हुई महँगी बहुत ही शराब ये, थोड़ी थोड़ी पिया करो

बेचोगे शराब तो कोरोना से पार कैसे पाओगे ?


Nadim S. Akhter 4 May, 2020


आपको क्या लगता है कि कल से दिल्ली में शराब महंगी करने पे यानी 70 फीसद दाम ज्यादा लेने पे लोग ठेके पे थंडर नहीं मचाएंगे? ग़लत अंदाज़ा है आपका। लोग खूब आएंगे और ठेलमठेल में कोरोना का उपहार घर ले जाएंगे। बिल्कुल मुफ़्त। 


सोमवार को 'दारू के लिए प्यासे' दिल्ली वालों के लिए जब शराब की दुकानें खुलीं तो पब्लिक ने ग़दर काट दिया। क्या पॉश इलाक़े और क्या गरीब आबादी वाले क्षेत्र, हर जगह लोगों की लंबी क़तारें लग गईं। नौबत ये आ गई कि पुलिस बुलानी पड़ी। शराब के लिए उमड़ी भीड़ को क़ाबू करने के लिए कहीं-कहीं पुलिस को लाठी चार्ज भी करना पड़ा।

तो ये रहा सोमवार का हाल। जनता ने शराब की ख़ातिर सोशल डिस्टेंसिंग की ऐसी-तैसी कर दी। सरकार लजा गई। अब करें तो क्या करें? सो एक नायाब उपाय निकाला। शराब महँगी कर दो। शायद कम लोग ख़रीदने आएं। यानी सरकार भी मुंगेरी लाल बन गई। हसीन सपने। कि दाम बढ़ जाएँगे तो जनता नहीं आएगी।


सरकार थोड़ा रिसर्च कर लेती तो पाती कि आम बजट में जब-जब सिगरेट, तम्बाकू आदि पर टैक्स बढ़ा है, तब-तब इनकी खपत देश में कम हुई है क्या? नहीं हुई है ना ! फिर शराब तो सबसे अव्वल है। देर तक महफ़िल गुलज़ार करता है। लॉकडाउन के अवसाद से निकलने की 'दवा' है। इसे पब्लिक क्यों छोड़ने लगी भला? भूखे पेट रहेंगे पर शराब ज़रूर पिएँगे। बॉलीवुड ने तो शराब पीने पर एक भरी-पूरी फ़िल्म ही बना दी- शराबी। एक्टिंग करवाई अमिताभ बच्चन से। फ़िल्म सुपर-डुपर हिट रही। जो शराब पीते थे, उन्होंने भी देखी और जो मदिरपान नहीं करते थे, उन्होंने भी देखी। कहानी शराबी की थी, पर वह शराबी फ़िल्म में हीरो था। हालाँकि असल ज़िंदगी में ऐसा होता नहीं है। 


खैर, बात कल यानी मंगलवार 5 मई से दिल्ली में शराब पर स्पेशल लगने वाले 'कोरोना टैक्स' की हो रही थी। दरअसल सिगरेट, तम्बाकू, पान मसाला, गुटखा, पान और शराब, ये ऐसी चीज़ें हैं कि lockdown में लोग गम गीला करने के लिए इन्हें चार गुने दाम पे खरीदकर भी घर भर लें। शौक बड़ी चीज़ नहीं, नशा बड़ी चीज है। ये 70 फीसद का कोरोना टैक्स क्या है, आप 300 फीसद का जाम-टैक्स लगा दोगे ना, तब भी पब्लिक ठेके पे मार ही करेगी। शराब खरीदने को।




पर सबसे बड़ा सवाल सरकार की नीयत का है। कोरोना के नाम पर आपने 40 दिन का चिल्ला बनाकर पब्लिक को तावीज़ की तरह घर में टांग दिया। दिनरात #Social #distancing का पाठ पढ़ाया। फिर अचानक दारू की दुकानें ऐसी खोलीं कि 40 दिन में जितना कोरोना रोका था, वह महज़ एक दिन में पब्लिक ने एक -दूसरे को बांट दिया। ये कैसी बुद्धिमानी है? ये कैसा निजाम है?

क्या मैं पूछ सकता हूँ कि देश पे बुलाए गए (आए नहीं) इस गम्भीर संकट के काल में मदिरा बेचकर सरकार कितना राजस्व कमा लेगी, जो पिछले एक महीने से ज्यादा समय से घरबन्दी करके हुए लाखों करोड़ के नुकसान की भरपाई कर देगा? कुछ नहीं ना! फिर दारू की दुकान अभी खोलने का क्या तुक था और किस महान आत्मा व प्रकांड विद्वान की सलाह पे सरकार ने ठेके खोलकर मुफ्त में कोरोना बांटने का सर्वसुलभ निर्णय लिया? ये देश के साथ घात तो है ही, मुझ जैसे law abiding citizen के साथ भी धोखा है, जिसने इस पूरे समय खुद को घर में बंद रखा। इस डर और ज़िम्मेदारी के भाव से कि ना कोरोना बांटना है और ना घर लाना है।


शराब के ठेके खुलवाकर सरकार ने बहुत ही गैर-ज़िम्मेदारी का भाव पैदा किया है। जिस किसी भी मंत्री-अफसर की सलाह पे ये फैसला हुआ है, वह सरकार का हितैषी तो कदापि नहीं है। संकट काल में बुद्धिमान लोगों की सलाह लीजिए, जी-हुजूरी वाले चमचों की नहीं। और लोग शराब नहीं पिएँगे तो मर नहीं जाएँगे। हाँ, कोरोना लग गया, तो ज़रूर मर सकते हैं। बाक़ी शराब बेचकर सरकार राजस्व कमाएगी, ये ख़्याल ही बेतुका है। इससे तो अच्छा ये है कि आप पब्लिक से चंदा माँग लीजिए। पर शराब बेचके जनता में कोरोना तो मत बँटवाइए !!!

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