पैदल घर लौट रहे मज़दूर वोट तो मोदी को ही देंगे, राहुल को नहीं

Nadim S. Akhter 13 May 2020

एक पत्रकार मित्र ने बताया कि उन्होंने सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र तय करके घर लौटते कुछ मज़दूरों से बात की। ये सभी अगड़ी जातियों के थे। पत्रकार मित्र ने जानना चाहा कि भूखे-प्यासे इतनी परेशानी झेलने के बाद प्रधानमंत्री मोदी जी के बारे में उनकी क्या राय है? क्या उनकी इस दशा के लिए मोदी जी और उनकी सरकार ज़िम्मेदार है?


भूखे और बेहाल मज़दूरों ने कहा- 'अब अकेले मोदी जी क्या-क्या करेंगे? वह तो बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। ये कोरोना वायरस मोदी जी थोड़ी लेकर आए हैं। ये तो जमाती लोग फैलाया है, जिसकी सज़ा हमलोग भुगत रहे हैं। मोदी जी से हमको कोई शिकायत नहीं।'

लब्बोलुबाब ये है कि मोदी जी जादूगर आदमी हैं। उनका वोट बैंक इंटैक्ट रहता है। नोटबंदी हुई, जीएसटी लागू हुई, देशभर से आए किसानों पर दिल्ली बॉर्डर पे लाठीचार्ज हुआ, अर्थव्यवस्था चरमराई, उद्योगपति पैसे लेकर देश से भाग गए  पर मोदी जी पर लोगों का प्यार और समर्थन बरकरार रहा। साल 2019 में जनता ने उन्हें और भारी बहुमत देकर केंद्र की कुर्सी पर दुबारा बिठाया। कोरोना पर एक्शन लेने में चाहे देरी हो गई हो और वह थोक के भाव में देश में घुस गया हो, पर जनता ने कभी सरकार से इसकी नाराज़गी नहीं जताई। कोरोना के इस विकट काल में भी थाली और मोमबत्ती जलाकर जनता ने मोदी जी का अभिवादन किया और उनको अपना भरपूर समर्थन दिया। 


मोदी जी के विरोधियों को इससे जलन हो सकती है पर ये सच्चाई है कि भुखमरी की कगार पर पहुँच चुके देश के ज्यादातर मजदूरों का मोदी जी पर अब भी अटूट विश्वास है। खासकर कल जब मोदी जी ने उनके त्याग और बलिदान को याद करते हुए 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की और आज दो-दो मंत्रियो ने टीवी पर आकर विस्तार से इस बारे में समझाया तो मजदूर भाई बमबम हैं। उनको पता है कि जल्द ही मोदी जी ये पैसा उनके पास भेजने वाले हैं और आज रात से कल सुबह तक व्हाट्सअप के जरिए ये संदेश भी उन तक पहुंच जाएगा कि मोदी जी ने सबके लिए लाखों करोड़ रुपये दिए हैं। और जब ये पैसा उनको नहीं मिल पाएगा, तो उनको पता है कि ये सब सरकारी बाबू और अफसर भ्रष्टाचार किए और उनका पैसा खा गए। वरना सरकार तो पैसा भेजी रही। ये संदेश भी उनको व्हाट्सअप के जरिए पहुंचा दिया जाएगा।

यही हाल देश के किसान, छोटे व्यापारियों, मंझोलो कारोबारियों और सर्विस क्लास का भी है। आप कहीं भी, किसी से भी बात कर लीजिए, अगर वो घोर वामपंथी टाइप या इंटरनेट पर इधर-उधर पढ़ने वाला बिगड़ैल प्राणी नहीं होगा और बस टिकटॉक, यूट्यूब वहा्टसअप यूनिवर्सिटी के जरिए खुद को दुनिया से जोड़े हुए होगा तो आपको बताएगा कि केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में देश के लिए क्या-क्या किया है। पिछली सरकारों के खाते की उपलब्धियां भी (अगर कोई हो तो) वह मोदी जी की सरकार के खाते में गिना देगा।


इसलिए जो लोग मजदूरों, किसानों, आम आदमी और फलां-ढिमका के दुख-दर्द का टेंशन लेकर खुद अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाए हुए हैं, वे ठंढ रक्खें। देश में सब चंगा सी। जैसा मैंने कहा कि मोदी जी म्यूजिशियन हैं। उनको हर जगह से ग्राउंड रिपोर्ट मिलती रहती है। ऐसा तंत्र बनाया हुआ है। ये यूं ही नहीं था कि दिल्ली दंगों के दौरान और फिर जमाती मौलाना साद मामले में अचानक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल जी खुद जमीन पर उतर गए। इससे पहले कश्मीर में भी वो आम लोगों के साथ दिखे। बकरीद पर कुर्बानी के लिए जानवर का मोल-भाव भी किया। 


सो मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश की जनता आज भी नरेंद्र मोदी जी के साथ है और आगे भी रहेगी। मैंने खुद आम और खास लोगों से जब-जब बात की, तो सबने कहा कि मोदी जी अच्छा काम कर रहे हैं और वोट तो इन्हीं को देंगे। ये ग्राउंड रिपोर्ट है। पत्रकार बंधु चाहें तो खुद जाकर सर्वे कर लें। कई जगह और कई स्तरों पर टटोलने के बाद मैं ये बात कह रहा हूं कि एकदम जमीन पर जो गरीब आदमी है, भले उसके घर में खाने को दो दाने ना हों, वहां से लेकर बड़े पेटू सेठ तक, हर कोई मोदी जी से प्रभावित है और उनके काम की प्रशंसा करता है। व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी ने समाज और लोगों का नजरिया जितनी तेजी से बदला है, उस पे अभी काम ही नहीं हुआ है, कोई ढंग की रिसर्च ही नहीं हुई। 

इसलिए सरकार भी अब रिलैक्स है। उसे पता है कि जनता साथ है। थोड़ा-बहुत कष्ट और ऊंच-नीच तो चलता रहता है। ये हर घर में होता है पर घर के मुखिया से नाराज़गी नहीं होती। एक चीज और है। आप अप्रोच का फर्क देखिए। राहुल गांधी और कांग्रेसी विपक्ष में रहकर अभी भी अगला पीएम बनने-बनाने का खाब देख रहे हैं। और इसके लिए कर क्या रहे हैं? राहुल, अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी और रघुराम राजन का अंग्रेजी में इंटरव्यू ले रहे हैं। किसी को समझ आया? फिर वही इटिलेक्चुअल क्लास। मतलब बात गरीब के सिर के ऊपर निकल जाए और खाया-पिया अघाया वर्ग उसे देखकर टीवी कपिल शर्मा के शो पर स्विच कर दे। फिर राहुल गांधी की बात किसने सुनी?


और माननीय नरेंद्र मोदी जी का अप्रोच देखिए। टीवी पर आकर मजदूरों और गरीबों को सीधे हिंदी में सांत्वना देते हैं। कहते हैं कि उनका त्याग और बलिदान देश पर एहसान है। उन्हीं के बल पर देश कोरोना से जंग जीतेगा। आप यकीन मानिए, 14 सौ किलोमीटर का सफर पैदल तय कर रहा मजदूर जब हांफते हुए रात में किसी ढाबे पर अपना मोबाइल चार्ज करके व्हाट्सअप पर मोदी जी का ये संदेश वीडियो सुनता है ना, तो उसके पैरों के छाले-भूख-प्यास सब छू हो जाते हैं। एक परम संतोष उसके मन में उभरता है कि देखो ! कम से कम देश का पीएम हमको याद तो कर रहा है, हमारे संघर्ष को बलिदान तो कह रहा है!! एक हमारा मालिक रहा, पैसवो नै दिया और भगा दिया। फिर वह चैन की नींद सोता है। बिंदास।

दूसरा उदाहरण आज का है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जब 20 लाख करोड़ का गुणा-भाग समझाने देश के सामने आईं तो अंग्रेजी में बोल रही थीं क्योंकि उनकी हिंदी उतनी अच्छी नहीं है। तब वित्त राज्य मंत्री औरगोली मारो सालों कोवाले नारे के नायक श्री अनुराग ठाकुर जी, निर्मला सीतारमण की बातों का हिंदी में अनुवाद कह के, कर के देश को सुना रहे थे ताकि बात देश के जन-जन तक पहुंचे। 


तो देखा आपने ! ये है अप्रोच का अंतर। राहुल गांधी अंग्रेजीदां होकर अर्थशास्त्रियों से मुखातिब हैं और हमारे मोदी जी भदेस देसी अंदाज में देश की जनता से रूबरू हैं। अब समझिए कि वोट जनता को देना है या अर्थशास्त्रियों को। एक और बात। कांग्रेस में पता नहीं कौन रणनीतिकार रहा है कि वहां टॉप पर उन्हीं लोगों को बैठा दिया जाता है, जिनका हिंदी बोलने में हाथ बुरी तरह तंग होता है। सोनिया गांधी जी का तो समझ आता है कि वह इटली से आईं, फिर भी उन्होंने ठीकठाक हिंदी बोलनी सीख ली। लेकिन खेल देखिए। मनमोहन सिंह जी से लेकर पिछली बार वाले मल्लिकार्जुन खड़गे और इस बार वाले अधीर रंजन चौधरी, सब के सब हिंदी के 'मूर्धन्य विद्वान' हैं। इतने के हिंदी ठीक से बोल ही नहीं पाते। राहुल और प्रियंका अच्छी हिंदी बोलते हैं पर वहां भी दिक्कत है। ये खेल संबोधन का है। बहुत बारीक बात आपको बता रहा हूं, बस यही सोचता हूं कि कांग्रेस में कैसे रणनीतिकार हैं, जिन्होंने आज तक इन सब चीजों पर मंथन ही नहीं किया। उदाहरण देता हूँ। मसलन

मोदी जी जब भाषण देते हैं तो अपने चिरपरिचित अंदाज में कहते हैं - भाइयों और बहनों’ ! या कभी कहते हैं मित्रों’ ! 


अब राहुल गांधी का अंदाज देखिए। वह जब भी जनता के बीच भाषण देते हैं तो कहते हैं- भईया !! ’ 

यानी मोदी जी सम्मान देकर सधे हुए अंदाज में जनता से जुड़ रहे हैं और राहुल जी कह रहे हैं- भईया। अगर आप मुंबई चले जाएं तो वहां येभईयाशब्द गाली है। दिल्ली में भी कोई कन्या अगर ऑटो वाले या रेहड़ी पटरी वाले किसी गरीब से बात करेगी तो कहेगी- भईया ! मतलब अपने से नीचे क्लास का आदमी, छोटा आदमी। आप बिहार चले जाइए- किसी को रिक्शा लेना होगा तो वह पुकारेगा- रिक्शा ! वह कभी रिक्शा वाले कोभईयाकहकर नहीं पुकारेगा। 

तो कुछ समझे आपये जो संबोधन कला है ना, वह बहुत मायने रखती है और असर छोड़ती है। जनता की नब्ज पकड़िए, उससे जुड़िए। मौसमी मेंढक बनकर चुनाव मैदान में उतरेंगे तो जनता भगा देगी। व्हाट्सअप सेना के जरिए रोज जनता से संवाद करिए। हवाई जहाज उड़ाकर और थाली बजवाकर राष्ट्र निर्माण में जनता का पार्टिसिपेशन कराइए। जनता को बिजी रखिए।

मुझे तो आज भी याद है जब राहुल गांधी ने इस देश के गरीबों का मजाक उड़ाकर भरी सभा में अपने ही पीएम मनमोहन सिंह से कहा था कि प्रधानमंत्री जी ! गैस सिलिंडर के दाम घटा दीजिए। फिर उनकी सरकार ने दाम घटा दिए थे। क्या राहुल गांधी की पीएम मनमोहन सिंह से बातचीत नहीं होती थी? क्या निजी बातचीत में राहुल, पीएम को ये सलाह नहीं दे सकते थे? सार्वजनिक रूप से मंच से ऐसा कहकर राहुल गांधी ने तब क्या साबित करने की कोशिश की थी कि वो गरीब जनता के बड़े हितैषी हैं? यकीन मानिए, इसका बहुत निगेटिव मैसेज गया था। तब मैंने कुछ लोगों से बात की थी, वो राहुल गांधी से नाराज थे कि सब मिलकर नौटंकी कर रहा है। 


मुझे नहीं मालूम कि कांग्रेस में चापलूसों की जमात इस कदर हावी क्यों है कि जमीन से जुड़ी सच्चाइयां ऊपर तक नहीं पहुंच पातीं। पर बीजेपी में ऐसा नहीं है। मोदी जी जमीन से जुड़े आदमी हैं, सो जमीन की बात उन तक पहुंच जाती है। उनके विश्वस्त ये काम करते हैं। ये उनका अपना नेटवर्क है। इसके लिए वह किसी पर निर्भर नहीं हैं। तभी जनता में उनका जादू कायम रहता है। बुद्धिजीवी वर्ग औरखान मार्केट गैंगभले उनकी आलोचना करता रहे, चाहे ये गैंग सोशल मीडिया से लेकर यूट्यूब तक उनकी निंदा-आलोचना करता रहे, पर मोदी जी जनता की नब्ज पर हाथ रखते हैं। उन्हें सिर्फ जनता की परवाह है और जनता तक अपना संदेश कैसे पहुंचाना है, इस कला में वह माहिर हैं। 

राहुल गांधी और कांग्रेस वालों को नरेंद्र मोदी से सीखना चाहिए। राजनीति और राजनीति को साधने की कला इस देश में साल 2014 के बाद बदल चुकी है। समय के बदलते पदचाप को पहचानिए। और आप फिक्र मत करना। पैदल घर लौटने वाले ये सारे मजदूर कल चुनाव के दिन मोदी जी को ही वोट देंगे। शतप्रतिशत। आप कहें तो शर्त लगा लूँ। बस येखान मार्केट गैंगमजदूरों की चिंता में खाली-पीली दुबला हुआ जा रहा है। बेचारे !! जनता से संवाद की कला सीखो भाई, सीखो !!


ये भी पढ़ें

1. आरोग्य सेतु एप्प में डाटा सिक्युरिटी की राहुल की चिंता कितनी जायज़ है 



2. पीएम मोदी को ट्विटर पर ट्रॉल करके किसे क्या मिला ?



3. मेरा अनुमान सही निकला, आर्थिक पैकेज भी मिला और लॉकडाउन-4 भी आएगा




4. ये 'आत्मनिर्भर' क्या होता है भाई ? शब्दों की जलेबी बनाने में दक्षिणपंथी भी हो गए माहिर






Post a Comment

0 Comments