चीन की कूटनीति समझिए, उसकी राजनीति बचेगी तभी उसका बिज़नेस फलेगा

चक्रव्यूह

Nadim S. Akhter 28 May 2020


जिस तरह से पूरी दुनिया चीन पे लटकी नहीं हुई, झूली हुई है, वैसे में चीन कोरोना के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए कुछ भी कर सकता है। कोरोना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी जो साख धूमिल हुई है, उसे पाने के लिए वह एक ऐसे मुद्दे की तलाश में है, जहां वह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को बता सके कि वह शांति वाला देश है और दुनिया के देशों की बात मानता है। सो भारत के साथ सीमा पर उसकी जो नई तनातनी हुई है, उसे इसी रूप में देखा जा रहा है। 


ये भुलावे में देश ना रहे कि डोकलाम की तरह इस बार भी बातचीत से हल निकल जाएगा। सो अगर चीन अड़ा रहता है तो दुनिया बीच में आएगी। तब उनकी बात मानकर चीन कोरोना के इल्ज़ाम से मुक्ति पाने की कोशिश करेगा कि देखो! हमें दुनिया में शांति की कितनी फिक्र है। दावा छोड़ दिया, थोड़ा पीछे हट गए पर रणनीतिक रूप से चीन उसी ज़मीन पे पेट्रोलिंग कर रहा होगा, जिस पे पहले भी करता रहा था।

यानी मुहल्ले का दादा आपके घर में घुसकर कब्ज़ा करने की कोशिश करे और फिर मुहल्ले वालों की बात मानकर पीछे हट जाए कि अबकी बार नहीं छोड़ूंगा तो मुहल्ले वाले कहेंगे कि देखो, कित्ता भला आदमी है। हमारे समझाने पे हट गया। लगता है कि चीन भी यही करना चाह रहा है। अब तो ये भी खबरें रही हैं कि उसने अपना एयरबेस भी बना लिया है और उसके लड़ाकू जहाजों की मौजूदगी की भी बात हो रही है। 

आज सुबह एक मित्र का फोन आया जो मेरी पिछली पोस्ट पढ़कर कह रहे थे कि चीन ने भारत में बहुत पैसा लगा रखा है, वह जंग नहीं कर सकता हमसे। हमने पूछा कि पैसा तो अमरीका ने भी भारत में लगा रखा है, फिर ट्रम्प ने कैसे कह दिया कि हैड्रॉक्सिक्लोरोक्वीन नहीं दोगे तो अमरीका कार्रवाई करेगा भारत के खिलाफ! विजय माल्या भारत से करोड़ों रुपए लेकर भाग गया पर उसकी कम्पनी किंगफिशर का बियर जनता अभी भी पी रही है कि नहीं? कम्पनियां किसी देश में अलग तरह से बिज़नेस करती है, इसके नियम कायदे अलग होते हैं पर जब देश की साख पे ही सवाल जाए तो short term के बिजनेस बेनिफिट नहीं देखे जाते। भारत, चीन के लिए एक बाजार है, दुनिया के कई देश चीन के लिए बाजार हैं। सो अगर चीन रहेगा, उसकी साख रहेगी, उसकी world politics में पकड़ बचेगी, तभी तो वो अपनी कम्पनियों को दुनिया के दूसरे देशों में पैसा कमाने के लिए लगा सकेगी? गरीब आदमी को रेहड़ी पटरी लगाने के लिए भी पुलिस और नगर निगम के अफसरों को घूस देना पड़ता है और बाबा रामदेव जैसे बड़े व्यापारी को सरकारी जमीन कौड़ियों के भाव बिज़नेस के लिए मिल जाती हैं। तभी तो ट्रम्प ने भारत को हड़का दिया था कि अमेरिकी कम्पनी हार्ले डेविडसन की बाइक पर भारत ज्यादा टैक्स ले रहा है। ये किसी देश का रुआब होता है, जो वह दुनियाभर में अपनी कंपनियों को सुरक्षा देता है। अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी अमेरिकी स्वामित्व वाली कम्पनियां भारत के online कारोबार पर आधिपत्य रखती हैं, फिर भी अमरीका भारत को खड़कता रहता है। राजनीति बचेगी, साख बचेगी, तभी बिज़नेस बचेगा, ये बात समझ लेनी चाहिए।


ये अनायास नहीं है कि कोरोना से जंग के वक़्त चीन ने भारत के साथ सीमा विवाद का एक नया अध्याय खोला है। विद्वान लोग इसे अपनी तरह से इन्टरप्रेट कर सकते हैं पर मेरा फंडा क्लियर रहता है। भय बिना प्रीति नहीं होती। ये इंसानी फितरत है। सिर्फ मां-बाप अपवाद हैं, जो संतान को निस्वार्थ प्रेम करते हैं। बाकी इंसानों और दुनिया के देशों का हर रिश्ता दुनियादारी है। मेरी पिछली पोस्ट पे बहुत से मित्रों ने अपनी-अपनी राय रखी है। आपकी बातों का सम्मान है। एक ही घटना को हम सब अलग-अलग नज़रिए से देखते हैं। देखना भी चाहिए। पर एक बात समझ लेनी चाहिए। राजनीति और कूटनीति, दो अलग-अलग चीज़ें हैं। जो ऊपर दिखता है, वह अंदर होता नहीं। उदाहरण के लिए पिछले दिनों अमरीका ने माना कि उसके लड़ाकू पायलट्स ने UFO यानी उड़नतश्तरी सरीखी चीज़ को उड़ते हुए कैमरे पे रेकॉर्ड किया है। इससे पहले अमरीका इस तरह की खबरों का प्रायः खंडन करता आया है। तो टाइमिंग समझिए। क्या अमरीका दुनिया को कोरोना काल में ये बताना चाहता है कि एलियंस से उसका संपर्क हो चुका है और गुपचुप तरीके से वह एलियन तकनीक हासिल कर चुका है? इसके क्या निहितार्थ हैं? इस पे फिर कभी। उधर अमरीका में राष्ट्रपति के चुनाव होने हैं नवम्बर में, इधर चीन कोरोना पे अपनी बदनामी को लेकर बौखलाया हुआ है। हमेशा की तरह रूस शांत है। और भारत में कोरोना के बाद #NPR #NRC बम गिरने वाला है। उठपुथल तो होनी ही है। बस हर देश के सत्ताधारी ये देखेंगे कि उनकी गद्दी ना चली जाए। जनता का क्या है। पहले राजाओं की गुलाम थी, अब नेताओं की गुलामी कर रही है। देश की सीमाएं बनती-मिटती रहती हैं। जनता हर राजा को वैसे ही सलाम ठोकती है, जैसा उसने पिछले राजाओं को ठोका था। बहरहाल चीन की हरकत पे नज़र रखिएगा। हो सकता है कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया हो जाये या फिर तिल का ताड़ बन जाए। कूटनीति अपने बाप की नहीं होती। यही सच है।


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