आख़िर किसानों-मजदूरों के साथ ज़मीन पे उतर के भी चुनाव क्यों नहीं जीत पा रहे राहुल गांधी ?

Nadim S. Akhter 16 May 2020


राहुल गांधी को लगता है कि मज़दूरों के बीच मास्क पहनकर जाने से ये उनके हितैषी बन जाएंगे और भारत के मज़दूर एक होकर, कांग्रेस को वोट दे देंगे। पिछले कई साल से राहुल कभी मजदूर, कभी किसान, कभी गरीब की कुटिया और कभी भिखारी के द्वारे बैठकर हमदर्दी जताते आए हैं पर...


जब चुनाव हुए तो इन सबने वोट की लाइन में लगकर कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। राहुल को शायद ये पता ही नहीं कि ये सभी लोग #jio के सस्ते डाटा पे पलने वाले #whatsapp यूनिवर्सिटी के नियमित विद्यार्थी हैं, जिनके मोबाइल पर रोज़ हिन्दू-मुसलमान वाले नफरत भरे मेसेज आते हैं। ये भी कि राहुल पप्पू हैं। फिर ये सब मिलकर ज़ोर-ज़ोर से हंसते हैं कि राहुलवा तो पप्पू है भायो और वोट दे आते हैं। हर बार की तरह अपनी सरकार चुनते हैं। राष्ट्रवादी सरकार।

इनको ये ज्ञान मिल चुका है कि जब सीमा पर जवान देश के लिए गोली खाकर भूखे-प्यासे रह सकता है, तो देशहित में क्या ये कुछ किलोमीटर भूखे नहीं चल सकते? हवा पीकर नहीं रह सकते? बिल्कुल रह सकते हैं। अभी मध्य प्रदेश के एक रेलवे प्लेटफॉर्म का वीडियो वायरल है, जिसमें घर लौटते मज़दूरों ने प्लेटफॉर्म पे बंद पड़ी एक दुकान का ताला तोड़कर पानी, बिस्किट और चिप्स के पैकेट लूट लिए। देशहित में इन्होंने अपना चरित्र दिखा दिया। आप कह सकते हैं कि ये प्यासे थे। पर वीडियो में दिख रहा है कि स्टेशन पर पानी के नल खुले हैं, फिर भी ये पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर लूटकर भाग रहे हैं। इसे समझिए।


रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर लूटपाट करते घर लौटते मज़दूर

यही चरित्र ये चुनाव में वोट डालते हुए भी दिखाते हैं। जब ये अपने गाँव-जबार में होते हैं, तो पैसे और दारू के लिए स्थानीय नेताजी के नफरती प्रदर्शनों में भी शामिल होते हैं और दंगों में भी। इनसे बड़ा राष्ट्रभक्त आपको कोई और नहीं मिलेगा। कभी फुर्सत में इनसे बात करके देखिएगा तो ये आपको बताएंगे कि भारत को ये कैसे हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं और इस देश में वे गरीब इसलिए हैं कि उनका सारा पैसा और हक, इस देश के मुसलमान लोग मार लेते हैं। उन सबको पाकिस्तान भेज देना चाहिए। व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी से ऐसे सैकड़ों ज्ञान ये रोज़ ग्रहण करते हैं और फिर काम-धंधे पर निकल जाते हैं। 

सो अगर इतना बड़ा सामाजिक परिवर्तन आपको नहीं दिखता है तो आप या तो बहुत भोले हैं या राहुल गांधी की तरह मासूम, जिन्हें लगता है कि कोरोना काल में भी मास्क पहनकर वह जनता से जुड़ रहे हैं और कांग्रेस पार्टी को मजबूत कर रहे हैं। वैसे अरविंद केजरीवाल जैसे घाघ राजनेता ये समझते हैं, तभी तो वह चुनाव में ग़रीबों से कहते हैं कि मेरे विरोधियों से दारू और पैसे ले लेना, पर वोट आम आदमी पार्टी को ही देना, मुझे ही देना। पर राहुल ये नहीं समझते। वह अपने बाप-दादी के ज़माने वाली राजनीति साल 2019-20 में भी कर रहे हैं, इसीलिए असफल हैं।


आप याद करिए कि राहुल गांधी की जनता से जुड़ने वाली ख़बरें और तस्वीरें आप कितने सालो से देख रहे हैं। कभी सुबह-सुबह वह मोटरसाइकिल पर बैठकर किसी गाँव को निकल जाते हैं, कभी मिट्टी उठाकर फेंकने लगते हैं, कभी किसी गरीब के घर या होटल में चाय पी रहे होते हैं, कभी किसी गरीब बूढ़ी अम्मा को गले लगा रहे होते हैं आदि-अनादि। पर इन सबका हासिल क्या है? किसी कांग्रेसी से पूछिए। राहुल गांधी से ही किसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पूछ लीजिए के ये सब करके आपने अब तक क्या हासिल किया। जवाब मैं बता देता हूँ आपको। राहुल मुस्कुराएँगे और कहेंगे कि मैं अपना काम कर रहा हूँ। बस यहीं प्रॉब्लम है। आप अपना काम कर रहे हैं पर क्या कर रहे हैं, कभी शांति से बैठकर किसी कोने में सोचा है आपने? चमचों की सलाह के बग़ैर?

अगर राहुल के व्यक्तित्व, उनकी सदिच्छा और नेकनीयत पर जनता को भरोसा होता तो कम से कम 2019 के चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की इतनी दुर्गति नहीं हुई होती। अब इससे ज़्यादा दुर्गति क्या होगी कि ख़ुद अपने ही गढ़ अमेठी में वह बीजेपी की तेजतर्रार नेता स्मृति ईरानी के हाथों हार गए। इससे शर्मनाक क्या हो सकता है भाई? जब राजा ही हार जाए, तो सेना का मनोबल क्या होगा और आगे उसकी रणनीति क्या होगी!! लेकिन लगता है कि कांग्रेस इससे सबक़ लेने को तैयार नहीं। आज ट्विटर पर एक दिलचस्प वाक़या हुआ। कांग्रेस में सोशल मीडिया के राष्ट्रीय संयोजक गौरव पंधी ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को ट्वीट करके ये कहा कि स्मृति एक 'UNINTELLIGENT' सांसद है। 


गौरव ने लिखा- ' SMRITI IRANI is the DUMBEST & most UNINTELLIGENT Parliamentarian in the history of India! '


इसके जवाब में स्मृति ईरानी ने नहले पे दहला दे मारा। 

स्मृति ने लिखा- 'I agree .... imagine a dumbass like me defeating the super intelligent RG'
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अर्थात् स्मृति ने कहा कि ठीक है, मैं इंटेलिजेंट नहीं हूँ पर सोचो कि मेरे जैसे dumb व्यक्ति ने तुम्हारे सुपर इंटेलिजेंट राहुल गांधी को हरा दिया। इस ट्वीट के बाद कांग्रेस के गौरव बगलें झांकते नजर आए। 

ये उदाहरण आपको इसलिए दिया कि राजनीति में संदेश कितना महत्वपूर्ण होता है, इसे समझिए। आप देखिए कि कांग्रेस का सोशल मीडिया सँभालने वाला एक व्यक्ति ट्विटर पर खुलेआम एक महिला बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री पर शब्दों के वाण चलाते हैं, हमला करते हैं और उनको जवाब क्या मिलता है? एकदम सपाट और मारक। कि आपके राहुल गांधी इतने ही इंटेलिजेंट हैं तो चुनाव मैंने ही हराया ना !! ये होता है मनोवैज्ञानिक दबाव और वो बल, जिसके सहारे राजनीति होती है। 


आप सोचिए कि इसके बाद कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के पास बोलने को क्या रह जाता है, जब ये उदाहरण दे दिया जाए कि आपके राजा तो हार गए थे, फिर काहे ज्ञान बघार रहे हो भाई ? अब राहुल गांधी की जगह नरेंद्र मोदी या अरविंद केजरीवाल को रखकर सोचिए कि अगर वे अपनी सीट से चुनाव हार जाते, भले उनकी पार्टी जीत जाती तो पार्टी पर और जनता पर उनका क्या रसूख़ रह जाता? क्या यह अनायास था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली ज़बरदस्त हार के बाद राहुल गांधी ने इसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए पार्टी अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफ़ा दे दिया और कांग्रेस में नेतृत्व का संकट पैदा कर दिया! पार्टी में नेतृत्व का ये संकट आज भी बरकरार है और सोनिया गांधी जैसे-तैसे पार्टी की नैया खींच रही हैं। पर सवाल ये उठता है कि कब तक? आख़िर कब तक सोनिया जी कामचलाऊ नेतृत्व देती रहेंगी? इस सवाल पर हम बाद में आएँगे। अभी देखते हैं कि ट्विटर पर कांग्रेस के गौरव और बीजेपी की स्मृति के बीच आज जो वाकयुद्ध हुआ, उसके क्या निहितार्थ हैं?

आप देखते होंगे कि क्रिकेट के मैदान में भी खिलाड़ी विपक्षी टीम के बल्लेबाज़ पर दबाव बनाने के लिए हूटिंग करते हैं। उन्हें भला-बुरा कहते हैं और कई बार तो गाली-गलौज भी हो जाती है। किसलिए? इसलिए कि बल्लेबाज़ मनोवैज्ञानिक दबाव में आ जाए और ग़ुस्से में या फ्रस्टेशन में कोई ऐसा ग़लत शॉट खेल जाए कि उसे आउट कर दिया जाए। सो पहले तो मुझे यही समझ नहीं आया कि कांग्रेस के सोशल मीडिया देखने वाले गौरव ने स्मृति के बारे में ट्विटर पर ऐसे शब्द क्यों गढ़े? ख़ासकर तब, जब कांग्रेस में कमान ख़ुद एक महिला यानी सोनिया के हाथ में है और दूसरी महिला यानी प्रियंका वाड्रा भी राहुल की ही जगह पर हैं। ऐसे में कांग्रेस के एक सीनियर नेता को, बीजेपी की एक महिला नेत्री के बारे में ऐसे शब्द कहने से बचना चाहिए था। और देखिए, इसका अंजाम क्या होता है! स्मृति ईरानी ने ऐसा जवाब दिया, जिसने पूरी कांग्रेस पार्टी को मुँह छिपाने को मजबूर कर दिया। स्मृति ने कह दिया कि मैं जो भी हूँ, पर मैंने ही तुम्हारे नेता राहुल को उनके घर में हराया था ना !! भूल गए !!! किसकी बेइज़्ज़ती और बदनामी हुई, ये आप तय कीजिए।


अब आते हैं कांग्रेस के नेतृत्व संकट पर, जिसका ज़िक्र मैं ऊपर कर रहा था। आपको याद होगा कि जब कांग्रेस यूपीए नामक गठबंधन बनाकर केंद्र की सत्ता में थी, तो अक्सर चर्चा होती थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हटाकर अब कमान राहुल गांधी के हाथ में दे दी जानी चाहिए। पर हर बार राहुल गांधी का यही जवाब होता था कि नहीं। अभी वो पार्टी को मज़बूत कर रहे हैं। और देखिए, उन्होंने पार्टी ऐसी मज़बूत करी कि साल 2014 में नरेंद्र मोदी जी गुजरात से निकलकर पूरे देश पर छा गए और सीधे पीएम बने। चुनाव में कांग्रेस साफ़ हो गई। 

अब इसके कई विश्लेषण हो चुके हैं कि कांग्रेस क्यों हारी? यूपीए-2 में भ्रष्टाचार इसका एक अहम कारण रहा। वह सब साइड फैक्टर्स होंगे। पर असल कारण क्या रहा? मेरी नज़र में असल कारण रहा कमजोर नेतृत्व। मनमोहन सिंह जी पर हमेशा ये आरोप लगता रहा कि वह कमजोर प्रधानमंत्री हैं, उनकी ना पार्टी में चलती है और ना सरकार में। सब कुछ अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी के हाथ में है। यानी राजकाज सोनिया चला रही हैं। फिर देखिए कि कितना बड़ा Political Blunder होता है। खबर आती है कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी से कहा है कि बेटा ! सत्ता जहर है। और ये बात सार्वजनिक हो जाती है। मीडिया में खूब चर्चा होती है। लेकिन इसका संदेश क्या गया? यही ना कि अगर सत्ता जहर है तो फिर आप लोग इस जहर को क्यों पी रहे हैं भाई? काहे देश पे एहसान कर रहे हैं? छोड़िए सत्ता, हटिेए वहां से। काहे चुनाव लड़े थे फिर, जब सत्ता जहर है। आप जाइए, नीलकंठ ना बनिए देश का। देश कोई और चला लेगा। 


फिर एक दफा खबर आती है कि सरकार के किसी फैसले से नाराज राहुल गांधी ने मंच पर ही कागज का एक टुकड़ा फाड़ दिया है। यानी जिस व्यक्ति को देश और कांग्रेस पार्टी अगले पीएम के रूप में देख रहा है, वह सार्वजनिक रूप से ये मैसेज दे रहा है कि अपनी ही सरकार में उसकी नहीं चल रही। क्या कमजोर प्रधानमंत्री की छवि वाले मनमोहन सिंह उनकी नहीं सुन रहे? क्या मां सोनिया और बेटे में अंदर ही अंदर कोई संघर्ष और मतभेद है? और क्या कांग्रेस पार्टी में अंदर ही अंदर दो गुट बन गए हैं- एक सोनिया गुट और दूसरा राहुल गुट? सवाल कई थे और जवाब नहीं था। जनता भारी कन्फ्यूज थी कि ये हो क्या रहा है? 

फिर एक दफ़ा ख़बर आती है कि कांग्रेस के ही एक अधिवेशन में राहुल गांधी मंच से मनमोहन सिंह से गुज़ारिश करते हैं कि प्रधानमंत्री जी !! गैस सिलिंडर के दाम कम कर दीजिए। इसके बाद सारे चमचे कांग्रेसी ताली बजाते हैं। सोनिया और मनमोहन सिंह मुस्कुराते हैं। और फिर गैस सिलिंडर के दाम कम कर दिए जाते हैं। अब बोलिए, इसका क्या मैसेज गया? एक तो ये कि राहुल गांधी ग़रीबों के बड़े मसीहा हैं और गैस सिलिंडर के दाम कम करने के लिए अपनी ही पार्टी के पीएम से मिन्नत कर रहे हैं, उस पीएम से, जिनको प्रधानमंत्री उनकी मम्मी सोनिया ने ही बनाया है। 


दूसरा संदेश ये गया कि राहुल गांधी के हाथ में कुछ नहीं है। अपनी ही पार्टी की सरकार में उनकी चलती नहीं। सो जानबूझकर उन्होंने सार्वजनिक मंच से ये अनुरोध किया कि गैस सिलिंडर के दाम घटाए जाएं ताकि उनकी सुनी जाए। पर जानने वाले जानते हैं कि ये राहुल और कांग्रेस का एक पॉलिटिकल स्टंट था। राहुल की पार्टी में खूब सुनी जाती थी पर पता नहीं किन सलाहकारों और चमचों की राय पे उन्होंने ऐसा किया। मेरी समझ से इसका संदेश भी जनता में अच्छा नहीं गया। पब्लिक में राहुल की छवि कमजोर हुई। उसे लगा कि पता नहीं कांग्रेस में अंदरखाने हो क्या रहा है? और राहुल पर दांव लगाना ठीक नहीं। अगर पार्टी को वोट दे दिया तो कौन जाने अग़ली दफ़ा फिर मनमोहन सिंह ही पीएम बना दिए जाएं, जो यूपीए-2 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते काफ़ी बदनाम हो चुके थे और नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल के सपने ने जनता की आँखों में चौधराहट बिखेर दी थी। 


तब आज की तरह देश के मीडिया पर ना तो मनमोहन सरकार का लगाम था और ना कांग्रेस पार्टी का। सारे अख़बार और टीवी चैनल रोज़ भ्रष्टाचार पर कांग्रेस की बखिया उधेड़ रहे थे। आज वे ऐसा करेंगे तो मीडिया संस्थान के मालिक और सम्पादक, दोनों की चमड़ी उधेड़ दी जाएगी। पर कांग्रेस मीडिया को साध नहीं पाई और उसकी छवि लगातार जनता में ख़राब होती चली गई। फिर जनलोकपाल को लेकर अन्ना हज़ारे जैसे फ़र्ज़ी आदमी के आंदोलन ने आग में घी का काम किया। एक पूरा माहौल कांग्रेस के ख़िलाफ़ बना या बनाया गया। योगगुरू बाबा रामदेव भी उसमें सक्रिय रहे और पुलिस की लाठियों से बचने के लिए उनको नारी का वेश धरकर सलवार पहनकर भागना पड़ा। ये सब अभूतपूर्व रहा। 

उस वक़्त सबको यही लग रहा था कि अब कांग्रेस को हटाओ भाई !! अति कर दी इन लोगों ने। और इन सबके बीच राहुल गांधी ख़ामोश रहे। ना तो उन्होंने अपनी सरकार की आलोचना की और ना ही पार्टी के स्तर पर देशभर में जनता से ऐसा कोई संवाद स्थापित किया, जिससे जनता को लगे कि ये सब भ्रष्टाचार के आरोप हैं, अभी सिद्ध हुए नहीं हैं। कांग्रेस जनता के प्रति ईमानदार है, तभी तो वह RTI यानी सूचना के अधिकार जैसा कानून लेकर आई है। मनरेगा जैसी योजना ग्रामीण स्तर पर लागू की जी रही है ताकि असंगठित क्षेत्र के लोगों को साल में कुछ दिन तो काम मिले! आज देखिए कि करोना काल में इसी मनरेगा योजना की पीठ पर सवार होकर मोदी सरकार गांव वालों को भुखमरी से बचाने का दम ठोक रही है। पर ये हो ना सका। राहुल गांधी बैकसीट पर रहे। सारे इल्जाम मनमोहन सिंह झेलते रहे और पीएम पर हमलावर नरेंद्र मोदी ने बाजी पलट दी। उस वक्त गुजरात मॉडल का भूत जनता के सिर पर इस कदर सवार था कि लोग कांग्रेस को बस सत्ता से हटा देना चाहते थे ताकि अच्छे दिन आ सकें। और फिर अच्छे दिन आ गए। आम चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी और मोदी जी पीएम बन गए। दिल्ली में बीजेपी के सारे धुरंधर नेताओं को किनारे लगाते हुए, तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सहयोग से। वो एक अलग कहानी है।


बहरहाल, आज सोशल मीडिया पर फिर जनता मज़दूरों के साथ राहुल की फ़ोटो लगाकर राहुल का गुणगान कर रही है और कह रही है कि देखो-देखो !! कित्ता भला आदमी है। कोरोना काल में जब सारे बड़े नेता अपने-अपने दड़बे में दुबके हुए हैं तो बहादुर राहुल बीमारी लगने के भय के बिना सड़क पर है। उनसे संवाद कर रहा है। वाह !! लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि ऐसा करने से क्या राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को अगले चुनाव में वोट मिल जाएँगे? मुझे तो नहीं लगता। क्यों? क्योंकि कांग्रेस का आईटी सेल इतना कमजोर है कि आज फेक न्यूज़ और प्रोपेगेंडा के ज़माने में वह अपने विरोधियों की काट कर ही नहीं पा रहा। अब वो समय गया, जब आप अख़बार में अपना इंटरव्यू देकर, टीवी पर बाइट देकर और यदा-कदा भाषण देकर जनता तक अपना संदेश पहुँचाते थे। WhatsApp University और डिजिटल युग में अब ऐसे संदेश डेली खुराक की तरह जनता तक पहुंचाए जाते हैं, एकदम संगठित तरीके से, जिनमें ज्यादातर संदेश फेक, मनगढ़ंत और प्रोपेगेंडा वाले होते हैं। चूंकि देश में मीडिया लिटरेसी नहीं है, इसलिए आम जनता ये समझ ही नहीं पाती कि इसमें सही खबर क्या है और गलत क्या है? वह व्हाट्सएप पर आए संदेश को सत्य मानकर उसे अपने दिमाग में बिठा लेती है।

आप विश्वास कीजिए, झारखंड में मेरे ख़ुद के घर में अभी 15 दिन पहले तक मेरा परिवार जी न्यूज़ देखा करता था। एक दिन बात ही बात में मुझे ये सूचना मिली। तब मैंने फ़ौरन उनको ताकीद करी के कम से कम जी न्यूज़ ना देखा करे। अपने घरवालों को मैंने कई अन्य चैनलों के नाम बताकर उनको मीडिया लिट्रेट किया और बताया कि ये सारे चैनल सरकारी भोंपू बन चुके हैं। वे इनको ना देखें। घरवालों को ये भी बताया कि सही ख़बर जानने के लिए वे क्या करें और क्या ना करें। कहने का मतलब ये है कि आज भी जनता अख़बार में छपी ख़बर और टीवी पर आ रहे न्यूज़ को पवित्र मानती है। कितने लोग हैं, जिनमें मीडिया लिटरेसी है और जो जानते हैं कि फेक न्यूज़ नाम की भी कोई चिड़िया होती भी है! लोग नहीं जानते। सो आज के युग में असल लड़ाई सूचना पहुँचाने की है। सही भी और फेक भी। जो अपनी सूचना, अब चाहे वह फेक हो या प्रोपेगंडा हो या सच्ची ख़बर, जनता तक पहुँचा लेगा, वह युद्ध जीत जाएगा। 


इसलिए राहुल गांधी को ये समझना होगा कि राजनीति अब बदल चुकी है। चार मज़दूरों, किसानों और ग़रीबों के साथ बैठ-बतियाकर वह भारत की जनता का ना दिल जीत सकते हैं और ना उनके दिल में बैठे संशयों का समाधान कर सकते हैं। इसके लिए कांग्रेस को अपने आईटी सेल को मज़बूत करना होगा। बहुत मज़बूत। फिर किसी योग्य आदमी को इसकी कमान थमानी होगी जो विरोधियों को धोबी-पछाड़ दे सके। आप भले फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा ना फैलाए  पर आपके बारे में जो ग़लत बातें सोशल मीडिया से लेकर व्हाट्सअप पर तैर रही हैं, कम से कम उसका तोड़ तो करिए। क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जाना था, टाइप बातें करेंगे तो फिर राजनीति छोड़ दीजिए। संन्यास ले लीजिए। राजनीति करनी है तो तकनीक का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल करिए, योग्य टीम बनाइए और आक्रामक राजनीति करिए। डिफेंसिव राजनीति का दौर गया। स्मृति ईरानी जी मुझे पसंद हैं क्योंकि वह आक्रामक राजनीति करती हैं। वह फ़्रंटफुट पर आकर बैटिंग करती हैं और गेंद पर चौका या छक्का जड़ती हैं। ये क्या आसान रहा होगा कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के गढ़ अमेठी में ही  स्मृति ने राहुल को हरा दिया। ये अलग बात है कि इतनी बड़ी जीत के बाद भी केंद्रीय मंत्रीमंडल में उनको वैसा अहम विभाग नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। वो एक अलग कहानी है और बीजेपी की अंदरूनी राजनीति है। खैर !


आप सोचिए कि आज कांग्रेस में ऐसा कौन नेता है, जो मोदी जी को उनके गढ़ बनारस में हरा सके? कोई है? क्या राहुल गांधी ही उनको हरा देंगे? या फिर प्रियंका? पिछले चुनाव में तो चर्चा भी चली थी और प्रियंका ने ख़ुद अपने मुँह से कहा था कि वो बनारस लड़ने भी जा सकती हैं पर ऐसा नहीं हुआ। कारण सबको मालूम है। मोदी जी की जनता में लोकप्रियता इतनी है कि अगर सोनिया जी भी आज बनारस से मोदी जी को हराने की सोचें, तो उनको 10 बार सोचना होगा कि ऐसा हो पाएगा या नहीं। हालाँकि एक वक़्त था, दक्षिण भारत के बेल्लारी लोकसभा सीट से सोनिया गांधी और बीजेपी की स्वर्गीय सुषमा स्वराज में काटे की टक्कर थी और सोनिया ने सुषमा को हरा दिया था। पर मोदी जी को कौन हरा देगा? चलिए उनको छोड़िए। बीजेपी के अमित शाह को ही गुजरात में कौन हरा पाएगा? कौन है कांग्रेस की सेकेंड लाइन लीडरशिप में ऐसा? जवाब है- कोई नहीं। 

आज कांग्रेस पार्टी की दुर्गति ये है कि राहुल के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद पार्टी आज तक अपना कोई फुलटाइम अध्यक्ष नहीं चुन पाई। सोनिया बीमार रहती हैं पर वही नेतृत्व सँभाले हुए हैं। मेरी नज़र में राहुल गांधी से यहाँ भी एक गलती हुई। 2019 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार के बाद उनको नेतृत्व नहीं छोड़ना चाहिए था। इसका कांग्रेस पार्टी को बड़ा नुक़सान हो गया। कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया। हार-जीत तो राजनीति में लगी रहती है। पर असल योद्धा वही होता है, जो डटा रहता है। इतिहास इसका गवाह है। आप टीम में रहेंगे तभी तो कमबैक कर सकेंगे। हार पे सबको निराशा होती है, आत्मविश्वास टूटता है। ये इंसानी फ़ितरत है। ये सब ठीक है पर असल टीम लीडर वह होता है, जो हार के कारणों का ईमानदारी से निरीक्षण करके तुरंत उसे ठीक कर दे और काम पे लग जाए। राहुल गांधी कांग्रेस में पार्ट टाइमर नेता बनकर रह गए हैं। जब जी आया, ये कर लिया, जब जी आया, घर बैठ गए। ऐसे नहीं चलेगा।


सबसे पहले तो उनको ये डिसाइड करना होगा कि उनको राजनीति करनी है या नहीं। Hesitant व्यक्ति सफल नहीं हो सकता। उनकी मां सोनिया गांधी के ही शब्दों में अगर सत्ता जहर है, तो उन्हें इस जहर का घूंट पीना और इससे खेलना सीखना पड़ेगा। राजनीति विज्ञान में ये तो रिसर्च का विषय है कि देखते ही देखते कांग्रेस के उत्तराधिकारी राहुल गांधी की छवि मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में 'पप्पू' की बना दी गई और इतने साल पुरानी पार्टी आंख मूंदे तमाशा देखती रही। इसका ना अग्रेसिव तरीके से प्रतिकार किया गया और ना तोड़ निकाला गया। मैंने तो अपने एक मित्र को कहा है कि आप इस पर पीएचडी करो कि कैसे देखते-देखते भारत की सबसे पुरानी पार्टी में नेतृत्व के भावी दावेदार को विरोधियों ने पप्पू यानी मूर्ख-नासमझ-भोला-अनाड़ी बना दिया। और जनता में ये मैसेज घर कर गया कि राहुल गांधी तो पप्पू हैं। आपको सोशल मीडिया में वायरल वो वीडियो याद होगा, जिसमें राहुल का विरोधियों ने खूब मजाक बनाया। इस एडिटेड वीडियो में राहुल गांधी ये कहते नजर आ रहे हैं कि इधर से आलू डालो, उधर से सोना निकलेगा। अकेले इस वीडियो ने राहुल की इमेज को इतना गहरा आघात लगाया, इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। आप सर्वे करवा लो, जनता ये कहती मिलेगी कि वो राहुल तो बस ऐसे ही है यार ! आलू से सोना बनाने की बात करता है। फिर आप देखिए कि उस वीडियो के प्रतिकार में कांग्रेस पार्टी के नेताओं और उनके आईटी सेल ने क्या किया? कुछ नहीं। यहां-वहां बयान आ गए, कुछ बना-वना के इधर-उधर डाल दिया, हो गया। ड्यूटी पूरी। जबकि पार्टी के लिए ये बेहद गंभीर मामला था।


ऐसे नहीं चलेगा। आज जनता सोशल मीडिया पर ही राय बना लेती है। टीवी देखकर राय बनाती है। मास कम्यूनिकेशन की बुलेट थ्योरी काम करती है यहाँ कि टीवी पर जो देखा, वो बुलेट की गोली की तरह दर्शक के दिमाग़ में सीधे घुसती है। ठाँय !! तो टीवी पर एंकर्स जो बोलते-चीखते-चिल्लाते और दिखाते हैं, देश की एक बड़ी आबादी उसे सच मानती है। देखिए, मीडिया ने कितनी आसानी से जमातियों को देशभर में कोरोना फैलाने का दोषी बना दिया और जनता ने मान लिया। अब आप लाख आँकड़े दिखाते रहो, सफ़ाई देते फिरो, कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता। ये है टीवी की ताक़त। जो इसका इस्तेमाल करना जान जाएगा, वही युद्ध जीतेगा।

सो राजनीति परसेप्शन का गेम है। अगर जनता की नज़र में आप हीरो बना दिए गए, तो आप हीरो हैं। और अगर जनता की नज़र में आप पप्पू बना दिए गए, चाहे हार्वर्ड से ही पढ़कर क्यों ना आए हों, तो आप पप्पू ही हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया की इसमें बहुत बड़ी भूमिका है। बेहतर है कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी इसे जितनी जल्दी समझ जाए, उतना अच्छा। किसी योग्य आदमी को मीडिया सँभालने की ज़िम्मेदारी दे, पुराने घाघों और चमचों को छोड़कर। तभी कुछ हो पाएगा। आप मोदी जी को देख लीजिए। इस मामले में वह समझौता नहीं करते। जो आदमी दक्ष है, उसी को काम पर लगाते हैं। अब ये मत पूछने लगिएगा कि मोदी सरकार में किसे क्या मंत्रालय मिला है और कौन कितना गुणी है। वह अलग चीज है। मैं पार्टी के लेवल पर संगठन, अनुशासन और मीडिया को हैंडल करने की बात कर रहा हूँ। यहाँ आकर आप बीजेपी की तुलना कांग्रेस से कीजिए। कांग्रेस कहीं टिकती ही नहीं।


बातें अभी और हैं और कहने को बहुत कुछ है कि तब राहुल को क्या करना चाहिए आगे। उनकी राजनीति की रणनीति भविष्य में क्या होनी चाहिए, ये सवाल जायज़ है। पर ये लेख बहुत लंबा हो गया है अभी। सो फ़िलहाल इसे विराम देता हूँ। मूड हुआ तो अगले लेख में राहुल को क्या करना चाहिए, इस पर लिखूँगा। 

धन्यवाद।

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