एक्सेल के। किसी भी पार्टी की सरकार हो, किसने देश नहीं बेचा है, बता दीजिए। कहिएगा तो उदाहरण दे-देकर बता दूंगा।

ये देश हमारा, आपका, हम नागरिकों का है, नेताओं का नहीं। इसे बचाए रखिए। अगर अभी नहीं समझेंगे तो फिर आगे समझने का वक़्त ही नहीं मिलेगा। ईस्ट इंडिया कम्पनी हिंदुस्तान व्यापार करने आई थी। मुगल बादशाह ने इसकी इजाजत दी। फिर क्या हुआ? उन्हीं अंग्रेजों ने मुगलों की अगली पीढ़ी में बहादुरशाह ज़फ़र को ज़िल्लत भरी मौत दी। उनके साहबजादों को गोलियों से उड़ा दिया, ये कहकर कि 1857 के विद्रोहियों का नेता बन रहे थे! ये लो। इस संदर्भ में बहादुरशाह ज़फ़र चिरकुट ही थे। आराम से अंग्रेजों की पेंशन पे पल रहे होते। जब हुकूमत बची नहीं और बदन में जान रही नहीं, तो काहे कुछ बागियों की बात में आकर मुल्क को आज़ाद कराने का सपना देख लिया? इसलिए कि आज चंद मूर्ख एक मजहब विशेष को 'मुगलों की औलाद' बोलकर अपनी राजनीतिक गोटियां सेंक सके?


इनके पास पूरा इतिहास है। सब लिखवा रखा है इन्होंने। कल को ये भी लिखवा लेंगे कि हूण-शक के बाद ये ही राज कर रहे थे। ना दिल्ली सल्तनत की कभी हुकूमत रही और ना मुगल भारत आए। पूरा विवरण दे-देके आपको समझा देंगे। क्या करेंगे आप? बात मानिए या फिर देशद्रोही का तमगा लीजिए। 



सच कहूँ तो हमने आज़ादी इसलिए लड़कर ली थी कि अपने वतन को अपने हिसाब से चलाएँगे पर हमने गोरे अंग्रेजों को भगाकर लोकतंत्र के नाम पे उन लुटेरों का सत्ता सौंप दी, जिनके लिए चुनाव जीतना और अगले चुनाव के लिए वोट जुटाना सिर्फ़ एक पेशा है। देश-वेश से किसी को कोई लेनादेना नहीं। सब भाषणबाज़ी और झूठ होता है। वरना आज़ादी के 70 साल से ज़्यादा हो गए, इस देश में आज भी एक आम नागरिक की कोई सोशल सिक्युरिटी नहीं, कोई इंतज़ाम नहीं कि कोई भूख से नहीं मरेगा, बिना इलाज के नहीं मरेगा, सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर घर नहीं जाएगा, दंगे में नहीं मरेगा और एक आईएएस से लेकर एक चापरासी और मंत्री तक का बेटा, सभी एक ही स्कूल में पढ़ेंगे, एक ही अस्पताल में इलाज कराएँगे और जनता की ही तरह छोेटे-छोटे फ्लैट्स में रहेंगे। ना कोई राष्ट्रपति भवन होगा और ना कोई सरकारी बंगला या पीएम-सीएम हाउस।

अब आप ही सोचिए कि क्या ऐसा हो पाया है? क्या हमने अपने ही भ्रष्ट लोगों को ख़ुद पर शासन करने के लिए आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी? नहीं ना ! क्या इस देश की निचली और बड़ी अदालतों में एक गरीब आदमी के पास जाने की हिम्मत है? क्या वह फ़ीस दे सकता है? नहीं ना !!

तो ये कैसी आज़ादी पाई है हमने? सिर्फ़ वोट देने के लिए !! नहीं ना। तो आज भारत की जनता की ये दुर्दशा क्यों है? इसका कारण हम भी हैं क्योंकि हम जात-पात-धर्म और विचारधारा के नाम पर वोट देकर अयोग्य और जाहिल लोगों को सत्ता देते आए हैं और लोकतंत्र का मज़ाक़ बनाते आए हैं। उसी की सज़ा ये देश भोग रहा है और हम नहीं सुधरे तो हमारी भावी पीढ़ी का हाल इससे भी बुरा होगा। आप सोच लीजिए कि कैसा मुल्क आप अपने बच्चे को सौंप कर जाना चाहते हैं? उसे खरोंच लग जाती है तो आप विचलित हो जाते हैं। तो फिर देश कैसा देकर जाएँगे आप उसे? इस पर कभी सोचा है? अगर नहीं, तो आज से ही सोचना शुरु कीजिए। 

मेरी नज़र में दुनिया की सारी विचारधाराएँ सत्ता क़ब्ज़ाकर अपनी जमात में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को शामिल करने की साज़िश है। उन्हें आम जनता के दुख दर्द से कोई मतलब नहीं। उन्हें सिर्फ़ अपनी जमात को मज़बूत करना होता है ताकि सिर्फ़ उनके जैसे लोग, उनके जैसे सोचने वाले मानव ही आसपास मौजूद हों। इनका षड्यंत्र समझिए और लोकतंत्र के लिए वोट दीजिए। और अगर कोई ढंग का उम्मीदवा ना मिले तो सारी जनता NOTA का बटन दबाए। देशहित में। जो काम नहीं करेगा, जनता का दर्द नहीं समझेगा, उसे उखाड़ फेंकिए चाहे उसकी विचारधारा आपको कितनी ही पसंद क्यों ना हो? देश पहले है, बाकी चारा-बेचारा और विचारधारा बहुत बाद में आते हैं। और अगर ये नहीं कर पाए तो अपनी भावी पीढ़ी को एक नरक में जीने के लिए छोड़ जाइए। हम-आप तो नहीं रहेंगे तब, भोगेंगी हमारी-आपकी संतानें। 

सोच लीजिए। कौन बड़ा है, आपकी पार्टी-विचारधारा-जात-पात-धर्म या फिर ये देश??!!!



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