भारत के बिकाऊ मीडिया ने कांग्रेस की शराफ़त का फ़ायदा उठा लिया

चक्रव्यूह

Nadim S. Akhter 1 June 2020

देश में आज जो कुछ हो रहा है, कोरोना से लेकर इकोनॉमी तक और चीन-नेपाल के हमलों से लेकर सरकारी उपक्रम बेचे जाने तक,  

अगर ऐसे में कांग्रेस की सरकार होती तो मीडिया आसमान सिर पे उठा चुका होता और अमरीका की तरह भारत की जनता भी सड़क पर होती। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तरह मनमोहन सिंह को भी किसी बंकर में छुपना पड़ता, साथ ही एक और फर्जी जर्सी अन्ना हज़ारे पैदा हो चुका होता अब तक।


पर देश में कहीं कोई हलचल नहीं। पब्लिक भी मस्त है। जानते हैं क्यों ? क्योंकि कांग्रेस के चिरकुट अपने वक़्त में मीडिया को मैनेज नहीं कर सके। इमरजेंसी के वाकये से ये लोग मीडिया को लेकर हमेशा डरे-डरे रहे। इन कांग्रेसी मूर्खों को ये पता ही नहीं रहा कि ज्यादातर मीडिया के मालिक और उद्योगपति, हद दर्जे के डरपोक बनिए होते हैं। एक तमाचा मारो, तो थूककर चाटने को भी तैयार हो जाएंगे और पूछेंगे कि क्या हुक्म है मेरे आका?


पता नहीं कैसे इन कांग्रेसी मूर्खों ने 10 साल तक सरकार चलाई? कुछ समझ ही नहीं सके। ना गुजरात मॉडल को, ना मीडिया के मालिकों को और ना सुप्रीम कोर्ट को। अगर समझ जाते तो आज पप्पू राहुल घर और घाट के बीच झूल नहीं रहा होता। अब देखिए ना! अभी पिछले दिनों ही गुजरात हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार को कोरोना से निपटने में हुई लापरवाही के लिए जमकर लताड़ा था। फिर कल खबर गयी कि गुजरात हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस वाली बेंच ने U-Turn लेते हुए गुजरात सरकार की जमकर तारीफ कर दी है। कह दिया कि कोरोना के ऐसे संकट के समय में कोर्ट को सरकार की आलोचना नहीं करनी चाहिए। अगर गुजरात सरकार काम नहीं कर रही होती, तो आज हम सब मर चुके होते टाइप बात कह दी गुजरात हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस साहब ने। 


ये ख़बर पढ़कर अनायास ही मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गई। कि वाह !! गुजरात हाई कोर्ट में दो अलग-अलग जज समूहों के किस बेंच की टिप्पणी को सही माना जाए? क्या उसे, जिसमें दो जज बेंच ने गुजरात सरकार की बखिया उधेड़ दी थी? या फिर गुजरात सरकार की देश-दुनिया में हुई इस किरकिरी के बाद चीफ़ जस्टिस वाली उस दो सदस्यीय बेंच की टिप्पणी को, जिसमें चीफ़ जस्टिस ने गुजरात सरकार को कोरोना काल में जीवन रक्षक टाइप बता दिया है और कहा है कि ऐसे समय आलोचना करते हो? ग़लत बात है। हमारे कोर्ट की पिछली टिप्पणी को ग़लत संदर्भ में पेश किया गया। सो हो गया डैमेज कंट्रोल। अब सब चंगा सी।  

थोड़ा और मुस्कुराना चाहते हैं। तो एक जानकारी और सुनिए। एक सम्मानित जज तो गुजरात हाई कोर्ट की उन दोनों पीठ में मौजूद थे, जिन दो अलग-अलग पीठों ने गुजरात सरकार पर परस्पर विरोधाभासी टिप्पणियाँ की हैं। यानी एक बार वही जज गुजरात सरकार की निंदा में शामिल रहे और इसके तुरंत बाद चीफ़ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच में भी रहे, जिसने गुजरात सरकार की तारीफ़ के पुल बांध दिए। है ना कमाल !!

इसीलिए ऊपर कहा है कि अपने 10 साल के केंद्र वाले राज में ये मूर्ख कांग्रेसी अगर सुप्रीम कोर्ट को समझ जाते तो आज इनके पैजामे फटे नहीं मिलते और ना ही ये तुरपई वाले पैजामे पहनने को मजबूर होते। जो किया, वो भरा। अकेले अन्ना हज़ारे जैसे फ़र्ज़ी आदमी ने इनकी सरकार की चूलें हिला दीं, टीवी मीडिया ने कांग्रेस शासन को भ्रष्टाचारी राज घोषित करके देशभर में हवा बना दी और ये चिरकुट सोते रहे। इन मीडिया घरानों को थोड़ा खड़काया होता तो सब के सब पेट के बल हुकुम बजाने आ जाते। जैसे आज आ रहे हैं। 


आज देखिए। कोई मीडिया घराना कुछ बोल रहा है? पीएम मोदी ने छह साल में एक भी प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं की, कोई सवाल उठा रहा है? याद करिए, जब मौनमोहन सिंह की उपाधि पा चुके मनमोहन सिंह पीएम थे। तब यही मीडिया घराने और उनके सम्पादक किस हक़ से जाकर मनमोहन सिंह की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में तीखे सवाल पूछते थे! और बाहर निकलकर शोर करते थे कि आज तो पीएम को रगड़ दिया। सच में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह बहुत शरीफ़ आदमी थे। और आज देखिए पीएम से पत्रकार और सम्पादक किस तरह के सवाल पूछते हैं। बॉलीवुड वाले भी पीएम का इंटरव्यू लेने लगे हैं। अक्षय कुमार का सवाल होता है कि आप आम कैसे खाते हैं? छीलकर या साबुत? तथाकथित पत्रकारों का सवाल होता है कि इतनी मेहनत कर कैसे लेते हैं आप? आप थकते क्यों नहीं? और यही बहादुर पत्रकार और मीडिया घराने किस तरह मनमोहन सिंह पर पिले पड़े रहते थे। याद है आपको?


इसीलिए कह रहा हूँ कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी बहुत शरीफ़ थे। लोकतंत्र के चौथे खंभे की इज़्ज़त करते थे, जो उनको भारी पड़ गया। कांग्रेसियों से भारी गलती हो गई। इसका ख़ामियाज़ा वे अभी कई चुनावों में भुगतेंगे। और कहां गए वे कांग्रेस के चाणक्य ? अहमद पटेल ही नाम था ना उनका! उस भाई साब की हालत तो ये हो गई कि अपने गृहराज्य गुजरात से राज्यसभा का चुनाव जीतना उनके लिए भारी मुश्किल हो गया। किसी तरह जैसे-तैसे करके इज़्ज़त बचाई। 

सो राज, नीति से ही चलता है। तभी इसे राजनीति कहते हैं यानी राज करने की नीति। बीजेपी वालों को आप चाहे जितना गरिया दें पर उनमें राज करने की नीति है। वे राज करना सीख गए हैं। कांग्रेस से कई गुना धारदार तरीक़े से। यानी साम-दाम-दंड-भेद, कुछ भी करना पड़ जाए, पर राज हमीं करेंगे। कर लो जो करना है और समझ लो जो समझना है। कर्नाटक, गोआ से लेकर मध्य प्रदेश तक में कांग्रेस को पटककर दुबारा अपनी सरकार बना चुके हैं। अब महाराष्ट्र पे नज़र है और अगर वहाँ उद्धव ठाकरे नहीं होते, तो कब का महाराष्ट्र बीजेपी की गोद में होता। शरद पवार के वश में अब कुछ रहा नहीं, और कांग्रेस तो अभी मंदिर का घंटा हो गई है। जो आ रहा है, बजा के चला जा रहा है। इतने में भी इन कांग्रेसी मूर्खों को अक्ल नहीं आ रही। उनके युवराज राहुल गांधी अभी भी प्यार बाँटने में लगे हैं। राजनीति नहीं करना चाहते, देश बदलना चाहते हैं। प्यार बाँटते-बांटते तो उन्होंने कांग्रेस की अध्यक्षी छोड़ ही दी है। अब लगता है कि देश भी छोड़ेंगे। दुनिया में भी तो उनको प्यार बाँटना है!! सो उनको जाने दीजिए।


बस ये समझिए कि अब हमारी डेमोक्रेसी में बीजेपी के अलावा कोई और बचा नहीं। जो छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल अभी बीजेपी को सहयोग कर रहे हैं, वे तभी तक हैं, जब तक बीजेपी की जड़ और मज़बूत नहीं हो जाती। उसके बाद उन क्षेत्रीय दलों को भी उखाड़ फेंका जाएगा। वे दल भी एक-एक परिवार की राजनीतिक दुकानदारी भर हैं। कितनी देर लगेगी उनको नापने में? परिवार के मुखिया को नापा, दुकान का शटर गिरा। बिहार में लालू और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू को आप देख ही चुके हैं। बाक़ियों का भी यही हश्र होगा। व्याकुल क्यों हैं? थोड़ा इंतज़ार कीजिए। पिक्चर में अभी और ट्विस्ट आने हैं, पॉपकॉर्न खाइए। मस्त रहिए। सब चंगा सी।


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