एक वायरस ने इस आज़ाद मुल्क की पोल खोल दी

दिल की बात



नदीम एस. अख़्तर, 15 मई 2020


इतिहास गवाह रहेगा कि कोरोना से भारत में आई आपदा आज़ाद देश के इतिहास की सबसे बड़ी विभीषिका होगी। ये एक काला अध्याय होगा। इसमें देश के सुविधा सम्पन्न नागरिक संवेदनहीन होकर अपनी ज़िंदगी में मस्त रहे। नेता भाषण और कागज़ी औपचारिकता निभाते हुए आंकड़े गिनाते रहे। ब्यूरोक्रेसी माई-बाप बनकर जनता पे कोड़े बरसाती रही। बड़ी अदालतों ने इंसाफ की देवी की तरह ना सिर्फ आँखों पे पट्टी बांध ली बल्कि अपने कान भी बंद कर लिए। अपने ही देश के भीतर लाखों गरीब मज़दूरों का पलायन हुआ। क्या बूढ़े, क्या बच्चे, क्या जवान और क्या महिलाएँ, हाकिम राज में सबकी नज़रों के सामने वे नंगे पाँव चले, पर उनके पैरों के छाले ना तो हुक्मरानों को नज़र आए और ना मीलॉर्ड बनकर अदालतों में बैठे न्यायमूर्तियों को। जज इंसान नहीं बन सके, वे निर्जीव मूर्ति ही बने रहे। 




लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाने वाला मीडिया इस दौरान पालतू बना रहा। जमातियों के बहाने उसने देश में हिंदू-मुस्लिम घृणा का पूरा माहौल बनाया, फेक न्यूज़ चलाई और नफ़रत बाँटी। एक टीवी न्यूज़ चैनल के एंकर ने ऑन एयर विपक्ष की नेता के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की और जब उनके ख़िलाफ़ पुलिस में मुक़दमा हुआ, तो मंत्री और कुछ नेता उस न्यूज़ एंकर के बचाव में उतर आए। आज़ाद देश के इतिहास में ये भी अभूतपूर्व रहा। पहले राजनीति व मीडिया की साँठगाँठ ढकी-छुपी होती थी, इस दफ़ा यह खुल्लमखुल्ला दिखी। प्रेस काउंसिल से लेकर एडिटर्स गिल्ड तक यानी मीडिया की स्वतंत्रता और निर्भीकता स्थापित करने का दम भरने वाले तमाम इदारे बालू में मुंडी गोतकर ये तमाशा देखते रहे। 

ना ही मीडिया और ना ही जनता ने सरकार से कभी ये पूछने की ज़हमत उठाई कि विदेश से निकला कोरोना वायरस बॉर्डर पार करके हिंदुस्तान की सरज़मीं पे कैसे आ गया? सरकार और तमाम सुरक्षा एजेंसियों ने उसे देश में घुसने से पहले क्यों नहीं रोका? और जब 130 करोड़ की आबादी में ये कोरोना घुस गया तो लॉकडाउन के नाम पर करोड़ों जनता को घरों में नज़रबंद कर दिया गया। कोरोना से लड़ने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं के इंतज़ामात करने की बजाय थाली और मोमबत्ती से कोरोना से जंग जीतने का दिखावा किया गया। फिर कराह रही जनता को जब राहत देने की बात आई, तो यहाँ भी भारीभरकम आर्थिक पैकेज लाकर आँकड़ों की बाज़ीगरी करके काम चला लिया गया। पहली बार भारतीय सेना ने भी एक अदृश्य और महासूक्ष्म वायरस के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी और पॉलिटिकल मास्टर्स को खुश करने के लिए जल-थल-नभ में हुंकार भरी।

ये सब कुछ अभूतपूर्व रहा। ना भूतो ना भविष्यति। ना ऐसा अब तक देखने-सुनने को मिला और ना शायद आगे ऐसा हो। सो भविष्य की पीढ़ियाँ जब काग़ज़-कलम लेकर आज़ाद भारत के इतिहास के इन पन्नों पर से गुजरेंगी, तो काल के इस पदचाप पे लाल निशान बनाती चली जाएंगी। उन्हें अफ़सोस रहेगा और ये पीड़ा भी कि उनके पुरखों ने देश की आज़ादी और संविधान के साथ क्रूर मज़ाक़ किया। उसे ये भी हैरत होगी कि 130 करोड़ की आबादी में ज़्यादातर पुरखे इतने मूर्ख और डरपोक रहे कि वक़्त पर ना कुछ कह सके और ना फ़ैसले ले सके। एक स्याह अंधेरी रात की तरह ये वक़्त निकला, जब लोकतंत्र की सारी संस्थाओं ने समझौता करके अपने गिरेबान काले कर लिए। हमारी अगली पीढ़ी ये सोचेगी और रोष से भर जाएगी कि इस काल के उनके पुरखों में मुंशी प्रेमचंद के पंच-परमेश्वर की तरह न्याय की बात करने वाला ऐसा एक भी आदमी नहीं रहा, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की ड्राइविंग सीट पर बैठा हो। सब के सब बेहद कमजोर, स्वार्थी और डरे हुए इंसान रहे, जिन्होंने तुच्छ स्वार्थों के लिए देश का बड़ा नुक़सान किया।



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