हे ज्ञानियों ! प्लाज़्मा थेरेपी और हर्ड इम्युनिटी दाल-भात का कोर नहीं कि लिए और निगल गए

त्वरित टिप्पणी


Nadim S. Akhter 31 May 2020

कल हमने Herd Immunity पर लिखा तो भाई लोग धड़ाधड़ इस पे लिखने लगे कि इतने मर जाएंगे और survival of the fittest आदि आदि।

ज्ञानी जी! पहली बात तो ये कि Herd Immunity कोई बच्चों का खेल नहीं कि आबादी का इतना प्रतिशत संक्रमित हो गया तो वायरस को इंसान घेर लेगा। दूसरी बात ये कि म्यूटेशन इसमें एक ऐसी कड़ी है कि herd immunity के बाप को मात दे दे।



सो जिस विषय के बारे में जानकारी ना हो, उस पे कलम नहीं चलानी चाहिए। तीसरी बात। जब भारतीय मीडिया में #Plasma #Therapy और #Herd# Immunity शब्द किसी ने सुने भी नहीं थे, तब इस बारे में एक डॉक्टर मित्र से मेरी लंबी बात हुई थी और उन्होंने मुझे कहा था कि इस पे लिखिए। मैंने नहीं लिखा। इसलिए कि बाद में मैने सोचा के प्लाज़मा थेरेपी अमीरों और VVIP की जान बचाने के लिए एक सुरक्षित महंगा उपाय बन सकती है, जिसका हल्ला अगर एक बार हुआ तो इस देश का सिस्टम, अमीरों की जान बचाने के लिए गरीबों का खून चूसने लगेगा। 

मसलन अगर किसी VVIP को कोरोना हो गया और उसे प्लाज़मा थेरेपी से ठीक करना हो तो उसमें गरीब का ही शोषण होगा। फर्ज कीजिए कि इस थेरेपी की अगर देश में मान्यता ना मिली हो तो चोरी-छिपे डॉक्टर की मिलीभगत से अमीर अपनी जान बचाने के लिए गरीब का खून चूसेगा। होगा ये कि अमीर को कोरना होने पे डॉक्टर/अस्पताल उस गरीब मरीज को इलाज के बहाने बुला लेंगे, जिसे कोरोना हुआ था और वह ठीक हो गया है। फिर किसी बहाने से उसका खून लेकर अमीर आदमी के शरीर में कोरोना से लड़ने वाले एंटीबॉडी की सेना प्लाज़मा थेरेपी के ज़रिए इंजेक्ट कर देंगे। और किसी को कानों कान खबर भी नहीं होगी। ये एक सदी पुरानी थेरेपी है, जिस पे सवाल भी उठते रहे हैं।
चूंकि उस वक़्त देश में प्लाज़मा थेरेपी का कोई नाम भी नहीं जानता था, तो सोचा कि क्यों इसकी जानकारी देकर अमीरों को गरीबों का शोषण करने की एक और राह खोलूं ? हर चीज़ लिखी नहीं जाती, चाहे वह कितनी ही विस्फोटक जानकारी हो। 

उसी वक़्त Herd immunity के बारे में भी मित्र ने बताया और कहा कि भारत में ये एक उपाय हो सकता है कोरोना से लड़ने का। तब प्रिंट, टीवी और सोशल मीडिया में कहीं भी herd immunity का ज़िक्र नहीं था। इस पे भी नहीं लिखा। इसलिए कि हमारी सरकारें कितनी कमज़र्फ हैं, आप सभी जानते हैं। एक पोस्ट उधर पहुंच गई तो वहां बैठे नौकरशाह को आईडिया मिल गया। फिर वह पता करके सरकार को सलाह दे देगा कि कुछ करने-धरने की जरूरत नहीं। कोरोना का एक कुदरती इलाज है हर्ड इम्युनिटी। इतने मरेंगे और बाकी बच जाएंगे। यानी सरकार को बैठे-बिठाए आइडिया दे देना। सो इस पे नहीं लिखा कि मैं क्यों ये पाप अपने सिर लूं, जब कहीं चर्चा ही नहीं है।

लेकिन बालू में  मुंडी गाड़कर सोने से क्या दुनिया को ख़बर नहीं होगी। जल्द ही भारतीय मीडिया में प्लाज़्मा थेरेपी और हर्ड इम्युनिटी की चर्चा हो गई। अख़बारों में इस पे लेख आ गए। टीभी भी दिखाने लगा तो मित्र ने फ़ोन किया। बताया कि आपने नहीं लिखा, देखिए अब मीडिया चला रहा है। हम उनको क्या जवाब देते? बस सुकून यही था कि अगर इसमें किसी गरीब का शोषण होता है, तो कम से कम पहली बार इस बारे में लिखकर ये पाप अपने सिर लेने का बोझ मुझ पे तो नहीं ही होगा। फिर ख़बर ये आई कि कोरोना कैरियर के नाम से बदनाम किए गए जमाती भी प्लाज़्मा थेरेपी के लिए खून देने बड़ी संख्या में अस्पताल पहुँच गए। हमने माथा पीट लिया। क्योंकि इस देश में सब कुछ बहुत हल्के में होता है। प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोना का इलाज कर सकते हैं लेकिन इसमें भी काफ़ी If and Buts हैं। पर हमारी सरकारों और उससे जुड़ी संस्था ICMR अर्थात इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च को उससे क्या? चढ़ा दो प्लाज्मा थोक के भाव। लेकिन अगर गड़बड़ी हुई तो प्लाज्मा थेरेपी के सहारे कोरोना का इलाज कराने वाला वहीं टें बोल सकता है। 

अब कल जब सरकार ने 1 जून से लॉकडाउन खोलने की बात कही तो मुझे लगा कि ये तो वही हो रहा है, जिस पे हमलोग मार्च में डिस्कस कर चुके थे। आशंका थी कि भारत जैसी बड़ी आबादी में कोरोना पर नियंत्रण सरकार के बूते की बात नहीं, सो लॉकडाउन का खेल खेलकर फिर जनता को उसके हाल पे छोड़ दिया जाएगा। जब ताली-थाली बजी और मोमबत्ती जली, तो हमारी आशंका और पुख़्ता हुई क्योंकि उसमें सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ीं। और आख़िर जून में अनलॉक का फ़रमान जारी हो गया। एक ऐसे वक़्त में जब देश में कोरोना मरीज़ों की संख्या दो लाख के पार जाने वाली है, तब सरकार लॉकडाउन खोल रही है। और जब देश में कोरोना मरीज़ों की तादाद 700 से भी कम थी, तब सरकार ने लॉकडाउन कर दिया था। ये लॉजिक समझ आया आपको?

इसे ऐसे समझें कि बाहर अगर 10 में से 1 आदमी कोरोना संक्रमित है तो लॉकडाउन लगा दिया गया क्योंकि सरकार को आशंका थी कि बाक़ी 9 लोग उस एक आदमी से कोरोना संक्रमित हो सकते हैं। अब जब 10 में से 5 आदमी कोरोना को गले लगा चुके हैं, तो सरकार कह रही है कि लॉकडाउन खुल गया। आप बाहर जाओ लेकिन सरकार ये नहीं बता रही कि अब तो आपको इन्फेक्ट करने के लिए एक की बजाय बाहर चार ज़्यादा, यानी पाँच आदमी मौजूद हैं। यानी आपको कोरोना संक्रमित होने का अब ज़्यादा ख़तरा है। फिर भी लॉकडाउन खोला जा रहा है। क्या इकॉनामी के लिए? नहीं? अगर सरकार को अर्थव्यवस्था की फ़िक्र होती तो जल्दबाज़ी की बेतुकी नोटबंदी लागू नहीं होती और ना ही फिर जीएसटी को घटिया तरीक़े से लागू करके केंद्र और राज्य सरकारों का राजस्व सुखा दिया जाता। इकोनॉमी का भट्ठा बैठा, वो अलग। 

दरअसल ये सारे निर्णय जहां से भी हो रहे हैं और जो भी सलाहकार है, उनको या तो ज़मीन की समझ नहीं या फिर वो सपना देखते हैं और फिर उसे लागू करवा देते हैं। कि आज बाबाजी ने लाल चटनी खाने को बोली है, सपने में। खा लिया जाए, इससे कृपा आएगी। आप विश्वास कीजिए, ये नेता और नौकरशाह बहुत ज़्यादा superstitious होते हैं। लालू प्रसाद यादव का उदाहरण देता हूं, जिसे उन्होने पब्लिकली स्वीकार किया था और बताया था कि एक दिन सपने में भगवान शिव आए और बोले कि लालू ! क्या करता है, बच्चा। मांस-मछली खाना छोड़ दे। इसके बाद लालू जी ने मांस-मछली का त्याग कर दिया। अब आज भी वह शाकाहारी हैं और जेल में भगवान शिव अब उनके सपने में आते हैं या नहीं, मुझे नहीं मालूम। 

लेकिन एक बात तय है कि नेताओं, मंत्रियों और अफसरशाहों की तुनकमिजाजी, अदूरदर्शी और बेतुके फ़ैसलों की सज़ा जनता भोगती है। सिर्फ़ चार घंटे के नोटिस पे देश में लॉकडाउन लागू कर दिया गया और सारे मज़दूर-जनता जहां थी, वहीं फँस गई। फिर जब देश में मज़दूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरु हुआ और साथ में कोरोना के मामले भी तेज़ी से बढ़ने लगे तो सरकार ने मज़दूरों को उनके गाँव पहुँचाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलानी शुरु कर दीं। कितना अच्छा होता अगर सरकार पहले ही हफ़्ते भर का टाइम जनता को दे देती कि एक सप्ताह में जिसको जहां जाना है, चला जाए। फिर देश में लॉकडाउन लगा दिया जाएगा। कम से कम अभी की तरह गाँव-गांव कोरोना तो नहीं पहुँचता तब। देश में कोरोना के मामले इक्का-दु्क्का ही थे।

यूपीए सरकार में बीजेपी वाले मनमोहन सिंह सरकार के लिए एक जुमला इस्तेमाल करते थे- Policy Paralysis. कुदरता का खेल देखिए कि आज बीजेपी वाले खुद इसी पॉलिसी पैरालिसिस के शिकार हो गए हैं। कोरोना उनके नियंत्रण से बाहर है, अर्थव्यवस्था सींग मारने को आतुर है, संभाले नहीं संभल रही, बेरोजगारी-महंगाई-किसान-मजदूर-बनिया-अघाया मिडिल क्लास-उद्योगपति यानी सब के सब परेशान हैं और सरकार से कुछ हो नहीं रहा। 

फिर भी अगले चुनाव में अगर पब्लिक वोट मोदी जी को ही देती है, तो ये उनके व्यक्तित्व का करिश्मा है। मतलब जनता जान दे देगी पर वोट बीजेपी को ही देगी, अगर ऐसा है तो देश के लिए ये कमाल है। इस पर राजनीतिक और सामाजिक विज्ञान के छात्रों को शोध करना चाहिए।


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1 Comments

  1. हर चीज़ लिखी नहीं जाती, चाहे वह कितनी ही विस्फोटक जानकारी हो, काश टीआरपी वाले सभी पत्रकार यह बात समझते।
    बहुत बढ़िया लेख ,

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