सोशल मीडिया पर बनावटी लोगों की भरमार है

त्वरित टिप्पणी


Nadim S. Akhter 14 June 2020


फेसबुक पर #ज्ञान और खोखली बातों/नसीहतों की भरमार है। आपके लिखने के ढंग से ही पता चल जाता है कि आप अंदर से वैसे हैं, या दिखावा कर रहे हैं। ज्यादातर लोग #Likes के लिए लिखते हैं। सोशल मीडिया बहुतों का #obsession है। कम ही लोग यहां हैं, जो खरी-खरी बातें सुनाते हैं। ऐसे लोगों के नाम उंगलियों पे हैं।



वैसे सबकी अपनी स्वतंत्रता है, कोई कुछ भी लिखे पर फर्जी बातें, ज्ञान, नसीहत देखकर कोफ्त होती है। कोई व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी से गौरव ज्ञान लाकर फेसबुक पे पटक रहा है, तो कोई खुद को प्रोग्रेसिव दिखा रहा है, कोई जाति के गुण गा रहा है, कोई नेता-मंत्री-अफसर की चापलूसी कर रहा है और कोई जगत-द्रष्टा बना हुआ है। सबको यहां सब आता है। ज्ञान की खोज का कोई विद्यार्थी ही नहीं।

फेसबुक पे बधाई और शोक संदेशों के भी अपने निहितार्थ हैं। दो शब्द टाइप कर दिया, हो गया सामाजिक शिष्टाचार। इससे ज्यादा करीब तो फेसबुक मैसेंजर या व्हाट्सअप का व्यक्तिगत संदेश लगता है। लब्बोलुबाब ये है कि लोग सामाजिक ख्याति, मान, प्रतिष्ठा, स्वीकृति, पॉप्युलैरिटी और अहम की संतुष्टि के लिए फेसबुक और सोशल मीडिया को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। दिखावा इतना करेंगे कि खुद ही expose होने लगेंगे। जो आप नहीं हैं, वैसा आप बोल-लिख कैसे देंगे? एक बार, दो बार, तीन बार...फिर? फिर पोल खुल जाती है। जो मन के अंदर है, वो बाहर जाता है।

क्या ज़रूरत है कि लोग हमें एक विद्वान, प्रबुद्ध, बुद्धिजीवी, प्रोग्रेसिव, इंकलाबी, उदारचित्त, सर्वसमावेशी, नैतिकता से सराबोर और सर्वतत्व ज्ञानी समझें? हमें कोई मामूली इंसान ही समझ ले, जो निर्विकार भाव से मन की बात करता है, तो इतना काफी है। क्या कीजिएगा तमगा लेकर? कौन याद रखता है? अगर एक इंसान के रूप में धूमिल सी छाप भी आप दूसरों पे छोड़ जाते हैं, तो बहुत है इस जनम के लिए। इस्लाम के मुताबिक आप दुबारा पैदा होंगे नहीं, सीधे क़यामत के दिन उठाए जाएंगे और सनातन धर्म के मुताबिक मोक्ष मिलने तक कई योनियों के चक्कर काटते रहेंगे। फिर इस मानव जन्म में इतना सारा नाटक, तृष्णा, दर्प, कुकर्म, दिखावट और सामाजिक स्वीकार्यता की चाहत क्यों? अगर आप खुद के इंसान होने से संतुष्ट हैं और ये मानते हैं कि प्रकृति का कर्ज अदा कर दिया है, तो ये काफी है चैन से मरने के लिए। ना फ़िरऔन रहा, ना सोने की लंका वाला रावण, ना चन्द्रगुप्त, ना चाणक्य और ना विश्व विजेता सिकन्दर। सब मिट्टी में मिल गए। हम-आप भी मिल जाएंगे। यही सत्य है। इस्लाम में क़ुरआन में अल्लाह कहते हैं कि अंत में सारे फरिश्ते, इंसान, जिन्न, शैतान, सारे ग्रह, सितारे, आकाश गंगाएं और पूरा यूनिवर्स, सब खत्म हो जाएगा। अंत में सिर्फ मौत का फरिश्ता बचा रहेगा, जिसे अल्लाह हुक्म देगा कि तुम भी फना हो जाओ और उसकी भी रूह निकल जायेगी। और आखिर में सिर्फ एक चीज़ बचेगी, जो पहले भी थी और बाद में भी रहेगी। और वह है सर्वशक्तिमान ईश्वर/ अल्लाह। कोरोना ने मानव जीवन के क्षणभंगुर होने की हकीकत फिर दुहराई है पर इंसान है कि उसे सच्चाई दिखती नहीं। वह दिखावा करते-करते ही मर जाता है और हाथ कुछ नहीं आता।




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