अभी तो केजरीवाल ने रंग दिखाना शुरु किया है, आगे-आगे देखिए होता है क्या !

चक्रव्यूह


Nadim S. Akhter 7 June 2020


चाहे दिल्ली में 'बाहरियों' को इलाज के लिए मना करना हो

या फिर दिल्ली दंगों के मामले में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता बीजेपी नेत्री मीनाक्षी लेखी के पति श्री अमन लेखी को दिल्ली सरकार की तरफ से स्पेशल वकील नियुक्त करना हो


या फिर आरोग्य एप्प डाउनलोड ना करने के लिए दिल्ली के प्रतिष्ठित अस्पताल गंगाराम पर FIR करना हो

या फिर दिल्ली सरकार के कर्मचारियों को वेतन देने में हाथ खड़े करना हो

या चाहे दारू पर देश में सबसे ज्यादा कोरोना टैक्स, 70 फीसद कर लगाकर पियक्कड़ों की जेब काटने का मामला हो....

भारी मतों से जनता द्वारा निर्वाचित दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल उर्फ टोपीलाल ने तो अभी अपना असली रंग दिखाना शुरू ही किया है। इब्तदा इश्क है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या। फर्जी मुहल्ला क्लीनिक और जनता के ही पैसों से सस्ती बिजली-पानी का लॉलीपॉप दिखाकर टोपीलाल ने बहुत आसानी से मूर्ख जनता को टोपी पहना दी। हम कहते रह गए कि ना बंगला लूंगा-ना गाड़ी लूंगा कहने वाला ये आदमी फर्जी निकला, पर भाई लोग नहीं माने। दिल्ली के मुसलमानों ने तो बीजेपी के डर से टोपीलाल को अपना मसीहा ही मान लिया और झुंड बनाकर उसकी गोद में जा बैठे। अब बाप-बाप चिल्ला रहे हैं।

मेरी इसी मित्र सूची में कई लोग टोपीलाल के लिए चुनाव में कैम्पेन करते दिखे थे। मुझे सब याद रहता है। उनको भी टोपीलाल में देश का भविष्य दिखता था। आज वे सब भी टोपीलाल की हरकतों पे चुप्पी साध बैठे हैं। या तो वे भी टोपीलाल की तरह घाघ आदमी हैं या फिर निहायत ही आला दर्जे के मूर्ख।

अपने मुंह मियां मिट्ठू नहीं बन रहा पर मेरा अंदाज़ा सही बैठता है कई दफा। मार्च के आखिरी सप्ताह में ही कुछ यहां-वहां की स्टडीज देखकर इसी फेसबुक पे लिखा था कि भारत में जून-जुलाई में कोरोना अपने peak पर होगा। सरकार चाहे लाख दावे कर ले क्योंकि उसके पास कोई विजन ही नहीं है। कोरोना का इलाज lockdown नहीं, ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग और संक्रमितों का isolation है। वही हुआ। आज सब देख रहे हैं।

उसी तरह जब नोटबन्दी हुई थी तो उसी समय तुक्का मारा था कि इससे देश की GDP 2 फीसद तक गिर सकती है। पुरानी फेसबुक प्रोफाइल पे लिखा था। इसके काफी बाद में मनमोहन सिंह ने भी जीडीपी में 2 फीसद की गिरावट की बात कही, वो भी तब, जब उन्होंने इकॉनमी के सारे पहिये चेक कर लिए। और वही हुआ भी।

फिर हमने लिखा कि शाहीनबाग बिना किसी नेतृत्व के एक अपरिपक्व आंदोलन है और इससे हासिल कुछ नहीं होगा। एक दिन बहुत आसानी से इनके तंबू उखाड़ दिए जाएंगे क्योंकि वहां मौजूद जनता को पता ही नहीं कि आगे क्या करना है? बापू का रास्ता चुनो, एक जगह बैठकर आंदोलन नहीं होता। तब कइयों को मेरी बात बहुत बुरी लगी थी क्योंकि शाहीनबाग अपने जलवा-जलाल पर था। ऐसा जनता को दिख रहा था, पर मुझे नहीं। फिर एक दिन मेरी बात सच हुई। शाहीनबाग के तंबू उखाड़ दिए गए और एक चिड़िया भी नहीं आई पुलिस का प्रतिरोध करने। बिना विज़न और नेता के आंदोलन का हश्र यही होता है। वो हो गया।

क्या-क्या बताएं। अब मेरा ये मानना है कि विश्व गुरु भारत कोरोना के मामले में डोलाण्ड ट्रम्प वाले अमरीका को पछाड़कर दुनिया में नम्बर वन बनेगा। और दुनिया में कोरोना से सबसे ज्यादा लोग भारत में ही मरेंगे। बस, सरकारी आंकड़ों में ये नहीं दिखेगा क्योंकि वे दर्ज ही नहीं होंगे। सरकार ने इसके पूरे नियम बना दिए हैं कि आंकड़ों में मौतें चढ़ें ही नहीं। अभी और नियम बनेंगे। इकोनॉमी को दुरुस्त करने के नाम पे।

एक और खुशखबरी है। देश में राज्यों का पुनर्गठन हो सकता है। नोटबन्दी के बाद ये एक बड़ा काम रह गया है। सो कुछ नए केंद्र शासित प्रदेश बनेंगे और काट-छांट होगी। अभी इसका कोई ऐलान नहीं है, बस एक संभावना (आशंका नहीं) जता रहा हूँ। इसे भी आप मेरी कपोल कल्पना समझ सकते हैं। और ये अगले आम चुनाव से पहले होगा। उससे पहले NRC में सबको नापा जाएगा। हिन्दू-मुसलमान सब नपेंगे क्योंकि डॉक्युमेंट तो सबको देने होंगे। इसलिए कोरोना तो शुरुआत है। आगे देश में अभी उथल-पुथल का दौर रहेगा। और अर्थव्यवस्था जो अभी कब्र में है, वह पहले सड़ेगी। फिर गलेगी। उसकी दुर्गंध आप लोगों को मिल जाएगी क्योंकि सरकार के पास विज़न ही नहीं है। 20 लाख करोड़ के पैकेज से आम जनता को क्या मिला? बाबाजी का ठुल्लू! उद्यमी लोन क्यों लेंगे जब उनको पता है कि उनका माल बिकेगा ही नहीं। सो वो पैसा भी बैंक में पड़ा रहेगा। दुनियाभर में अर्थशास्त्रियों ने जीडीपी का बड़ा हिस्सा राहत के रूप में जनता तक पहुंचाया ताकि मांग बढ़े। फिर कई देश तो नए नोट छाप करके उसे जनता में बांट रहे हैं ताकि तरलता और मांग मिलकर इकोनॉमी को एक धक्का दे सकें जिससे अर्थव्यवस्था की पटरी दुबारा घूम जाए। भारत में ये दोनों नहीं हो रहा है। कागज़ पे 20 लाख करोड़ है, ज़मीन पे 20 पैसा नहीं पहुंचा। मीडिया भी कब तक मैनेज करोगे? वह भी धीरे-धीरे बंद होगा और मीडिया मालिकों का अंपायर जब गिरने लगेगा, तब वो भी बोलने लगेंगे क्योंकि उन्होंने सालों की मेहनत से इसे खड़ा किया था।

सो अभी आगे बहुत कुछ होना है। एक बम्पी राइड के लिए तैयार रहिए। जो किस्मत वाला होगा, सिर्फ वही कोरोना, बेरोज़गारी और NRC से जिंदा बचेगा। बाकी भोट जनता ने दिया है तो उसका आनंद भी जनता ही लेगी। यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। क्यों टोपीलाल जी?


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