इन जातिवादियों ने नेहरू को भी ब्राह्मिन बना दिया

तीरंदाजी


Nadim S. Akhter 31 May 2020


पिछले दिनों कैलेंडर में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित एक तारीख़ आई तो सोशल मीडिया पर कुछ लोग नेहरू को लेकर जातिवादी हो गए और उन्हें ब्राह्मणों का कुलदीपक घोषित कर दिया। तुर्रा ये रहा कि भले वे पूरे मुल्क के थे, पर थे तो पंडत ही ना !! सो उनका खूब गुणगान हुआ और ये शिकायत भी कि मुई ब्राह्मणों की ये नई पीढ़ी अपने सूर्य यानी पंडित नेहरू के बारे मे ओछी बातें बोलती रहती है और उनका तेज़ कम करती है। ये सब आईटी सेल के प्रभाव में हो रहा है। यानी जाति के नाम पे खूब स्यापा हुआ। नेहरू का क़द उनकी जाति हो गई। उनकी बातें सुनकर मुझे अपनी कहानी याद गयी। 


वैसे इस्लाम में जातिवाद का कोई स्थान नहीं पर अनेकानेक कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान इसे ढोते आए हैं। सो मैं जब एक अखबार में संपादकी कर रहा था, तो उस राज्य के एक सामाजिक-राजनीतिक व्यक्ति को कहीं से मेरी मुस्लिम धर्म वाली जाति पता लग गयी। उन्होंने मुझे कहा कि आप फलां जगह चलिए, सिर्फ आपकी ही जाति के लोग हैं। उनको भी तो पता चले कि उनके बीच का कोई आदमी दिल्ली में पत्रकार है और संपादक है। उनको फख्र होगा। मुसलमानों में पढ़ते ही कितने हैं

मैं चुपचाप उनकी बात सुनता रहा। फिर पूछा-तो आपको लगता है कि मैं कोई नुमाइश की चीज़ हूँ, जिसे मेरी जाति वालों को देखना चाहिए !! और आज बोल दिया है, आगे से ध्यान रखिएगा। हम जात-वात नहीं मानते। वो सज्जन घबरा गए। बोले-अरे, आप बुरा क्यों मान रहे हैं? लोगों से मिलने-जुलने में हर्ज ही क्या है ? हमने कहा कि हम मिलते-जुलते भी बहुत कम हैं। रिश्तेदारी में भी नहीं। और जाति का गिरोह तो हम क़तई नहीं बनाते मेरे शुभचिंतक का मुंह उतर गया। 


ये कहानी आपको इसलिए बताई कि राजदीप सरदेसाई भी एक दफा किसी नेता के शपथ लेने पे खुश हो रहे थे कि वह नेता राजदीप की जमात वाला सारस्वत ब्राह्मिन हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो घुमा-फिरा के फेसबुक पे ऐलान करते रहते हैं कि उनकी जाति क्या है? इस तरह वे फेसबुक पे भी सजातीय लोगों का गिरोह बनाते हैं और पता नहीं इन सजातीय गिरोह के मैसेज बॉक्स में क्या गुल खिलते होंगे? कितनी घेरेबंदी होती होगी और क्या-क्या योजनाएँ बनाई जाती होंगी !!

मतलब हम भारतीय इतने कमीने हैं कि जाति का नाम आते ही सामने वाला रावण भी हमें राम दिखने लगता है। सिर्फ इसलिए कि वह अपनी जात का है। मीडिया में जब तक रहा, जाति का ये खेल खुल के देखा। लेकिन जहां भी मेरे हाथ में कमान रही, मैंने कभी जाति के नाम पे गोलबंदी नहीं होने दी। शिवजी की बारात रखी। सभी तरह के लोग, जो खुद की पहचान अलग-अलग जातियों से करते हैं। उनको सिर्फ और सिर्फ टैलेंट के बल पे आंका और कभी जाति के नाम पे भेदभाव नहीं किया। ये भेदभाव मैं अपने वरिष्ठों को करते देख चुका था, सो इस बात का खास ख्याल रखा। जो कमज़ोर था, उसको ऊपर उठाया। और जिसने भी जाति के नाम पे गोलबंदी की कोशिश की, उसे सीधे उल्टा टांग दिया। दफ्तर तुम्हारी जातियों के बूचखाने का अड्डा नहीं कि यहां भी कमीनापन ले के गए। 


बहरहाल, जिन्होंने भी नेहरू को पंडित नेहरू कहकर सम्मान दिया, उनका आभार। ब्राह्मणों के ही नेता थे नेहरू और अम्बेडकर सिर्फ दलितों के। बस एक बात बता दीजिएगा। सीमांत गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद की जाति क्या थी? कितनों को पता है? इस मुल्क में बस यहीं एक दिक्कत है। वे मुसलमान थे, सिर्फ इतना पता है। अच्छा चलिए एपीजे कलाम की जाति क्या थी? नहीं पता। बस इतना ही जानते हैं ना कि वे एक ऐसे मुसलमान थे, जो वीणा बजाते थे और देशभक्त थे !! बहुत अच्छे। ताली। 

इस देश में यहीं प्रॉब्लम है। जाति सिर्फ हिंदुओं में देखी जाती है। दूसरे धर्म के लोग तो घर के हैं ही नहीं। उनकी जाति से क्या मतलब? जबकि हक़ीक़त ये है कि भारत जैसे घोर जातिवादी देश में क्या मुसलमान, क्या सिख, क्या ईसाई और क्या दूसरे, सब के सब बुरी तरह अपनी-अपनी जातियों में जकड़े हुए हैं। भारतीय राजनीति में नेताजी चाहे किसी भी पार्टी में रहें, वे दूसरी सभी पार्टियों में अपनी जाति वाले नेताजी से मधुर संबंध रखेंगे ही रखेंगे। पार्टी-वार्टी और देश-विचारधारा बाद में। पहले जाति।

मीडिया में मेरे हिंदू सहयोगियों का अनुभव लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाली इमारत की नींव खोखली दिखाता है। जब हम लोग पत्रकारिता की शुरुआत कर रहे थे, तो मेरे एक मित्र एक जगह इंटरव्यू देने गए। इंटरव्यू लेने वाले ने सबसे पहले उनसे यही सवाल किया- नाम क्या है? मेरे मित्र ने बता दिया- फला कुमार। इंटरव्यू लेने वाले की भौंहें तन गईं। अच्छा कुमार !! हूँ...उसके आगे...? मेरे मित्र ने कहा- बस कुमार। ना कुछ आगे और ना पीछे। अब तो वरिष्ठ पत्रकार महोदय का सब्र जवाब देने लगा। खुल के पूछ दिया- बिहार के हो ना ! तो तुम्हारे यहाँ सरनेम नहीं होता है? मेरा मित्र भाप गया। बेचारा मीडिया की दुनिया में नया था, पलटकर जवाब नहीं दे पाया। खैर, उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। 

आप देखेंगे कि मीडिया में भी सनातन धर्म की एक ख़ास जाति के लोगों का दबदबा है। हर जगह डिसीजन मेकिंग लेवल पर यही लोग आपको मिलेंगे और अपनी ही जाति के लोगों को आगे बढ़ाएँगे। बाक़ियों को साइडलान करते रहेंगे। ये कौन सी जाति है, मैं नहीं बताऊँगा पर आप समझ जाइए। हिंदी मीडिया में तो ये बहुत ज़्यादा है क्योंकि यहाँ बिहार और यूपी जैसे दो घनघोर जातिवादी राज्यों के लोग ही क़ब्ज़ा जमाए बैठे हैं। बाक़ी राजनीति, ग्लैमर की दुनिया, बॉलीवुड की दुनिया, बिज़नेस की दुनिया, ये दुनिया और वो दुनिया, कहां नहीं हैं जातिवाद ?? हर जगह है। ये पूरा सिस्टम इतने महीन तरीक़े से काम करता है कि किसी नौसिखिेए को शुरु में ये पता ही नहीं चलेगा कि उसके सामने जातिवाद का क्या खेल हो रहा है? लेकिन जब उसे लात पड़ेगी और कोई गुरु उसे मिलेगा, तब उसकी समझ आएगा कि ये-ये, वहाँ-वहां क्यों और कैसे हुआ? यानी जाति का खेल चला। 



आप सोचिए कि पंडित नेहरू जैसी शख़्सियत को भी जब भाई लोग अपनी जाति के लिए फ़ख़्र का विषय बता दें तो इस देश में कहने-सुनने के लिए और क्या बच जाता है? क्या नेहरू सिर्फ़ ब्राह्मणों के थे? नहीं ना, फिर भी पंडितों को उन पे फ़ख़्र है कि उनके बीच का कोई आदमी ऐसा है। दलितों को अंबेडकर पर फ़ख़्र है। फिर मुसलमानों को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद पर होना चाहिए? लेकिन नहीं। वो तो उनका धर्म था। उनकी जाति क्या थी? सिर्फ़ उनकी जाति के मुसलमानों को मौलाना अबुल कलाम के गुरुर होना चाहिए। होना चैये कि नई होना चैये मित्रों?? होना चैये ना !! पर उनकी जाति तो हमें पता ही नहीं। शायद उनकी जाति के मुसलमानों को पता हो। अगर आपको मालूम लगे तो हमें भी बताइएगा। 

फ़िलहाल तो मैं ये पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं कि वैदिक सभ्यता से पहले वाली हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की सभ्यता में ब्राह्मिन होते थे या नहीं? अगर होते थे तो क्या वे भी अपनी जाति पे गर्व करते थे? और क्या उन्होंने भी शूद्र बनाए थे, जो शहर का मैला साफ करते थे? या ये बीमारी वैदिक सभ्यता से ही शुरु हुई। वर्ण व्यवस्था। बाकी योग के भोग याना बाबा रामदेव ने कमाल जरूर किया है। बिना ब्राह्मण कुल में पैदा हुए -बाबा- यानी सन्यासी बन गए और भक्त उनको पैर छूकर प्रणाम करने लगे। लालू यादव ऐसे ही बाबा रामदेव को देखकर खुश थोड़े होते हैं? वे लाख मोदी जी को गरिया लें, पर मोदी जी के कट्टर समर्थक बाबा रामदेव जब लालू के सामने आते हैं तो लालू बांह फैला कर उनका स्वागत करते हैं। यही तो है जाति की ताकत, जो जवाहरलाल नेहरू को -पंडित- घोषित कर देता है। अब पंडत माने ज्ञानी और ज्ञानी माने ध्यानी और ध्यानी माने सयानी और सयानी माने बिरयानी। भटकिए मत। धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। पंडत पर टिके रहिए। यज्ञ की तैयारी हो और आहुति के लिए शुद्ध घी का प्रबंध हो। जोर से बोलिए- स्वाहा !!!!

(सभी चित्र-साभार)


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