भारत में प्रेस की निष्पक्षता बचानी है तो राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग जैसा इदारा खड़ा करना होगा

World Press Freedom Day Special

Nadim S. Akhter 3 May 2020


मीडिया के मज़दूर एक हों। सबको मान्यता मिले, क्या प्रिंट, क्या टीवी और क्या न्यूज़ वेबसाइट वाले। पत्रकार भी पत्रकारिता धर्म का पालन करें और जो दलाल एडिटर-मालिक हैं, उनका सामूहिक विरोध करें। ये करना होगा वरना एक दिन लात मारकर आपको न्यूज़ रूम की फ़ैक्ट्री से निकाल दिया जाएगा और जिस संस्थान के लिए आपने २४ घंटे खून-पसीना एक किया था, वह आपके समर्पण और त्याग की क़ीमत कौड़ी बराबर भी नहीं लगाएगा। उसके लिए आप महज़ फ़ैक्ट्री का एक पुर्ज़ा हो। आप नहीं तो कोई और पुर्ज़ा वहाँ फ़िट हो जाएगा। चैनल-अखबार के मालिक को पता है कि चैनल का ब्रांड नेम बन चुका है, सो एडिटर रहे या जाए, एंकर रहे या भाग जाए, रिपोर्टर-कॉपी एडिटर, फ़ोटोग्राफ़र टिके या फुट ले, उसका चैनल और अख़बार तो चलना ही है। उस पे तुर्रा ये कि चैनल-अखबार की कमाई कोई पत्रकार लाकर थोड़ी देता है। वो तो रिस्पॉन्स टीम वाले, मार्केटिंग वाले, ब्रैड वाले और सर्कुलेशन-डिस्ट्रीब्यूशन वाला देता है, जिसकी बदौलत सिर्फ़ कलम घिसने वाले पत्रकारों को मोटी तनख़्वाह मिल जाती है। 



और देखिए ना ! पत्रकार पूरी दुनिया को समझाता और आईना दिखाता है पर अपने ही मामले में, अपने ही घर यानी न्यूज़ संस्थान में वह ऐसी बहकी-बहकी बातों के बहकावे में जाता है। वह यक़ीन कर लेता है कि सच में ! उसकी तनख़्वाह का इंतज़ाम तो मैनेजमेंट की डिग्री लिए मार्केटिंग वाले कर रहे हैं। उसकी क्या औक़ात? एक पैकेज और ख़बर ही तो लिखना है ! कोई भी लिख देगा। अफ़सोस की बात तो ये है कि दलाल सम्पादक तक अपने एडिटोरियल के साथियों को यही मंत्र सिखाते हैं कि तुम सब बेकार हो। नौकरी कर रहे हो और तनख़्वाह मिल रही है, तो समझो सब मैनेजमेंट वालों का उपकार है वरना कब के पिछवाड़े पे लात मारकर निकाल दिए जाते। और यहीगुरुमंत्रपीढ़ी दर पीढ़ी पत्रकारों को पास किया जाता रहता है। ऐसे थोड़े है कि भारत के सबसे बड़े मीडिया संस्थान के मालिक ने एक दफ़ा कहा था कि वह तो अख़बार विज्ञापन छापने के लिए निकालते हैं। ख़बर तो उसमें फ़िलर मात्र है।




लेकिन पत्रकारों के काम को कमतर आंकने वाले इन सारे लोगों को क्या मालूम नहीं कि जिस ब्रांड और इमेज को ले जाकर वह मार्केट में बेच रहे हैं, ऐंड लाकर पैसा कूट रहे हैं, वह किसकी बदौलत है? अगर अख़बार-टीवी के कंटेंट में ही दम नहीं होगा, ख़बरों के मामले में उसकी क्रेडिबिलिटी ही नहीं होगी, तो क्या वह अखबार-चैनल को बाज़ार में बेच लेंगे? मेरा मतलब है कि विज्ञापन ले आएँगे? तो ये क्रेडिबिलिटी बनाता कौन है? न्यूज़रूम में कलम घिस रहा पत्रकार ही ना! आप लाख IIM Ahmadabad से लाकर मार्केटिंग प्रोफेशनल रख लो, सेल्स टीम को सजा दो और डिस्ट्रीब्यूशन में पैसे झोंक दो। क्या बिना तगड़े कंटेंट के आपके अख़बार या टीवी चैनल का इक़बाल बाज़ार में होगा? आपको विज्ञापन मिलेंगे? नहीं ना ! फिर किस साज़िश के तहत पत्रकारों को कमतर बताकर उनका शोषण करते हैं मीडिया संस्थान के मालिक लोग ? बात सोचने वाली है।




ये बानगी है भारत में पत्रकारों और पत्रकारिता की स्थिति की। यह यूँ ही नहीं है कि इसी महीने जारी हुए World Press Freedom Index 2019 में भारत को 180 देशों में 140वां स्थान मिला है। यानी भारत वहां नीचे से टॉप कर रहा है। सोचिए हालत कितनी चिंताजनक है कि इस साल भारत रैंकिंग में दो पायदान तक नीचे गिर गया है। दुनिया यह मानती है कि भारत में पत्रकारों के काम करने के लिए हालात काफ़ी कठिन हैं। उन्हें जान का ख़तरा है। गुंडों से, नेताओं से और बहुत सारे लोगों से। यह रिपोर्ट बताती है कि साल 2018 में अपना काम करने के दौरान भारत में छह पत्रकारों की मौत हो गई। समझदार के लिए इशारा काफ़ी है। कहने का मतलब ये कि भारत में चौथा खंभा बुरी तरह डगमगा रहा है। अब फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा की यहाँ के मेनस्ट्रीम मीडिया में ऐसी बाढ़ गई है कि अच्छे-अच्छों के लिए समझना मुश्किल हो गया है कि कौन सा चैनल-अखबार झूठ बोल रहा है और कौन सच दिखा रहा है। प्रेस काउंसिल से लेकर एडिटर्स गिल्ड और ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन तक सिर्फ़ नाम की संस्थाएँ रह गई हैं। पत्रकारिता में घुसे इस ज़हर को दूर करने के लिए किसी के पास ना तो शक्तियाँ हैं और ना इच्छा शक्ति। बड़े पत्रकारों के मामलों में तो ये संस्थाएँ सुन भी लेती हैं, बयान जारी कर देती हैं पर छोटे पत्रकारों की सुधि किसी को नहीं। यानी पत्रकारिता में भी हमनेक्लासबना लिया है। 


ज़ाहिर है भारत की पत्रकारिता में आया ये संकट कोई नया नहीं है पर तकनीक और परिस्थितियों ने इसकी रफ़्तार बढ़ा दी है। कोरोना के चलते कई अख़बार बंद होने की कगार पे हैं। टीवी चैनल स्टाफ़ में कमी कर रहे हैं और न्यूज़ पोर्टल्स पर भी अस्तित्व का संकट है। ऐसे में लोकतंत्र की आवाज़ यानी पत्रकारिता को बचाने का ज़िम्मा देश पर आता है और यह अपेक्षा की जाती है कि सरकार पत्रकारों की सुरक्षा और पत्रकारिता के उसूलों को चीरहरण से बचाने के लिए कुछ ठोस क़ानूनी उपाय करेगी। 

एक बात और स्पष्ट कर दूं। सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप से मेरा मतलब मीडिया पर सरकारी रेगुलेशन से नहीं है। मैं तो संविधान के दायरे में उस राष्ट्रीय नीति की बात कर रहा हूँ, जो देश में प्रेस की आज़ादी और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए होनी चाहिए।
सबसे पहले तो ज़रूरत है देश में प्रेस की आज़ादी को संविधान की किताब में जगह देने की। अभी हमारे संविधान में प्रेस की आज़ादी संबंधी कोई प्रवधान नहीं है और यह संविधान के Article-19 से लिया जाता है, जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी की बात कही गई है। उसके interpretation से ही हम भारत में प्रेस की आजादी की बात भी निकाल लेते हैं। पर अमेरिका में ऐसा नहीं है। वहाँ संविधान में ही प्रेस की आजादी का जिक्र कर दिया गया है। इसके First Amendment में कहा गया है- “Congress shall make no law....abridging (limiting) the freedom of speech, or of the press…"

यानी अमेरिकी संसद, प्रेस की आज़ादी को कम करने या उसे कुचलने का कोई क़ानून नहीं बनाएगी। इसलिए भारत में भी संविधान संशोधन करके प्रेस की आज़ादी का उसमें साफ-साफ ज़िक्र कर देना चाहिए। ये ज़रूरी है।



दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात है पत्रकारिता के लिए एक सांवैधानिक राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग (National Commission for Journalism ) की स्थापना की, जो चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र इकाई हो और सरकार तथा पूँजीपतियों के प्रभाव से मुक्त हो। इसी पत्रकारिता आयोग पर देश के चौथे खंभे की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी हो, ठीक वैसे ही, जैसे चुनाव आयोग पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी होती है। इस राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग का काम पत्रकारिता के साथ-साथ पत्रकारों की सुरक्षा और मीडिया के लिए नीति-निर्धारण होगा। 




सदस्यों का चुनाव - राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग के सदस्यों के चुनाव में केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस समेत तीन सीनियर जज, सभी राष्ट्रीय दलों के एक-एक नेता, मुख्य चुनाव आयुक्त समेत तीन इलेक्शन कमिश्नर, मुख्य सतर्कता आयुक्त (CVC) और मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) शामिल हों। चुनाव की प्रक्रिया या तो आम सहमति से हो या फिर वोटिंग के ज़रिए हो। 

राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग की ताकत


अभी जो देश में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया नामक सफेद हाथी है, उसे खत्म कर देना चाहिए। उसके रहते देश में मेनस्ट्रीम मीडिया और बड़े-ब़ड़े  पत्रकार ना सिर्फ फेक न्यूज दिखा-छाप रहे हैं, बल्कि वे बहुत चालाकी से सत्ता से गलबहियां करके देश में साम्प्रदायिक उन्माद भी फैला रहे हैं। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया बस टुकुर-टुकुर मुंह ताकता रहता है। इसके पास दोषी पत्रकार या मीडिया संस्थान को दंड देने की कोई ताकत नहीं है। आज के माहौल में देश को ऐसे नख-दंत विहीन संस्था की कोई जरूरत नहीं।

(). इसलिए ये जरूरी है कि राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग को ये ताकत दी जाए कि वह फेक न्यूज चलाने-फैलाने वाले न्यूज़ चैनलों और अखबारों-वेबसाइट्स को दंडित कर सके। सम्पादक-मालिक को जेल तक भेज सके। साथ ही उन पर जुर्माना लगा सके। अगर ऐसा हो गया, तो यकीन मानिए कि इस देश का मीडिया एक दिन में सुधर जाएगा। आज जो सब छुट्टा सांड बनकर घूम रहे हैं, उसकी जड़ में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसे नाकारा संस्थान की काहिली और उसका शक्तिविहीन होना है। जिस दिन देश के पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को गलत खबर दिखाने-छापने के लिए दंड मिलने लगेगा, उसी दिन से ये सब राजा हरिश्चंद्र के चेले बन जाएंगे, जो सिर्फ सत्य के उपासक होंगे। प्रोपेगेंडा, फेक न्यूज और दलाली के नहीं।


(). इसके अलावा राष्ट्रीय पत्रकार आयोग को ये ताक़त दी जाए कि वह मीडिया संस्थानों में धर्म, जाति और लिंग के आधार पर समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे हमारा देश बहुत बड़ा है पर यहां मीडिया में उच्च जातियों और कुछ मामलों में किसी खास क्षेत्र के लोगों की ही गुटबंदी गिरोहबंदी है। लोकतंत्र का चौथा खंभा सबकी आवाज बने और खबरों में सबको जगह मिले, इसके लिए जरूरी है कि मीडिया सबसे पहले खुद को अंदर से बदले। ज़रूरत पड़े तो आयोग सभी को समुचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण का भी प्रावधान करे। सभी मीडिया संस्थान इसे मानने के लिए बाध्य हों। अगर ये हो गया, तो भी समाचारों के चयन और उसके प्रकाशन-प्रसारण में एक आमूलचूल बदलाव आएगा। सबकी खबरों को बराबर महत्व मिलेगा और न्यूजरूम की मीटिंग राजा और उसके दरबारियों की जगह नहीं रह जाएगी। वहां आरग्युमेंट होंगे और जो खबर डिजर्व करेगी, वही जनता तक जाएगी।


(). पत्रकारों का वेतन के मामले में शोषण एक बड़ी समस्या रही है। शुरु से ही ये मानसिकता बना दी गई है कि पत्रकार तो मिशन पर निकला है, सो वह हवा-पानी पीकर जी लेगा। भारत में पत्रकारिता, खासकर भाषाई पत्रकारिता की एक बड़ी समस्या है- वेतनमान में विसंगतियां। बड़े अखबार -चैनल तो कुछ सम्मानजनक वेतन दे भी देते हैं, पर छोटे मीडिया संस्थान जमकर पत्रकारों का शोषण करते हैं। सबकी चाहत होती है कि पत्रकार फ्री में काम कर दे, वह तो मिशन पर है। सैलरी बस विज्ञापन और सेल्स विभाग वालों को मिलनी चाहिए और कुछ नहीं करने-धरने वाले HR को। 




ऐसे में राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग की भूमिका काफी अहम हो जाती है। आयोग को ही ये ज़िम्मा दे दिया जाए कि वह केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतनमान की तरह ही देशभर के पत्रकारों का एकसमान वेतनमान निर्धारित करे। कोई नौकरी छोड़कर कहीं भी जाए, अगर समान पद पर जा रहा है, तो वेतन वही मिलेगा जो पिछले संस्थान में मिल रहा था। इससे मीडिया संस्थानों में आपसी Poaching भी कम होगी और टैलेंट को रोकने के लिए उनको एंटी-पोचिंग एग्रीमेंट नहीं करना होगा।

साथ ही एकसमान वेतनमान से पत्रकारिता में नौकरी को बड़े शहरों के लिए पलायन कम होगा। छोटे शहरों में काम करने वाले पत्रकार भी उसी सम्मान से काम कर सकेंगे, जो आर्थिक सुरक्षा बड़े शहरों के पत्रकारों को मिलती है। इससे भाषाई और आंचलिक पत्रकारिता की जड़ें और मजबूत होंगी, खबरों में गुणवत्ता बढ़ेगी और पत्रकारिता में बहुत हद तक पैसे लेकर खबर छापने की प्रवृत्ति कम होगी। मैंने ऐसे स्ट्रिंगर्स देखे हैं, जिन्हें चार हजार रुपये महीने मिलते हैं। इतने कम पैसे में कोई अपना परिवार कैसे चला सकता है? यानी ऊपर से सिग्नल ये होता है कि आप कम पैसे में काम करो, बाकी अपना खर्चा फील्ड से निकाल लो। खुलकर बोलूं तो दलाली करो और अगर सम्पादकचालूहुआ तो उसका हिस्सा भी पहुंचाओ। ये तो हाल है।

(). मीडिया संस्थानों में भर्ती बहुत ही अपारदर्शी और भाई-भतीजावादी प्रक्रिया है, जिस चलते असल टैलेंट कभी उभरकर देश के सामने नहीं आता, जैसा UPSC जैसी परीक्षाओं के माध्यम से होता है। सो राष्ट्रीय पत्रकार आयोग को ये ताक़त दी जाए कि वह मीडिया में भर्ती के लिए ज़रूरी मानदंड और अहर्ता का निर्धारित करे। देश में CAT या NET टाइप की परीक्षा करके मेरिट लिस्ट के आधार पर पत्रकारों का एक पूल तैयार किया जाए, जहां से सभी मीडिया संस्थान एक औपचारिक इंटरव्यू करके पत्रकारों का चयन करें। ये एकदम पारदर्शी प्रक्रिया होगी और मीडिया में नौकरी के लिए भाई-भतीजावाद और सिफ़ारिश पर अंकुश लग जाएगा।




हर मीडिया संस्थान को खाली पड़े पद के लिए विज्ञापन निकालना होगा, जिसमें सभी योग्य उम्मीदवार अप्लाई करेंगे। बाद में मेरिट के आधार पर इसी राष्ट्रीय पूल से पत्रकारों का चयन होगा। अगर ऐसा हो गया, तो बिना किसी जुगाड़ के दूर-दराज के टैलेंट भी राष्ट्रीय पटल पर उभरेगा और पत्रकारिता के उसूलों को आगे बढ़ाएगा। सिर्फ ब्यूरोक्रेट के बच्चे और नेता के सिफारिशी चिंटू मीडिया में बड़ी पोजिशन पर नहीं पहुंच पाएंगे। इस पे पूर्णतः रोक लग जाएगी।

तीसरी अहम चीज है पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा । वैसे अभी केंद्र सरकार द्वारा पत्रकारों की मदद के लिए कुछ योजनाएँ हैं जिनमें पत्रकारों की मदद के लिए पाँच लाख तक की रक़म निर्धारित है। लेकिन इसमें पत्रकार कहलाने के लिए नियम के इतने दाँवपेंच हैं कि एक छोटे से क़स्बे का स्ट्रिंगर संकट के समय कभी सरकार की मदद नहीं पा सकता। तो देश को जरुरत है एक Comprehensive Plan की, जो छोटे से छोटे पत्रकार की ख़ुदमुख़्तारी बचाकर रख सके और उसके हितों की हिफ़ाज़त कर सके।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण ये है कि राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग के जिम्मे देशभर के पत्रकारों का बीमा हो। यानी एक स्ट्रिंगर से लेकर सम्पादक तक का बीमा यहीं से हो, जो उनके कार्यस्थल पर दिए जाने वाले बीमा से अलग हो। यह बीमा तीन तरह का हो सकता है।

. स्वास्थ्य बीमा
. बेरोजगारी बीमा
. मृत्यु संबंधी बीमा

आज भी कई ऐसे तथाकथित बड़े मीडिया संस्थान हैं, जो अपने पत्रकारों को स्वास्थ्य बीमा तक ढंग से नहीं देते। पे-रोल के पत्रकारों को तो छोटा-मोटा बीमा मिल भी जाता है, पर बेचारे स्ट्रिंगर्स को वो भी नसीब नहीं होता। मैं खुद जब एक मीडिया संस्थान में जिम्मेदारी के पद पर था, तो वहां पे-रोल वाले पत्रकारों को भी स्वास्थ्य बीमा नहीं मिलता था। इस बाबत मैंने वहां के मैनेजमेंट हेड और एचआर से भी बात की, पर धरातल पे कुछ नहीं हो सका। वे बस मुझे आश्वासन देते रहे कि देखते हैं, करवाते हैं कुछ, मानो पत्रकारों पे एहसान कर रहे हों। सोचिए कि दूसरों के हक के लिए लड़ने वाले पत्रकार खुद कितने असुरक्षित हैं। अगर बीमार पड़ जाएं तो इलाज तक के लिए पैसे नहीं होते उनके पास। 




इसमें बेरोजगारी बीमा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। आज ज्यादातर पत्रकार अगर समझौते करके फेक न्यूज और दलाली वाली खबरें लिखने-चलाने-छापने को मजबूर हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण उनमें नौकरी जाने का भय रहता है। इसी का फायदा उठाकर दलाल सम्पादक और मालिक पत्रकारों को ब्लैकमेल करते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर नौकरी चली गई, तो सड़क पर जाएंगे। सो बेरोजगारी बीमा होने से उनके अंदर का भय खत्म हो जाएगा। नौकरी तो देर-सबेर मिल ही जाएगी, पर जब तक दूसरी नौकरी नहीं मिलती है, तब तक पत्रकार और उनका परिवार आर्थिक संकट से नहीं जूझेगा। 

चौथी चीज जो पत्रकारों के हितों के लिए राज्य यानी सरकार को करना चाहिए वह है- पत्रकारों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कोष बने और आम बजट में इसका ज़िक्र हो। ये व्यवस्था राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग द्वारा दिए जाने वाले बेरोजगारी बीमा से अलग होगी। इससे फ़ायदा ये होगा कि नौकरी जाने के डर से कोई पत्रकार अपना ईमान नहीं बेचेगा। अगर वह बेरोजगार हो भी गया, तो एक तो उसे बेरोजगारी बीमा का सहारा होगा, दूसरा इस राष्ट्रीय कोष से भी उसे मदद मिलेगी। इतनी आर्थिक सुरक्षा किसी भी पत्रकार की खुदमुख्तारी को बुलंद करने के लिए काफी है। और जब सिस्टम ठीक से काम करेगा, फेक न्यूज और दलाली का बोलबाला नहीं होगा, राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग सबको कसे रहेगा तो कोई पत्रकार नौकरी क्यों छोड़ेगा भला? नौकरी जल्दी किसी की जाएगी भी नहीं। हां, सिर्फ बेहतर संभावना के लिए पत्रकार अपना मीडिया संस्थान बदल सकते हैं।




आयोग के जिम्मे जो पांचवां काम होगा, वह है देश में एक प्रतिष्ठित पत्रकारिता अवॉर्ड स्थापित करने का ताकि सुयोग्य और प्रखर पत्रकारों को राष्ट्रीय पटल पर सम्मानित किया जा सके। इससे उनका उत्साह बढ़ेगा। देश में पत्रकारिता का स्तर ऊँचा हो और जनहित की ख़बरें, सरकारों से सवाल करने वाली खबरें, सरकारों को एक्सपोज़ करने वाली ख़बरें जनता के बीच आए, इसके लिए पत्रकारों का प्रोत्साहन ज़रूरी है। इस पुरस्कार के लिए काबिल पत्रकारों का चयन करने के लिए जो ज्यूरी बनेगी, उसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के मीडिया विशेषज्ञ, एकाडेमीशियन और कार्यकर्ता होंगे, जो एकदम निष्पक्ष होकर देश के श्रेष्ठ पत्रकारों का चयन करेंगे। और हां, इस पुरस्कार के लिए किसी पत्रकार को अप्लाई करने की जरूरत नहीं होगी, फॉर्म नहीं भरना होगा। मैगसेसे पुरस्कार की तरह पुरस्कार समित और ज्यूरी खुद खुद योग्य व्यक्ति को ढूंढ निकालेगी। पुरस्कार पाने के लिए भी कोई अप्लाई करता है क्या? भारत में ये हो रहा है। इसे रोकना होगा।



वैसे बातें तो अभी बहुत है, पर मैंने एक मोटा-मोटी खाका आपके सामने रख दिया है। अगर इतने पे ही अमल हो जाए तो इस देश की पत्रकारिता और राजनीति, दोनों सुधर जाए। जनता के अच्छे दिन सचमुच जाएं। पर क्या ऐसा हो पाएगा? राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग की स्थापना सरकार को करनी है। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों में एकराय बनानी होगी। जनता का दबाव बनाना होगा और पत्रकारिता जगत से भी इसके लिए आवाजें उठनी होंगी। जाहिर है, इस आयोग के आने के बाद देश के मीडिया संस्थानों के हाथ बंध जाएंगे और भ्रष्ट संस्थान पत्रकारिता के नाम पर दलाली नहीं कर पाएंगे। साथ ही सभी को पत्रकारों को एकसमान वेतन भी देना होगा। पत्रकारों की भर्ती में भी उनकी नहीं चलेगी। सो मुझे आशंका है कि मीडिया संस्थानों के मालिक ऐसे किसी आयोग की स्थापना का पुरजोर विरोध करेंगे। साथ ही कई राजनीतिक दल भी ये नहीं चाहेंगे कि पत्रकारिता की गुणवत्ता कायम करने के लिए ऐसा कोई आयोग बने क्योंकि बारी-बारी से वे सत्ता में आते रहते हैं। ऐसे में अगर देश का चौथा खंभा ताकतवर हो जाएगा, तो सरकार के भ्रष्टाचार और उनके कुकर्मों का काला चिट्ठा रोज छापेगा-दिखाएगा। जनता जागरुक हो जाएगी और कॉरपोरेट से साठगांठ करके कुर्सी पे काबिज भ्रष्ट नेताओं की  दाल नहीं गलेगी। उन्हें ईमानदारी से जनता के लिए काम करना होगा। 




पर सबसे बड़ा सवाल है कि ऐसा होगा क्या? क्या राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग जैसी कोई ताकतवर संस्था इस देश में पत्रकारिता और पत्रकारों की रक्षा के लिए कभी बन पाएगी? मेरे ख्याल से बन सकती है, बस जनता को भक्ति छोड़कर अपने वोट की शक्ति में विश्वास करना होगा। उनको राजनीतिक दलों से ये कहना होगा कि वे अपने इलेक्शन मैनिफेस्टों में ये मुद्दा लेकर आएं और जो राजनीतिक दल देश को चौथे खंभे को मजबूत करने का वादा करेगा, वोट उसी को मिलेगा।

बस एक डर है। सत्ता पाने के बाद राजनीतिक दल जो राष्ट्रीय पत्रकारिता आयोग बनाए, उसका हाल वो ना कर दे, जो जनलोकपाल बिल का हुआ है। यानी फिर एक नख-दंतविहीन संस्था बना दे, जो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की तरह सफेद हाथी बनकर ना रह जाए।

नोट- इस आलेख का कॉपीराइट है, सो इसे पूर्ण या आंशिक रूप से उठाकर लिखने-छापने से पहले लेखक की अनुमित जरूरी है। 



  • कुछ जानकारीप्रद लिंक


World Press Freedom ranking में भारत दो पायदान और नीचे आया


भारत में प्रेस की आजादी कैसी है




अमेरिकी संविधान में प्रेस की आजादी का जिक्र




भारत सरकार द्वारा पत्रकारों के लिए लाए गए Welfare Scheme के Guidelines







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    1. इसे प्रकाशित करने का कोई कोटि नमन सर

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