करोना-कोरोना काहे रो रहे हो भाई, ऑल इज वेल !

त्वरित टिप्पणी


Nadim S. Akhter 23 May 2020

अब काहे रो रहे हो भाई- कोरोना, कोरोना, कोरोना !

500 था, अब लाख हो गया, 10 लाख हो जाएगा, किसको फर्क पड़ता है?

ये कि गाँव-गाँव तक पहुंच गया है करोना

मज़दूर पैदल चल रहे हैं, किसान परेशान हैं, बनिए तंगहाल हैं, उद्योगपति चित हैं, इकोनॉमी धम्म है, महंगाई ऊपर है, रुपया नीचे है, रोजगार खत्म हो गए, पगार घट गई, जीवन बंद है, नेताओं को आनंद है, पुलिस का राज है, जज का बदला मिजाज़ है...

किसे फर्क पड़ता है

जनता को?

बिल्कुल नहीं। वह फिर थाली बजाएगी और फिर दीया जलाएगी। देशभक्ति चरम पे है, फिर आपका ही दिमाग क्यों गरम है?

जाइए, लस्सी पीजिए नहीं तो लू लग जाएगी। काहे खून जलाते हैं? जनता को जागृत करना चाहते हैं? वो तो नहीं होगा। जनता पहले से जागृत है। आप पप्पू बन रहे हैं। 

अफीम की लत बुरी होती है। हिन्दू-मुसलमान भी अफीम है। जनता रोज़ चाटती है। आप किस घर में रहते हैं? कभी टेस्ट तो कीजिए?

सुनिए, ये लोकतंत्र है। यहां होगा वही, जो जनता चाहती है। इसलिए लोक के साथ रहिए। तंत्र का साथ दीजिए। जिसे जनता ने चुना है, राज उसी का है यानी जनता का है। देश बदल रहा है तो बदलने दीजिए। पुरानी मान्यताएं अब नहीं चलेगी। देखो, कोर्ट कितना समझदार है। उसने खुद को तुरन्त बदल लिया। पुलिस और सी-बी-डी-आई-वाई-फाई तो बदले ही रहते हैं। संजोग और  चुनचुना-आव-ताव आयोग भी फिट हो गया। बस आप ही को मिर्ची लगी रहती है।

जनादेश का सम्मान करना सीखिए। कोरोना से कैसे निपटना है और मज़दूरों को कैसे घर जाना है, ये जनता ने तय किया है। चुनाव में। आप कौन? कबाब में हड्डी? विपक्ष ने तय किया कि उनको राजनीति भी नहीं आती। बस के नम्बर तक नहीं दे पाए ढंग से, घर-घर तक व्हाट्सएप्प मेसेज क्या पहुंचा पाएंगे?

सो ज्यादा सपने मत देखिये, मुंगेरीलाल मत बनिये। प्रैक्टिकल बात करिए। जो योद्धा होगा, जीत उसी की होगी। सो लोकतंत्र में जो जीत के आया है, राज उसी का चलेगा। कोई आसमान से नहीं टपका है यहां। इसी जनता ने चुना है जो आज सैकड़ों किमी पैदल चलकर देश सेवा का नमूना पेश कर रहे हैं। उनसे हमदर्दी जताकर उनके वोट का अपमान मत करिए। जिसको खुद पैदल चलने में गर्व हो रहा है, आप ज़बरदस्ती वहां घुसे जा रहे हैं! बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना


आज चुनाव हो जाएं तो ये सारी जनता मिलकर फिर अपने आराध्य को चुन लेगी कोर्ट समझ गया है, जज समझ गए हैं, आप कब समझेंगे? फटे में टांग घुसाना बंद करिए और लोकतंत्र का सम्मान करना सीखिए। एक आप ही नहीं हैं विद्वान यहां। इस देश का एक चाय वाला भी आपसे ज्यादा राजनीति की समझ रखता है। सो चीखना-चिल्लाना बंद करिए और देश के विकास में योगदान दीजिए। लोकतंत्र में जनता राजा है और नेता सेवक। सो जिसे जनता चाहेगी, वही लोक पर राज करेगा। गण भी उसी का होगा और तंत्र भी।

जाइए, कभी आईने में चेहरा देख आइए। कितने बीमार लग रहे हैं। खुश रहिए। जैसे मज़दूर हैं, किसान हैं, व्यापारी हैं, डॉक्टर हैं, वकील हैं, पुलिस है, जज हैं, बनिए हैं, उद्योगपति हैं, टीचर हैं, पारा टीचर हैं, सफ़ाईकर्मी हैं, ब्यूरोक्रेट्स हैं, फलना हैं और ढिमका हैं। आज ही के दिन चुनाव नतीजे आए थे ना पिछले साल। क्या था आँकड़ा? 300 के पार। तब मुँह देखा था आपने अपना? आईने में? आज भी वैसा ही मुँह लेकर घूम रहे हैं। अजी, सुधर जाइए, फिर कहता हूँ। 

जब जनता खुश, नेता खुश, मंत्री-संतरी खुश, यहाँ तक कि बहन मायावती भी खुश, तो आप किस ग्रह से आए हैं? मंगल से क्या? ये पृथ्वी है। वीर भोग्या वसुंधरा। खुश रहिए क्योंकि मिर्ची सुनने वाले ऑलवेज खुश। मिर्ची लगने वाले ऑलवेज दुखी। सब चंगा सी। किधर भिखमंगा सी? नो व्हेयर। ऑल इज वेल। होठों को कर के गोल, सीटी बजा के बोल..

ऑल इज वेल। कुछ समझे बाबू ! 


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