कई सवाल खड़े कर गई सुशांत सिंह राजपूत की मौत, मीडिया सिर्फ TRP बटोरने के खेल में लगा रहा

टिप्पणी

Nadim S. Akhter 14 June 2020

बॉलीवुड के यंग एक्टर सुशांत सिंह राजपूत ने खुदकुशी कर ली। दिन में जब खबर मिली तो यकीन ही नहीं हुआ ये #Corona काल अब हर आम खास पर भारी पड़ रहा है। पर सुशांत पे क्या दबाव था? सफलता मिल ही रही थी। अभी चंद रोज पहले उनकी एक पूर्व मैनेजर ने भी आत्महत्या कर ली थी। और अब सुशांत भी चले गए। कोई समझ ही नहीं पा रहा कि ऐसा क्यों हुआ?




टीवी पे फर्जी मनोचिकित्सक दिनभर ज्ञान देते रहे कि ऐसा क्यों हुआ और वैसा क्यों हुआ? उनको देखकर और कोफ्त होती रही। कहने के लिए उनके पास नया कुछ था नहीं, बस घुमा-फिराकर एक ही बात करते रहे और टीवी न्यूज के एंकर्स उनका फर्जी ज्ञान सुनाकर पब्लिक को बोर करते रहे। कोई अच्छा-खासा खाता-पीता जवान हीरो फंदे से लटक जाए तो आप मनोविज्ञान की कौन सी धारा की किस उपधारा का वहां उपयोग करेंगे? इतना सिम्पल होता है क्या ये सब कुछ जान जाना और विश्लेषण कर देना ! मेरा ये दावा है कि भारत के टीवी चैनलों पर जितने फर्जी मनोवैज्ञानिक सुशांत की खुदकुशी का विश्लेषण कर रहे थे, स्वर्गीय सुशांत उन सबसे ज्यादा समझदार थे। मैंने मनोचिकित्सक बनने वाली मनोविज्ञान की पढ़ाई तो नहीं की है, पर कई दफा लगा कि इन मनोचिकित्सकों से ज्यादा साफगोई और गहराई से मन का विश्लेषण तो मैं ही कर लूंगा। मन का विज्ञान ही जानना है ना !! बता दीजिए कि मन में क्या चल रहा था, क्या चल रहा होगा, ये वाह्य परिस्थितियां थीं, ये और वैसा हो रहा था, फलां-ढिमका और ब्ला-ब्ला। हो गया मनोविज्ञान का खेल। मतलब ज्ञान बघार दीजिए। पब्लिक तो सुन ही लेगी। तो भारत के टीवी न्यूज चैनलों पर आज सुशांत की खुदकुशी के बहाने मनोविज्ञान का यही खेल चल रहा था। मुझे तो लग रहा था कि बेचारे एंकर्स खुद anxiety और depression के शिकार हैं। पर टीवी के पर्दे पर वे सुशांत के डिप्रेशन पर चर्चा कर रहे थे। खैर ! पाकिस्तान के साथ जंग से लेकर चीन को डरा देने के पराक्रम के नाम पर भारत के टीवी न्यूज चैनल ऐसा तमाशा रोज करते हैं। पर अफसोसनाक तरीके से आज TRP के लिए एक मौत को भुनाने में लग गए। परिणाम ये रहा कि पब्लिक ने सबसे तेज न्यूज चैनल और DNA वाले न्यूज चैनल को ट्विटर पर खदेड़ दिया और ट्विटर पर दो ट्रेंड चले। पहला #ShameonAajTak और दूसरा #ShameonZeeNews.  जनता ने इन दोनों चैनलों के पत्रकारों को बताया कि कम से कम किसी की मौत की खबर को रिपोर्ट करते समय एक बेसिक मानवता और dignity की जरूरत होती है, जो इनके पास नहीं थी। सुशांत की मौत की खबर को ये बेचने में लगे थे, ऐसा बोल-लिख के जनता दन-दनादन ट्वीट कर रही थी। खैर !!



ट्विटर पर गुस्साई जनता ने न्यूज़ चैनल 'आज तक' और 'जी न्यूज़' को जमकर धोया


सुशांत की खुदकुशी ने एक बार फिर हमारे समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया है और ये बताया है कि जो ऊपर दिख रहा है, वह अंदर होता नहीं। सुशांत की आत्महत्या हमारे समाज और बॉलीवुड की चमकती दुनिया पर कलंक है। सफलता भी मन को ठौर ना दे सकी। हमारा समाज दरक रहा है। सबकुछ एकांगी हो रहा है। सोशल मीडिया पे भीड़ है पर हकीकत में यहां सब अकेले हैं। ऐसे ही दिव्या भारती की मौत ने सबको सदमे में डाल दिया था। फिर young actress जिया खान की आत्महत्या का मामला आया। अब इरफान खान और ऋषि कपूर की मौत के बाद सुशांत की आत्महत्या ने #bollywood की चमकती दुनिया पर फिर ग्रहण लगा दिया है। सवाल कई हैं और फिलहाल जवाब किसी के पासे नहीं। उधर बिहार में सुशांत के घर का आलम ये रहा कि उनके पिता, बेटे की मौत की खबर सुनकर बेहोश हो गए। वहां भी मीडिया उनके परिवार वालों पर भूखे गिद्ध की तरह झपट पड़ा और बाइट लेने के लिए मचलते रहे।

सुशांत सिंह राजपूत के मृत शरीर की तस्वीर मेरे पास दिन में आई थी। उनके शव को ले जाने का वीडियो भी। पर ना तो तस्वीर देख सका और ना वीडियो। दिल कमज़ोर नहीं है अपना, पर नहीं देख सका। एक सपने का अंत देखा नहीं गया। गुस्से में बहुत कुछ लिख गया पर पोस्ट नहीं किया। क्या फायदा? हमारा समाज, हमारा सिस्टम और हम भारत के लोग सबक कब लेते हैं? टीवी मीडिया के लिए किसी की मौत TRP से ज्यादा नहीं। जनता एक दिन चर्चा करेगी, फिर भूल जाएगी। जिया खान की आत्महत्या पे भी यही तमाशा हुआ था। ना समाज की तरफ से कुछ हुआ, ना बॉलीवुड वालों ने अपने साथियों की खैर-खबर का कोई तरीका निकाला। सोचिए सैकड़ों करोड़ कमाने वाले इतने तंगदिल हैं। इस चमक-दमक के पीछे एक स्याह दुनिया है, जहां हर कोई व्यापारी है। एक्शन और cut तक में ही ज़िन्दगी है। उसके बाद आप बिल्कुल तन्हा हैं। और जब सुशांत की मौत से पलटकर आप लाखों मजदूरों का पलायन देखते हैं और कोरोना से तड़प-तड़पकर मरती निरीह जनता को तकते हैं तो आप भावशून्य हो जाते हैं। तब मौत आंकड़ा बन जाती है। पर इंसान वे भी हैं और उनकी जान भी कीमती है। एक की मौत राष्ट्रीय चर्चा है, पीएम-सीएम ट्वीट करते हैं, एक की मौत गुमनाम है। घर वालों के अलावा कोई नहीं रोता, चर्चा क्या, कोई खैरियत तक नहीं पूछता। फिर भी हम सभ्य मानव समाज हैं। लोकतंत्र हैं। हमारा संविधान है।सुप्रीम कोर्ट है। लेकिन हर जगह कारोबार हावी है। ये दुनिया ही एक व्यापार है। माल है तो ताल है, करीना का तैमूर क्या खाता है, ये हर कोई जानना चाहता है, बिहार में रेलवे स्टेशन पे मरी पड़ी मां का चद्दर सरकाते मासूम को खाना क्यों नहीं मिला, ये कोई नहीं जानना चाहता। यही दुनिया है। घोर मतलबी और पाखंडी लोग। नेता और अफसरों में से ज्यादातर की आत्मा तो पहले ही मर चुकी थी, अब जनता की भी मर गई है। वैसे मरना तो सबको है। एक दिन। पर जीवन में आपने इंसानियत के लिए क्या किया, ये सवाल बड़ा होगा। उस वक़्त जब आपकी रूह जिस्म से खींचकर निकाली जा रही होगी और एक सेकंड के अरबवें भाग में आप के मस्तिष्क में पूरे जीवन के व्यर्थ होने के एहसास घूम रहे होंगे। बस तब इंसान का मुंह और आंख खुली रह जाती है और आत्मा निर्जीव शरीर को देखती हुई ऊपर उठा ली जाती है। इस मायाजाल का ये इंटरवल है। उसके बाद एक अलग पिक्चर शुरू होती है। दूसरे लोक में। बाकी नास्तिकों के लिए क्या दिन और क्या रात! वे खुद परमात्मा हैं और दुनिया के सबसे बड़े ज्ञानी विचारक। ये पोस्ट उनके लिए नहीं है। जो भगवान-ईश्वर-अल्लाह में विश्वास रखते हैं, सिर्फ वही समझ सकते हैं कि मैं क्या कहना चाह रहा हूं।


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