पीएम मोदी को ट्विटर पर ट्रॉल करके किसे क्या मिला ?

"आज जो ट्विटर पर हुआ और जिस तरह देश के प्रधानमंत्री के बारे में -ग़द्दार- जैसा शब्द लिखकर उसे ट्रेंड कराया गया, वह इसी का विस्तार है। अगर आप मल्ल युद्ध में सामने वाले का लंगोट खुलने पर उसकी हंसी उड़ाएँगे, रेफ़री खेल रोकने की बजाय उसे खेल का हिस्सा बताएगा तो एक ना एक दिन सामने वाला प्रतिद्वंद्वी भी आपकी लंगोट भरी महफ़िल में खोल ही देगा। तब क्या करेंगे आप?"


Nadim S. Akhter 6 May 2020


मैंने #Twitter पर नाना-दादा प्रकार के ट्रेंड देखे हैं पर आज पीएम पर एक ट्रेंड की भाषा देखकर विचलित हूँ। क्या अब कोई शर्म-लिहाज और शालीनता नहीं बची हममें? यह लिखे जाने तक 77.5 हजार ट्वीट के साथ ट्विटर पर नम्बर-1 ट्रेंड था- #गद्दार_मोदी_लुटेरा_है । मतलब जिसके जो मन में आ रहा है, इस हैशटैग के साथ ट्विटर पर लिख-बोल रहा है। किसी पे कोई लगाम नहीं। आम दिनों ये ट्रॉल सेना विपक्ष के लोगों को, सेलिब्रिटीज को, पत्रकारों को और आम जनता को ट्रॉल करती आई है। आज पीएम को ट्रॉल किया गया। वह भी एक बेहद आपत्तिजनक भाषा में। बहुत दुख की बात है कि ये सब हुआ। ये नहीं होना चाहिए था।



लगता है कि आज घर के चिराग़ से ही घर को आग लग गई। इसीलिए बड़े बुज़ुर्ग कह गए हैं कि घर का अनुशासन बनाकर रखो। आज अगर कोई आपका प्यारा बच्चा अनुशासन तोड़ रहा है और आप चुप हैं, तो कल को कोई घर का दूसरा बच्चा भी अनुशासन तोड़ेगा। तब आप मन मसोस कर रह जाएँगे, कुछ नहीं कर पाएँगे क्योंकि परम्परा आपकी छत्रछाया में ही बनी है। 



मुझे ये कहते हुए दुख हो रहा है कि बतौर एक राष्ट्र हम अंदर से बुरी तरह टूट चुके हैं। सामाजिक और राजनीतिक कटुता का आलम ये है कि विरोधी को नीचा दिखाने के लिए लोग किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। जिस मीडिया की छाती पर चढ़कर जमाती-कोरोना किया गया, यही मीडिया कल दूसरे पक्ष की मूर्ति भी विखंडित कर देगा। अगर मीडिया को चाकर ही बनना है, तो वह किसका अपना होगा? वही हाल #आईटी #सेल और तमाम ट्रॉल सेना का होगा। आज ये जिनकी दिहाड़ी कर रहे हैं, कल पैसे के लिए किसी और की दिहाड़ी करेंगे। बचेगा कोई नहीं। मैं तो बस कल की सोचकर और व्यथित हो जाता हूँ। कौन किसको छोड़ेगा यहां? अब तो व्यक्तिगत दुश्मनी सी दिखती है।

बस एक बात बतानी थी। शायद आप जानते होंगे। पर याद दिला देता हूँ। तब अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बन गए थे। एक दिन साउथ ब्लॉक पहुंचे तो वहां की एक दीवार पे सदा टँगी रहने वाली पंडित नेहरू की फोटुक गायब थी। अटल के चमचों ने सोचा था कि इससे वह खुश होंगे। शाबाशी देंगे। पर अटल जी भड़क गए। कहा-किसने हटवाई नेहरू जी की तस्वीर? सब चुप। फिर दुबारा वह पोर्ट्रेट वहां लगी। अटल जी के दिल को करार आया।


ये बात बताते हुए खुद अटल जी ने कहा था कि राजनीतिक मतभेद के बावजूद मनभेद नहीं होना चाहिए। उनके और नेहरू के बीच मतभेद थे, मनभेद नहीं। वह नेहरू जी की बहुत इज़्ज़त करते थे पर आलोचना भी तगड़ी कर देते थे। ऐसे ही एक दफा उन्होंने नेहरू जी के व्यक्तित्व की आलोचना कर दी। कहा कि आपमें इंग्लैंड के दो-दो प्रधानमंत्रियों, चर्चिल और चेम्बर्लिन का मिश्रण है। आलोचना तीखी थी। उसी शाम नेहरू जी और अटल जी एक भोज पर मिल गए। हमेशा की तरह नेहरु जी शांत थे। अटल का जब उनसे सामना हुआ तो नेहरू ने उस 'सॉलिड स्पीच' के लिए अटल को बधाई दे दी। फिर मुस्कुराते हुए वहाँ से चले गए। अटल बस उन्हें देखते रह गए। बाद में अटल जी ने बताया था कि आज के ज़माने में अगर किसी को ऐसा बोल दो, तो दुश्मनी को दावत हो जाती है। लोग बातचीत करना छोड़ देते हैं। पर तब ऐसा नहीं था। 

ये कहानी आपको इसलिए बताई कि आप जानें के आज हमारे राजनीतिक और सामाजिक जीवन का कितना पतन हो चुका है। बतौर राष्ट्र हम अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों का छाता लेकर नहीं चल रहे, अब तो विचाधारा के नाम पर एक-दूसरे पे बदूँक ताने घूम रहे हैं। वैसे आज के माहौल में भी कभी-कभी नयनसुख पल मिल जाते हैं। कहीं किसी कोने से एक तस्वीर आती है कि बीजेपी के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी को (जिन्हें मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया गया है) सोनिया गांधी हाथ पकड़कर सहारा दे चलने में मदद कर रही हैं। कभी राहुल गांधी चलते-चलते अचानक से रुक जाते हैं और बैठे आडवाणी जी से झुककर बात करने लगते हैं। कभी संसद के अंदर ही राहुल गांधी, किसी को गले लगा लेते हैं।


पर दूसरी तरफ़ से ऐसी कोशिश नहीं दिखती। उलटे आईटी सेना इसका माखौल उड़ाने में लग जाती है। राहुल गांधी के गले मिलने को पप्पू का नाटक बताया जाता है। एक और वाक़या याद दिलाता हूँ। तब अटल जी पीएम थे और पाकिस्तान में सत्ता परवेज़ मुशर्रफ के हाथ में थी। हमेशा की तरह भारत-पाक रिश्तों में बर्फ़ जमी थी और माहौल में तनाव था। तभी नेपाल के काठमांडू में 11वें सार्क (SAARC) समिट का आयोजन हुआ। इसमें परवेज मुशर्रफ को बोलने का मौका अटल जी से पहले मिला। मुशर्रफ के बाद तीन और राष्ट्राध्यक्षों को बोलना था, तब जाकर अटल जी की बारी आती। तब अपने भाषण में मुशर्रफ ने सार्क को आपसी मतभेद भुलाने का मंच बताया और कहा- "Let none amongst us consider himself more equal than others." 


जाहिर है बात घुमाकर कही गई थी और समझने वाले समझ रहे थे कि ये सीधे-सीधे बड़े भाई भारत की तरफ़ इशारा था। अटल जी यह सुनकर मन ही मन कुछ गुन रहे थे और मुशर्रफ बोलकर मंच से अपनी सीट की तरफ़ आ रहे थे। पर अचानक वह पलटे और अटल जी की सीट की तरफ़ बढ़ लिए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अटल जी की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया। तब तक अटल जी बैठे हुए थे। अचनाक से बढ़े मुशर्रफ के इस दोस्ती के हाथ ने अटल जी को भी भौंचक कर दिया। उस समय तक अटल जी के घुटने में दर्द रहने लगा था, सो उन्हें जवाब में उठकर हाथ मिलाने में थोड़ा वक़्त लग गया। दो देशों की कटुता पर दोस्ती के इस हाथ से सार्क समिट का पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दूसरे राष्ट्राध्यक्षों के चेहरे में खिलखिलाने लगे। माहौल में तनाव कम हो गया। दोनों देशों के ब्यूरोक्रेट्स और सेना के अफ़सरों ने राहत की सांस ली।

उस वक्त मीडिया में इस घटना की खूब चर्चा हुई थी और मुशर्रफ के इस Hand Shake को मास्टरस्ट्रोक कहा गया। जो भी हो, इसके बाद दोनों देशों के रुख में नरमी आयी और बातचीत का रास्ता खुला। कहने का मतलब ये है कि आज की सदी में हम कोई राजे-रजवाड़ों के जमाने में नहीं रह रहे हैं। हम लोग एक लोकतंत्र में रहते हैं और 'जनता का राज' चलाने का जिम्मा हम अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को दे देते हैं। ऐसे में इन जनप्रतिनिधियों और Public Servants को ये सोचना होगा कि वे खुद राजा नहीं हैं। जनता के नौकर हैं। देश में राजनीतिक शुचिता और प्रेमभाव बनाना उनका ही दायित्व है। अगर वे अपनी जगह से फिसले और विघटनकारी तत्वों को समाज से लेकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक और वैयक्तिक गरिमा तार-तार करने का मौका दिया, तो कल ये सांप उन्हें भी डंस लेगा, जिसे पालपोस कर और दूध पिलाकर बड़ा किया गया है। 

आरोप लगते रहे हैं कि हमारे सत्ता प्रतिष्ठान में बहुत ऊँचे पदों पर बैठे नेता ऐसे लोगों को ट्विटर पर फ़ॉलो करते हैं, जो साम्प्रदायिक और ज़हरीली बातें बोल-लिखकर समाज में नफ़रत फैलाते हैं, लोगों को ट्रॉल करते हैं। ये लोग बड़ी शान से कहते भी हैं कि हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा? देखो, फलां मंत्री, फलां नेता हमको फ़ॉलो करता है। 



अगर आप मल्ल युद्ध में सामने वाले का लंगोट खुलने पर उसकी हंसी उड़ाएँगे, रेफ़री खेल रोकने की बजाय उसे खेल का हिस्सा बताएगा तो एक ना एक दिन सामने वाला प्रतिद्वंद्वी भी आपकी लंगोट भरी महफ़िल में खोल ही देगा। तब क्या करेंगे आप ? ऐसे में आज जो ट्विटर पर हुआ और जिस तरह देश के प्रधानमंत्री के बारे में -ग़द्दार- जैसा शब्द लिखकर उसे ट्रेंड कराया गया, वह इसी का विस्तार है। बतौर नागरिक और राष्ट्र, यह हम सब के लिए बेहद शर्मनाक है। ऐसा नहीं होना चाहिए था। यह क्यों हुआ, इस पर उच्च स्तर पर मंथन होना चाहिए। विपक्ष को भी इस घटना की कड़ी निंदा करनी चाहिए। 

इसलिए अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। ज़रूरत है कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ आपसी कटुता भुलाकर देश को आगे ले जाने की फ़िक्र करें। इसमें सत्ताधारी पार्टी की भूमिका एक अभिभावक की तरह सबसे अहम हो जाती है कि वह सबको साथ जोड़कर और साथ लेकर चले। वरना ट्रॉल सेना का क्या है? वो तो पैसों के लिए अपने बाप को भी ट्रॉल कर दें। ईसा पीर, ना मूसा पीर, सबसे बड़ा है पैसा पीर। पर क्या वाक़ई??!!


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Video of SAARC Summit where Musharraf and Vajpayee addressed the gathering and Musharraf surprised everyone by shaking hands with Vajpayee. (साभार एपी)











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